उदयपुर। उदयपुर के नगर निगम जिसको कई लोग प्यार से नरक निगम भी कहते हैं, उनमें इन दिनों उपायुक्त के टाइम को लेकर खासी चर्चा है। उपायुक्त साहब से मिलने का टाइम लगातार घटता जा रहा है। साहब को तनख्वाह तो जनता के टेक्स के पैसों से मिलती है मगर उनका टाइम आमजन के लिए लगातार सीमित होता जा रहा है। उनको लगता है कि टाइम खोटी किया जा रहा है इसलिए मिलने का समय लगातार घटाया जा रहा है। एक उपायुक्त से दूसरे उपायुक्त तक आते—आते समय इतना घट गया कि अब शहरवासियों को चिंता हो रही है कहीं आने वाले समय में यह सिमट कर केवल दस—पांच मिनट का ही ना रह जाए। हो सकता है कि उसके बाद केवल एक मिनट की मुंह दिखाई का ही समय रह जाए और उसके बाद समय का ऐसा फेर आ जाए कि मिलने के लिए भी उल्टा ‘पेड—टोकन’ लेकर समय खरीदना पड़ जाए। उसके बाद की स्थितियों का अंदाजा आप खुद लगा सकते हैं। ये टाइम आखिर जा कहां रहा है?? ऐसी कौनसी मशीन है जिसमें यह टाइम खर्च हो रहा है। अफसर पर इतना कितना काम का बोझ लादा जा रहा है कि वे जनता की आवाज सुनने के लिए टाइम ही नहीं निकाल पा रहे हैं। क्या अफसरों का पता भी है कि इनका समय लगातार बहुत ज्यादा खर्च हो रहा है। क्या आयुक्त साहब को पता है कि उपायुक्त की बिजीनेस लगातार बढ़ती जा रही है। किन कामों में व्यस्त हैं आखिर आयुक्त साहब, ऐसा कौनसा पहाड़ है जिसके कारण दबे जा रहे हैं। हमने अपनी इनवेस्टिगेटिव स्टोरी में पहले भी समय पर सवाल उठाए थे मगर अबकी बार जब समय का चार्ट फिर देखा तो चौंक गए। पहले उपायुक्त नरेश सोनी हुआ करते थे तब उन्होंने मिलने का समय सुबह साढ़े 9 से 11 व दोपहर में 2 से 3 बजे का लिखा हुआ था। अब उपायुक्त महोदय हरिसिंह देवल हैं जिनके पास मिलने का समय केवल 12 से 1 का ही बचा है। आश्चर्यजनक बात यह है कि यह समय आमजन के लिए सुविधाजनक नहीं है। नौकरी पेशा आदमी अगर लंच के समय अपने काम से निगम आएगा तब उसका तो काम कभी हो ही नहीं पाएगा। अफसर जनता के पैसों की तनख्वाह लेते हैं। अगर समय इतना टाइट हो गया है, काम सिर पर बोझ बन गया है तो कम से कम इस समय को लंच वाले टाइम में तो तब्दील किया ही जा सकता है ताकि मुसीबत का मारा आम शहरवासी अपने ही टेक्स से वेतन पाने वाले, अपने ही टेक्स के पैसों से चलने वाले नगर निगम में आकर उनके वातानुकूलित कक्ष में समय पर अपनी फरियाद रख सके। सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह हमारे समय का कोई भयंकर सच है जिसमें नौकरशाही का बढ़ता हुआ दायरा टाइम मशीन बनकर हमारे समय के हर हिस्से को बारी बारी से निगल रहा है। अफसर का समय खर्च कहां हो रहा है?? क्या कोई नेता समय खा रहा है या फिर उपर के अफसरों ने इतना काम पकड़ दिया है कि पब्लिक से संवाद का दायरा ही सिमट कर रह गया है। कहीं यह तो मंशा तो नहीं कि ना रहेगा संवाद ना होगा कोई विवाद। क्या आयुक्त महोदय को यह पता है कि उनके मातहत आने वाले अफसर के पास समय की कमी है, क्या कलेक्टर साहब को पता है कि समय सिकुड़ गया है और जनता को अफसरों से मिलने के लिए ऐसी टाइम मशीन की जरूरत है जिसमें समय धीरे कटता हो??? क्या नए मेयर साहब को यह पता है कि उपायुक्त साहब के पास समय का दायरा घट कर केवल एक घंटे का रह गया है?? वाहन पर धारण कर ली लाल—नीली बत्तीएक और जानकारी सामने आई है कि लाल—नीली बत्ती अपने वाहन पर लगाने के लिए भी उपायुक्त के स्तर पर व्याकुलता दिखाई दे रही है। पूर्व उपायुक्त अपने वाहन पर लाल—नीली बत्ती नहीं लगाते थे मगर नए उपायुक्त साहब की गाड़ी पर वीआईपी कल्चर वाली लाल—नीली बत्ती लगी हुई दिखाई दे रही है। क्या आरएएस लाल—नीली बत्ती लगा सकते हैं?? यदि हां तो किन नियमों के तहत यह जनता जानना चाहती है?? Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading… Related Discover more from 24 News Update Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Post navigation उदयपुर के चार रोलबॉल खिलाड़ी राजस्थान जूनियर टीम में चयनित