24 News Update भीलवाड़ा। मतदान खत्म हुआ नहीं कि लोकतंत्र का अगला अध्याय शुरू हो गया—जनता ने वोट डालकर अपना काम कर दिया और अब चुने जाने की दौड़ में शामिल लोगों की बाड़ेबंदी शुरू हो गई। भीलवाड़ा नगर निगम के 70 वार्डों में मतदान समाप्त होने के बाद भाजपा के प्रत्याशियों को पार्टी कार्यालय बुलाए जाने और फिर उन्हें जयपुर ले जाने की चर्चा ने चुनावी राजनीति के उस चेहरे को सामने ला दिया है, जहां जनता के फैसले से ज्यादा चिंता इस बात की दिखाई देती है कि फैसला कहीं अपने हाथ से निकल न जाए। सूत्रों के अनुसार भाजपा के सभी 70 प्रत्याशियों को फोन कर पार्टी कार्यालय बुलाया गया। प्रत्याशी अपने-अपने वाहनों से बैग लेकर पहुंचे। महिला प्रत्याशियों के साथ उनके पति और परिवार के सदस्य भी नजर आए। देर रात तीन बसों से प्रत्याशियों को जयपुर ले जाने की जानकारी सामने आई। इसके बाद कई प्रत्याशियों के मोबाइल फोन बंद बताए गए। यानी वोटर ने ईवीएम या मतपत्र पर अपनी पसंद दर्ज की और उसके बाद प्रत्याशी पहुंच गए बाड़े में। इसीलिए इस नए चुनावी चलन को ‘बाड़े के टट्टू’ कहा जाना उचित होगा। फर्क सिर्फ इतना है कि टट्टू चुनाव नहीं लड़ते, लेकिन यहां चुनाव लड़ने वाले इंसानों को भी मतदान के बाद राजनीतिक बाड़े में सुरक्षित रखने की जरूरत महसूस होने लगी है। जनता ने वोट दिया, अब किससे बचाया जा रहा है?सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर प्रत्याशियों को मतदान के तुरंत बाद एक जगह इकट्ठा करने की जरूरत क्यों पड़ रही है? क्या लोकतंत्र में चुना गया प्रतिनिधि इतना कमजोर है कि उसे जनता के बीच रहने के बजाय पार्टी की निगरानी में रखना जरूरी हो गया? अगर यह सिर्फ आपसी बातचीत, भोजन और रणनीति बनाने की सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया है तो इसे सार्वजनिक तौर पर स्पष्ट करने में हर्ज क्या है? और अगर मकसद क्रॉस-वोटिंग, खरीद-फरोख्त या किसी दूसरे दल के संपर्क से बचाना है, तो सवाल और बड़ा हो जाता है—क्या चुनाव अब मतदाता के वोट से कम और मतदान के बाद होने वाली राजनीतिक जोड़-तोड़ से ज्यादा तय होंगे? बताया गया कि प्रत्याशियों के लिए भोजन की व्यवस्था की गई है और दिनभर के घटनाक्रम तथा ताजा राजनीतिक हालात पर उनसे वन-टू-वन बातचीत होगी। इसके बाद प्रत्याशियों के जयपुर रवाना होने की बात कही गई। राजनीति में रणनीति बनाना कोई नई बात नहीं है। लेकिन सवाल तब पैदा होता है जब रणनीति और बाड़ेबंदी के बीच की रेखा धुंधली होने लगे। कांग्रेस शांत, निर्दलीय अभी खुले मैदान मेंदूसरी तरफ कांग्रेस के 53 वार्डों में अधिकृत प्रत्याशी चुनाव मैदान में थे। मतदान के बाद कांग्रेस कार्यालय में ऐसी कोई हलचल सामने नहीं आई और प्रत्याशियों को पार्टी कार्यालय बुलाए जाने की जानकारी नहीं है। वहीं 154 निर्दलीय प्रत्याशी भी चुनाव मैदान में हैं। इनमें कई ऐसे हैं जिन्होंने भाजपा और कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशियों को सीधी चुनौती दी है। फिलहाल किसी निर्दलीय प्रत्याशी द्वारा किसी राजनीतिक दल की ओर से बाड़ेबंदी के लिए बुलाए जाने की पुष्टि सामने नहीं आई है। चुनाव जनता का या पार्टियों का?भीलवाड़ा का यह घटनाक्रम सिर्फ एक पार्टी की रणनीति का सवाल नहीं है। यह उस बदलती राजनीतिक संस्कृति पर सवाल है जिसमें मतदान से पहले प्रत्याशी मतदाता के दरवाजे पर होता है और मतदान के बाद पार्टी के दरवाजे के भीतर। जनता पांच साल के लिए प्रतिनिधि चुनने निकलती है। लेकिन मतदान खत्म होते ही राजनीति का गणित शुरू हो जाता है—कौन किसके साथ जाएगा, किसका वोट किस तरफ पड़ेगा और बहुमत की बाजी किसके हाथ लगेगी। लोकतंत्र की विडंबना देखिए—वोट डालते समय जनता मालिक होती है, लेकिन वोट पड़ने के बाद प्रत्याशी भी जैसे अपने मालिक तलाशने लगते हैं। Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading… Related Discover more from 24 News Update Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Post navigation विशेषज्ञ नेत्र चिकित्सक ने की मरीजों की जांच, महावीर इंटरनेशनल के शिविर में 55 क्षेत्रवासियों ने उठाया लाभ महिला सशक्तिकरण और समाज विकास पर मोड़ मेवाड़ा कलाल समाज का मंथन