24 News Update आबूरोड (सिरोही)। सभ्यता, इतिहास और सांस्कृतिक मूल्यों पर केंद्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी में उदयपुर सांसद डॉ. मन्नालाल रावत के बयान ने चर्चा को नया आयाम दे दिया। उन्होंने कहा कि “जिसकी कुलदेवी है, वह हिन्दू है” और आह्वान किया कि समाज अपनी-अपनी कुलदेवियों के इतिहास की पुनर्खोज करे, जिससे समाज की साझा जड़ों और एकात्मता का बोध स्वतः होगा।यह संगोष्ठी प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय और सभ्यता अध्ययन केन्द्र (नई दिल्ली) के राजस्थान चैप्टर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित की गई। ‘भारत की क्षात्र परम्परा’ विषय पर आयोजित इस कार्यक्रम में डॉ. रावत मुख्य अतिथि एवं मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित कर रहे थे। कुलदेवियों के आधार पर एकात्मता का तर्कडॉ. रावत ने कहा कि वर्तमान में भले ही समाज विभिन्न जातियों में विभाजित दिखाई देता हो, लेकिन अनेक जाति-समुदायों की कुलदेवियां समान हैं, जो उनकी साझा सांस्कृतिक जड़ों की ओर इशारा करती हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि जनजाति समाज के कटारा गोत्र की कुलदेवी धराल माता हैं, जिनका मूल नाडोल से जुड़ा है और वे चौहानों की भी कुलदेवी मानी जाती हैं। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की पुनर्खोज से समाज में एकात्म भाव मजबूत होगा। आर्य आक्रमण सिद्धांत पर उठाए सवालसांसद ने तथाकथित आर्य आक्रमण सिद्धांत को भी खारिज करने की बात कही और इसे विदेशी इतिहासकारों द्वारा थोपा गया दृष्टिकोण बताया। उन्होंने आबू क्षेत्र को क्षात्र परम्परा का प्राचीन उद्गम स्थल बताते हुए कहा कि यहां यज्ञ के दौरान परमार, प्रतिहार, चालुक्य और चौहान जैसे अग्निकुलों की परम्परा का आरंभ माना जाता है, जिसका उल्लेख लोकगीतों में भी मिलता है। उन्होंने इन तथ्यों पर और गहन शोध की आवश्यकता जताई। विशेष अतिथियों के विचारउद्घाटन सत्र में शांतिवन के प्रबंधक बीके जगदीश भाई ने आधुनिकता के साथ बढ़ती सामाजिक विकृतियों पर चिंता जताई और आत्मचिंतन की आवश्यकता पर बल दिया।वहीं जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ साहित्य संस्थान के निदेशक डॉ. जीवन सिंह खरकवाल ने अचलगढ़-चंद्रावती क्षेत्र के पुरातात्विक महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि प्राचीन काल में यहां के लोग भूगर्भीय ज्ञान रखते थे और निर्माण तकनीक में भूकंपरोधी उपाय अपनाते थे।कार्यक्रम में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व निदेशक डॉ. धर्मवीर शर्मा ने भी अपने विचार रखे। इतिहास पुनर्लेखन की उठी मांगदिनभर चले तीन तकनीकी सत्रों में इतिहासविदों—डॉ. प्रताप सिंह तलावदा, अनुराग सक्सेना, डॉ. जिनेन्द्र शास्त्री, अखिलेश शर्मा, बलबीर सिंह चौहान, डॉ. सूरज राव, डॉ. ओमेन्द्र रत्नू, प्रियरंजन प्रसाद सिंह, लव वर्मा, कौशल मूंदड़ा—ने विचार व्यक्त किए। वक्ताओं ने भारत के प्राचीन इतिहास के सटीक प्रस्तुतीकरण के लिए इतिहास पुनर्लेखन आयोग के गठन और स्कूली पाठ्यक्रमों में संशोधन की आवश्यकता पर जोर दिया। आयोजन व संचालनकार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन से हुई। अतिथियों का स्वागत सभ्यता अध्ययन केन्द्र राजस्थान चैप्टर के संयोजक मनोज जोशी ने किया। विषय प्रवर्तन एवं संचालन डॉ. रविशंकर शर्मा ने किया, जबकि आभार डॉ. विवेक भटनागर ने व्यक्त किया। Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading... Related Discover more from 24 News Update Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Post navigation प्रतापगढ़ पुलिस का तस्कर पर 2.50 करोड़ का आर्थिक प्रहार, जमशेद खान उर्फ सेठ लाला की संपत्ति फ्रीज मेहंदी नगरी सोजत की नई पहचान: अत्याधुनिक रेलवे स्टेशन की ओर बढ़ते कदम