– अशोक नगर में चातुर्मासिक धर्मसभा में उमड़ रहा है सकल दिगम्बर जैन समाज– मुनिश्री का पाद प्रक्षालन व शास्त्र भेंट सहित हुए विविध धार्मिक अनुष्ठान24 News Update उदयपुर, 10 सितम्बर। अशोक नगर स्थित उदासीन आश्रम के श्री पाश्र्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर में श्री दिगंबर जैन धर्म प्रभावना समिति एवं वर्षायोग समिति के तत्वावधान में मुनि श्री अरहसागर महाराज एवं मुनि श्री सुहित सागर महाराज के सान्निध्य में चातुर्मास के तहत धार्मिक आयोजन श्रद्धा एवं भक्ति के साथ जारी हैं। प्रतिदिन आयोजित धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं शामिल होकर धर्मलाभ ले रहे हैं।चातुर्मास समिति अध्यक्ष महेंद्र टाया ने बताया कि मंदिर परिसर में आयोजित चातुर्मासिक धर्मसभा का शुभारंभ अभिषेक एवं शांतिधारा के साथ हुआ। इसके बाद श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री के चित्र का अनावरण एवं दीप प्रज्ज्वलन किया। मुनिश्री के पाद-प्रक्षालन के साथ श्रीफल एवं शास्त्र भेंट कर श्रद्धालुओं ने आशीर्वाद प्राप्त किया। आहारचर्या भी सानंद संपन्न हुई। चातुर्मास के दौरान नित्य नियम पूजन, जलाभिषेक सहित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान नियमित रूप से आयोजित किए जा रहे हैं। बाहर से आने वाले अतिथियों का मेवाड़ी परंपरा के अनुसार स्वागत-सत्कार किया जाता है।धर्म प्रभावना समिति अध्यक्ष कुंथु कुमार जैन गणपतोत एवं मीडिया प्रभारी रमेश वैद ने बताया कि धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री अरहसागर महाराज ने आचार्य श्री मानतुंग स्वामी द्वारा रचित भक्तामर स्तोत्र की गाथा पर मंगल देशना प्रदान की। मुनिश्री ने कहा कि भक्तामर स्तोत्र की गाथा में धर्म की शरण से भय का अंत तथा क्रोध, मद और उन्माद पर विजय का संदेश दिया गया है। जो मनुष्य जिनेंद्र भगवान के चरणों की शरण में रहता है, उसके भीतर भय टिक नहीं सकता। व्यक्ति जब मद, उन्माद, क्रोध और अहंकार से भरकर मदोन्मत्त हाथी के समान विकराल हो जाता है, तब भी धर्म की शक्ति उसके भीतर निर्भयता और आत्मबल जागृत करती है। उन्होंने कहा कि मद, क्रोध और उन्माद चाहे कितने ही प्रबल क्यों न हों, धर्म की शरण में आया जीव भय से मुक्त हो जाता है। जिनवाणी हमें बाहरी शक्ति के बजाय आत्मबल, संयम और समता को जीवन का आधार बनाने की प्रेरणा देती है। जिनेंद्र भगवान की भक्ति मनुष्य के भीतर ऐसी निर्भयता उत्पन्न करती है कि बड़े से बड़ा संकट भी उसे विचलित नहीं कर पाता। मुनिश्री ने कहा कि अहंकार, क्रोध, उन्माद और भय मन की दुर्बलताएं हैं। धर्म और जिनेंद्र भगवान की शरण में आने पर जीव के भीतर समता, धैर्य और आत्मविश्वास का जागरण होता है। जिस प्रकार मदोन्मत्त हाथी को देखकर सामान्य व्यक्ति भयभीत हो सकता है, उसी प्रकार संसार के संकट भी मनुष्य को विचलित करते हैं, लेकिन धर्म में श्रद्धा रखने वाला व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी अपना आत्मबल नहीं खोता। उन्होंने कहा कि भक्ति केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भीतर की शक्ति को जागृत करने का माध्यम है। मद और अहंकार बुद्धि को ढक देते हैं, जबकि धर्म विवेक का प्रकाश देता है। क्रोध की अग्नि को संयम ही शांत कर सकता है। बाहरी परिस्थितियां चाहे कितनी भी विकट हों, आत्मबल से युक्त व्यक्ति विचलित नहीं होता। मुनिश्री ने कहा कि धर्म की शरण मनुष्य को भय के साथ जीवन जीना नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, समता और संयम के साथ जीवन जीना सिखाती है। जहां समता और संयम है, वहां क्रोध और उन्माद टिक नहीं सकते। यही इस गाथा का मूल संदेश है कि धर्म को जीवन का आधार बनाकर भय पर विजय प्राप्त करें।धर्मसभा में पधारे श्रद्धालुओं ने मुनिश्री को श्रीफल अर्पित कर आशीर्वाद प्राप्त किया। शाम 6.30 बजे गुरु भक्ति का आयोजन हुआ। इसके बाद छहढाला जी के प्रवचन एवं आरती का आयोजन किया गया।पंडित भुवनेश शास्त्री ने बताया कि कार्यक्रम में धर्म प्रभावना समिति अध्यक्ष कुंथु कुमार जैन गणपतोत, चातुर्मास समिति अध्यक्ष महेंद्र टाया, प्रकाश अखावत, राजेंद्र अखावत, रमेश वैद, शशिकांत शाह, कैलाश गंगवाल, नरेंद्र टाया, जगदीश जैन, मनोज कमावत, पारस शाह, हेमंत बोहरा, मनीष गोदावत, पंकज ठाकुर्डिया, अशोक डवारा, दिनेश सोनी, अजीत आवोत, अर्चना पटवारी, सर्वेश जैन, प्रभा टाया, इंदिरा डवारा, कल्पना गांगावत, निर्मला वेद, मंजू शाह, सरोज बोहरा, संगीता डवारा, सम्पत देवी गणपतोत, भारती, निर्मला गांगावत, सावित्री टाया सहित बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे। Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading… Related Discover more from 24 News Update Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Post navigation गृहस्थ जीवन में रहकर साधुचर्या का अनुभव कराता है पौषध व्रत : आचार्य मुक्तिसागर सूरीश्वर मानसिक तनावों से सहज मुक्ति दिलाता है पर्युषण महापर्व : आचार्य प्रशमेशप्रभ सूरीश्वर