24 News update जयपुर। राजस्थान में पंचायत और निकाय चुनावों को लेकर चल रही कानूनी रस्साकशी के बीच मंगलवार को हाईकोर्ट में दिलचस्प मोड़ देखने को मिला। जिस राज्य चुनाव आयोग पर अदालत के आदेश की अनदेखी का आरोप लगा था, उसी आयोग ने अब कोर्ट के सामने बिना शर्त माफी मांग ली है।राज्य चुनाव आयोग ने अदालत में स्वीकार किया कि 15 अप्रैल 2026 तक चुनाव नहीं कराए जा सके। हालांकि आयोग ने इसके लिए खुद को सीधे तौर पर जिम्मेदार मानने से इनकार करते हुए कहा कि राज्य सरकार से जरूरी आंकड़े और परिसीमन संबंधी सूचनाएं समय पर नहीं मिलने के कारण पूरी प्रक्रिया प्रभावित हुई।सुनवाई के दौरान राज्य चुनाव आयोग के अध्यक्ष राजेश्वर सिंह और सचिव राजेश वर्मा की ओर से अदालत में जवाब पेश किया गया। आयोग ने कहा कि उसने हाईकोर्ट के आदेश की जानबूझकर अवहेलना नहीं की और समय सीमा बढ़ाने के लिए 15 अप्रैल से पहले ही कोर्ट में आवेदन दायर कर दिया था।आयोग ने अपने जवाब में साफ कहा कि पंचायतों और नगर निकायों की सीमाएं तय करना, वार्डों का परिसीमन करना और आरक्षण की अंतिम सूची जारी करना राज्य सरकार का दायित्व है। जब तक सरकार यह प्रक्रिया पूरी कर जानकारी उपलब्ध नहीं कराती, तब तक चुनाव कार्यक्रम को अंतिम रूप देना संभव नहीं होता।उधर राज्य सरकार ने भी अदालत में दलील दी कि इस मामले में डिवीजन बेंच पहले ही चुनाव कराने के लिए 31 मई 2026 तक की नई समय सीमा तय कर चुकी है। ऐसे में चुनाव में देरी को लेकर दायर अवमानना याचिका अब अप्रासंगिक हो चुकी है।दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जस्टिस महेंद्र कुमार गोयल और जस्टिस अनिल उपमन की खंडपीठ ने पूर्व विधायक संयम लोढ़ा और गिर्राज सिंह देवंदा की अवमानना याचिका का निस्तारण कर दिया।दरअसल, राजस्थान हाईकोर्ट ने 14 नवंबर 2025 को 439 याचिकाओं पर फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार को 15 अप्रैल 2026 तक पंचायत और निकाय चुनाव कराने के निर्देश दिए थे। साथ ही 31 दिसंबर 2025 तक परिसीमन प्रक्रिया पूरी करने को कहा गया था।लेकिन बाद में चुनाव आयोग ने मतदाता सूची कार्यक्रम 22 अप्रैल तक तय कर दिया। इसी को आधार बनाते हुए पूर्व विधायक संयम लोढ़ा ने अवमानना याचिका दायर की थी। उनका तर्क था कि आयोग का कार्यक्रम ही यह साबित कर रहा है कि चुनाव तय समय सीमा में कराना संभव नहीं था और यह अदालत के आदेश की अवहेलना है।अब अदालत में माफी, सरकार पर जिम्मेदारी और बढ़ी हुई नई डेडलाइन के बीच यह मामला फिलहाल शांत जरूर हो गया है, लेकिन सवाल अब भी कायम है—अगर चुनाव कराने की संवैधानिक जिम्मेदारी तय है, तो आखिर जवाबदेही किसकी है? Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading… Related Discover more from 24 News Update Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Post navigation बिजली बचत से लेकर सोलर क्रांति तक: उत्तर पश्चिम रेलवे ने रचा नया रिकॉर्ड, 80% यात्री ट्रेनें अब इलेक्ट्रिक ट्रैक्शन पर