24 News Update Rajasthan. शूरवीरों की धरती पर अब पॉलिटिकल लातों-घूंसों के कमल खिलकर यहां की राजनीति को समृद्ध कर रहे हैं। कमल तो बरसें से बहुत ही शालीनता के साथ खिलते और खिलखिलाते थे। कई बार तो पूजे भी जाते थे। मगर पर इस बार बेमौसम बरसात में कीचड़ में नहीं, हाथों की मुट्ठियों कों भींचते हुए मसल पावर वाला कमल खिल गया है।एक विकास कार्यक्रम के मंच पर, जहाँ बटन दबाकर शहर में रोशनी की नई इबारत लिखी जानी थी, वहाँ पर अचानक राजनीतिक गिरावट का घना अंधेरा फैल गया। काले झंडों ने भी कहां सोचा होगा कि झंडाबरदारों को हाथ को मजबूत करने के बदले हाथ की सफाई रिटर्न गिफ्ट में मिल जाएगी। मंच पर मुस्कान, नीचे नाराज़गी और इन सबके बीच हर किसी को अपनी बात कहने की आज़ादी का प्रश्न उठा तो पूरी दाल काली हो गई। कोई किसी को धकिया रहा है आवाज आई, कोई किसी को लतिया रहा है यह शोर मचा। अरे! धकियाने वालों में पुलिस प्रोटेक्शन के होते हुए थी वे भी हाथ आजमा रहे हैं-यह हर किसी ने देख लिया।लोग बोले-जिनको जनता ने चुना, उन्होंने अपने तालाब में कमल खिलाने किसी को चुना, उसने किसी को चुन-चुन कर धुना। वाह, क्या सीन है। पॉलिटिक्स में मसल पावर का कोकटेल हो जाए तो फिर कहने ही क्या? अपनी सुरक्षा अपने हाथ। दूसरों की सुरक्षा भी हाथों-हाथ। अब तो यही लगने लगा है कि पॉलिटिकल मसल पावर की इस नगरी में ज्ञापन बाउंसर सेवा की जरूरत है। विचार शायद किसी इक्विट वाले धन्नासेठ के दिमाग में क्लिक कर जाए और वो इस लेखक को बख्शीश में रॉयल्टी भी देने पहुंच जाए। यहां की मसल पावर पॉलिटिक्स की पुण्य धरा पर नया स्टार्टअप जन्म ले सकता है – “ज्ञापन बाउंसर सेवा प्रा. लि.”टैगलाइन होगी – “आपकी आवाज़ की सुरक्षा, हमारे कंधों पर।”मुक्के के साथ भी, मुक्के के बाद भी।। यह सेवा उन सभी के लिए होगीजिनको विरोध की खुजली मची है।जो वास्तव में विरोध करना चाहते हैं।जिनको किसी ने विरोध के लिए भेजा है।जो विरोध की पॉलिटिक्स करके कॅरियर ग्रोथ चाहते हैं।जो इतने मूर्ख हैं कि आ बैल मुझे मार करना चाहते हैं।स्टार्टप को स्पांसर करने वाली कंपनी कह सकती है- आप चाहें तो “बेसिक पैकेज“ मेंएक ज्ञापन धारक और दो बाउंसर मिलेंगेएक नारे लगाते समय साथ चलेगा, दूसरा आपको किसी भी रंग का झंडा अपने पैकेज के अनुसार आर्थिक दम रहने तक बचाएगा।प्रीमियम पैकेज में मीडिया को बुलाने की सुविधा भी होगी,ताकि हर एंगल से लातों घूसों के क्लाइमैक्स की शानदार रील लायक रिकॉर्डिंग की जा सके। लेकिन खाकी को मैनेज करने, वहां पर तोड़ बट्टे करने की कोई भी जिम्मेदारी नहीं होने की वारंटी का डिस्क्लेमर होगा। क्योंकि खाकी का दूसरा नाम ही खौफ है। चाहिए लात-घूसों का आइयन डोमइस लात-घूंसा प्रूफ आयरन डोम में किसी भी प्रकार का ड्रोन प्रवेश नहीं कर पाएगा। सेंसर पहले से बता देंगे कि किसी तरफ से प्रहार होने वाला है। कहां पर हमला करने का मूड बन रहा है। बॉडी लेग्वेज से पहले ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से बता दिया जाएगा कि सुरक्षित दूरी कितनी रखनी है। एक भागने का शॉर्टकर्ट मार्ग भी बताया जाएगा। लेकिन अब तक को हमारी यह धरती-संवाद, सौहार्द और समरसता की धरती कही जाती थी। विरोधी भी एक मंच पर भाषण देकर चुनाव निपटा दिया करते थे, गले में हाथ डालकर घूमा करते थे। अब घूसों वाले कमल आखिर कैसे खिल गए इस कीचड़ में? पानी गंदा हुआ या फिर नई खरपतवार ही ऐसी उग आई कि पुरानी तहजीब वाले खेत को खुद ही बाड़ की तरह से खाने लगी है??? विरोध करने वालों के बड़ा सबक है। पक्ष में हो या विपक्ष में। अपनी पॉलिटिकल ग्रुमिंग के दौरान पिटने के अभ्यास में कोई कमी नहीं आने दें। अपनी बॉडी को ही इतना रॉक स्ट्रांग बनाएं कि लातों-घूंसो को बरसाने वालों को ही पछताना पड़ जाए। विरोध प्रदर्शन के “जोखिम भरे इस पॉलिटिकल पेशे” मेंजहाँ पहले ज्ञापन में माँगें होती थीं,अब उसमें मेडिकल इंश्योरेंस जोड़ना चाहिए। जिसमें हर लात-घूसे का इंश्योरेंस हो। जितनी ज्यादा खाओ, उतना ज्यादा क्लैम। खाकी की लीगल और इल-लीगल खाओ तो उसका भी बोनस वाला क्लेम। वो दिन दूर नहीं जब मीडिया की सुर्खी होगी – “आज शहर में शांतिपूर्ण ज्ञापन दिया गया। सब कुछ इतना शांतिपूर्ण था कि सिर्फ दो जनों को हल्की चोटें आई और एक मोबाइल टूटा” इसे एक रिकॉर्ड बताया जा रहा है। क्या लोकतंत्र अब संवाद से नहीं,“मसल पावर’’ से चल रहा है।हमारा राजनीतिक संस्कार अब बहस नहीं,बॉडी लैंग्वेज और सुरक्षा रिंग्स से तय होता है।जितना ज्यादा गुस्सा, उतना ज्यादा नेम-फेम।कभी इस शहर की पहचान उसकी झीलें, संगीत और संवाद थे।अब लगता है पहचान बदल रही है“यह शहर” धीरे-धीरे “पॉलिटिक नादानी वाले शोलों शहर” बन गया है,जहाँ शालीनता की परिभाषापार्टी के झंडे के रंग के साथ बदल रही है। लोकतंत्र नामक तुच्छ बताया जा रहा प्राणी अब भी ज़िंदा हैबस उसके साथ एक बाउंसर खड़ा है,ताकि कोई उसकी आवाज़ तक न पहुँच पाए।आइये नए संस्कारों के नए कमल को खिलने दें।कमजोर और जर्जर हो चुके हाथ को मुट्ठियों के आगे पिटने दें। बाकी समझदार तो सभी हैं कि शहीदो की मजारों पर लगेंगे हर बरस मेले। एक रोड का नाम ही तो उनका अंतिम निशां न होगा??? Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading… Related Discover more from 24 News Update Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Post navigation पुलिस वाहन और जाब्ते को कुचलने का प्रयास करने वालों की सलवार सूट परेड करवाई मारवाड़ जंक्शन–खामली घाट वैली क्वीन मीटर गेज हैरिटेज रेलसेवा की अवधि में विस्तार