उदयपुर, 28 सितम्बर। उदयपुर में 26 और 27 सितंबर को आयोजित क्लाइमेट चक्रव्यू फेस्टिवल 2026 में 2,500 से अधिक नागरिकों ने हिस्सा लिया। भारत में अपनी तरह के इस पहले फेस्टिवल में देशभर से आए 150 से अधिक युवा कार्यकर्ताओं, जलवायु क्षेत्र में काम करने वाले लोगों, युवा सामाजिक उद्यमियों और कलाकारों ने 70 से अधिक प्रत्यक्ष एवं प्रयोगात्मक अनुभवों के जरिए लोगों को पर्यावरण और जलवायु से जोड़ने का प्रयास किया। फेस्टिवल की गतिविधियां विद्या भवन के साथ उदयपुर के 13 प्राकृतिक और सांस्कृतिक स्थलों पर आयोजित की गईं। इनमें पिछोला झील, गुलाब बाग, नीमच माता, करणी माता, खेत, जंगल और पुराने शहर की गलियां शामिल रहीं। इन गतिविधियों के जरिए प्रतिभागियों ने उदयपुर को केवल झीलों और महलों के शहर के रूप में नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ सदियों से तालमेल बनाकर जीने वाले शहर के रूप में अनुभव किया। 2500 लोगों की भागीदारी, कचरा सिर्फ 136 किलो फेस्टिवल की खासियत इसका कम कचरा उत्पन्न करने वाला आयोजन रहा। आयोजकों के अनुसार दो दिनों में करीब 2,500 से अधिक लोगों की भागीदारी के बावजूद केवल 136 किलो कचरा निकला। इसमें करीब 90 प्रतिशत कचरा जैविक था, जिसे खाद बनाने की प्रक्रिया में भेज दिया गया। फेस्टिवल में पत्रकारों, सामाजिक संगठनों से जुड़े लोगों, शिक्षकों, जलवायु कार्यकर्ताओं, कलाकारों और इन्फ्लुएंसर्स के साथ बड़ी संख्या में स्कूली एवं कॉलेज विद्यार्थियों ने भी हिस्सा लिया। लोग परिवार, दोस्तों और जोड़ों के रूप में पहुंचे, जबकि कई प्रतिभागी अपनी जिज्ञासा के साथ एक अनुभव से दूसरे अनुभव तक पहुंचते रहे। पक्षियों की पहचान से लेकर कचरा प्रबंधन तक फेस्टिवल की गतिविधियां सूर्योदय से पहले शुरू हुईं। पक्षी प्रेमियों ने पिछोला गेट पर पक्षियों की आवाजों के जरिए उनकी प्रजातियां पहचानना सीखा। तितरड़ी स्थित कचरा पृथक्करण केंद्र में प्रतिभागियों ने दस्ताने पहनकर यह समझा कि शहर से निकलने वाला कचरा आखिर कहां जाता है। विद्या भवन में आयोजित रिपेयर कैफे में बच्चों से लेकर दादा-दादी तक ने पुराने इलेक्ट्रॉनिक सामान को ठीक करने का प्रयास किया। परिवारों ने सोलर लालटेन बनाईं और प्रतिभागियों ने पत्तल-दोने बनाने जैसी पारंपरिक गतिविधियों में भी हिस्सा लिया। बेयरफुट ट्रेल में प्रतिभागी नंगे पैर चले, पत्थरों को संतुलित किया और आंखें बंद कर प्रकृति की आवाजों का अनुभव लिया। वहीं क्लाइमेट पोस्ट बॉक्स में सैकड़ों प्रतिभागियों ने भविष्य के नाम पोस्टकार्ड लिखे और जलवायु के प्रति सजग एक आदत अपनाने का संकल्प लिया। रात में कृषि विज्ञान केंद्र में रोशनी से तैयार की गई चादर की ओर पतंगे आकर्षित हुए। यहां प्रतिभागियों ने पतंगों के रंग, उनकी उत्पत्ति और प्रकृति में उनकी भूमिका के बारे में जानकारी ली। हर अनुभव पूरा करने पर प्रतिभागियों को क्लाइमेट पासपोर्ट में स्टांप दिया गया। 27 सितंबर को विद्या भवन में आयोजित ग्रैंड क्लोजिंग के दौरान लीडरबोर्ड में शीर्ष 30 स्थान पर रहे प्रतिभागियों को सम्मानित किया गया। संगीत के साथ हुआ समापन दोनों दिन की शाम विद्या भवन के एम्फीथिएटर में संगीत और पर्यावरण के संदेश के साथ संपन्न हुई। पहले दिन कवि, गायक-गीतकार और ‘नूरी’ के रचयिता कविश सेठ ने क्लासिकल गिटार वादक राघवेंद्र कुमार और लोक कलाकार एवं सामाजिक उद्यमी रितेश गोहिया के साथ प्रस्तुति दी। प्रतिभागी देर रात तक कार्यक्रम में शामिल रहे और कलाकारों के साथ गीत गाए। दूसरे दिन ‘पहाड़ों में की आवाज’ के लिए पहचाने जाने वाले सलमान इलाही अपने बैंड के साथ मंच पर पहुंचे। पहाड़ों, नदियों और घर से जुड़े उनके गीतों ने माहौल को भावपूर्ण बना दिया और प्रतिभागियों ने उनके साथ गीत गाए। एक 21 वर्षीय प्रतिभागी ने कहा कि यह अनुभव उसकी जिंदगी के सबसे यादगार अनुभवों में से एक रहेगा। उसके अनुसार, फेस्टिवल से लौटते समय उसे महसूस हुआ कि जलवायु के लिए अभी भी उम्मीद बाकी है। महाभारत के चक्रव्यूह से प्रेरित नाम फेस्टिवल की परिकल्पना कम्युनिटी—द यूथ कलेक्टिव और वार्तालीप ने की। ‘चक्रव्यू’ नाम महाभारत की उस युद्ध रचना से प्रेरित है, जिसमें अभिमन्यु प्रवेश तो कर सके, लेकिन बाहर निकलने का रास्ता नहीं खोज सके। आयोजकों के अनुसार आज जलवायु परिवर्तन भी एक जटिल चक्रव्यूह की तरह है, जिसमें समस्याएं एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं और यह समझना मुश्किल होता है कि बदलाव की शुरुआत कहां से की जाए। ‘व्यू’ यानी दृष्टिकोण लोगों को पीछे हटकर पूरी तस्वीर देखने और उसमें अपनी भूमिका समझने का निमंत्रण देता है। फेस्टिवल के सह-निदेशक राहुल हसीजा ने कहा कि जलवायु का यह चक्रव्यूह इंसानों द्वारा ही बनाया गया है और इससे बाहर निकलने का रास्ता खोजने में सभी की भूमिका जरूरी है। यह अकेले संभव नहीं है, बल्कि साझा प्रयास से ही आगे बढ़ा जा सकता है। 22 संगठनों ने मिलकर तैयार किया फेस्टिवल फेस्टिवल को देशभर के 22 संगठनों ने मिलकर तैयार किया। इनमें जतन संस्थान और वाइल्ड टेल्स सहित ऐरा इंडिया, सिटी ऑफ बर्ड्स, यूएसएसडब्ल्यू, ओएफएआई, ग्रीन हब, ब्यानियन रूट्स, जुगाड़ गैराज और फिनिश सोसाइटी शामिल रहीं। इनमें कई संगठन उदयपुर से जुड़े हैं। वार्तालीप कोएलिशन के सदस्य जतन संस्थान ने उदयपुर में फेस्टिवल के प्रमुख साझेदार और आधार के रूप में भूमिका निभाई। शहर में संस्थान के वर्षों के काम और स्थानीय स्तर पर बने भरोसे के कारण देशभर के अभ्यासकर्ताओं द्वारा तैयार गतिविधियों को उदयपुर के विभिन्न लोगों और स्थानों से जोड़ा जा सका। जतन संस्थान, उदयपुर के डॉ. कैलाश बृजवासी ने कहा कि आयोजन की विशेषता यह रही कि इसमें जलवायु परिवर्तन की समस्याओं के समाधान के लिए लोगों को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे से जोड़ने पर जोर दिया गया। विभिन्न अनुभवों और गतिविधियों के जरिए लोगों को इस साझा प्रयास का हिस्सा बनाया गया। Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) 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