– पर्युषण के तीसरे दिन आयड़ तीर्थ में पौषध व्रत का महत्व बताया– आचार्य मुक्तिसागर बोले—पर्व के दिनों में पौषध पालन अनिवार्य24 News Update उदयपुर, 10 सितम्बर। जिस प्रकार शरीर को स्वस्थ और मजबूत बनाने के लिए दैनिक भोजन के साथ पौष्टिक आहार एवं टॉनिक की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार आत्मा को मजबूत बनाने के लिए हमारे प्राचीन आध्यात्मिक गुरुओं एवं पूर्वाचार्यों ने पौषध व्रत की व्यवस्था बताई है। आठ या चार प्रहर तक साधु का जीवन व्यतीत करना ही पौषध व्रत का वास्तविक अर्थ है। पर्युषण महापर्व के तीसरे दिन मालव मार्तंड आचार्य भगवंत मुक्तिसागर सूरीश्वर महाराज ने पौषध व्रत के महत्व पर विस्तार से प्रवचन दिया।श्री जैन श्वेतांबर महासभा के महामंत्री कुलदीप नाहर ने बताया कि तपागच्छ की उद्गम स्थली आयड़ जैन तीर्थ में मालव मार्तंड आचार्य भगवंत मुक्तिसागर सूरीश्वर महाराज, आचार्य अचल मुक्तिसागर सूरीश्वर महाराज सहित ठाणा-4 के सान्निध्य में पर्वाधिराज महापर्व पर्युषण की धर्ममय धूम जारी है। आठ दिवसीय पर्युषण महापर्व के दौरान धर्म-ध्यान, पूजा-पाठ, सामायिक, पौषध, तप एवं तपस्या सहित विभिन्न धार्मिक आयोजन हो रहे हैं।आयड़ जैन तीर्थ के आत्मवल्लभ सभागार में आयोजित धर्मसभा में आचार्य भगवंत मुक्तिसागर सूरीश्वर महाराज ने कहा कि सामायिक व्रत ध्यान की ऐसी साधना है, जो 48 मिनट की होती है, जबकि पौषध व्रत 24 घंटे का होता है। गृहस्थ रहते हुए साधु के जीवन का अनुभव करना ही पौषध व्रत है। उन्होंने कहा कि पौषध व्रत के दौरान श्रावक सांसारिक गतिविधियों से दूर रहकर साधुचर्या का पालन करता है और पाप कर्मों से स्वयं को बचाने का प्रयास करता है। इस प्रकार गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी व्यक्ति साधु जीवन की साधना एवं अनुशासन का अनुभव प्राप्त करता है। आचार्यश्री ने कहा कि पर्युषण महापर्व के आठ दिनों में तीसरे दिन का विशेष केंद्र पौषध व्रत है। पर्व के दिनों में पौषध का पालन नहीं छोडऩा चाहिए। सामान्य दिनों में पौषध का अभ्यास करना उत्तम है, लेकिन पर्व के दिनों में इसका पालन विशेष रूप से आवश्यक माना गया है। इससे आत्मशुद्धि और धर्म साधना की भावना और अधिक प्रबल होती है। आचार्यश्री ने पौषध व्रत के साथ क्षमा के महत्व पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने राजा उदय एवं उनके शत्रु राजा चंड प्रद्योत के प्रसंग के माध्यम से बताया कि क्षमा जैन धर्म के मूल सिद्धांतों में से एक है। राजा उदय ने अपने शत्रु राजा चंड प्रद्योत को क्षमा कर जैन धर्म की करुणा, संयम और क्षमाशीलता को जीवन में उतारने का उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि आत्मसंयम, क्षमा, त्याग और आत्मशुद्धि को जीवन में उतारना ही धर्म की वास्तविक साधना है। पौषध व्रत व्यक्ति को कुछ समय के लिए सांसारिक मोह-माया से दूर कर आत्मचिंतन और साधना की ओर ले जाता है। धर्मसभा में भोपाल सिंह नाहर, चंद्र सिंह, अशोक जैन, राजेंद्र जावरिया, प्रकाश नागोरी, हेमंत सिंघवी, राजेश जावरिया, दिनेश बापना, भोपाल सिंह परमार, अभय नलवाया, कैलाश मुर्डिया, चतर सिंह पामेच, सतीश कच्छारा, दिनेश भंडारी, चिमनलाल गांधी, प्रद्योत महात्मा, रमेश सिरोया, कुलदीप मेहता सहित बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे। Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading… Related Discover more from 24 News Update Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Post navigation मौसम विभाग ने दी खुशखबरी, 11 सितंबर से बारिश का नया दौर, उदयपुर संभाग में 13-14 को भारी बारिश के आसार धर्म की शरण में भय का अंत, संयम से क्रोध और अहंकार पर विजय : मुनि अरहसागर महाराज