24 News Update उदयपुर। साल दर साल घोटोले पर पहरेदारी हो रही है। सूचनाएं लीक ना हो इसके पुख्ता बंदोबस्त किए जा रहे हैं। जनहित के मुद्दों पर लेकसिटी में पूरा नेक्सस बना हुआ है जो जनता की भावनाओं से खेल रहा है। इस खेल का तमाशा वो नेता भी देख रहे हैं जिन्हें हम और आप सिर पर बिठा कर चल रहे हैं। सरकार बदलने से भी इनको कोई फर्क नहीं पड़ता है। ना अफसर बदलने से, सब कुछ सेटल है। पहले से तय है।
डीपीएस स्कूल भूमि आवंटन महाघोटाले की फाइल पूरी सरकारी मशीनरी की कार्यशैली और जवाबदेही पर बड़ा सवाल बन चुकी है। हालात ऐसे पैदा कर दिए गए हैं कि महाघोटाले की फाइल का नाम लेते ही अफसरों की सांसें अटक जाती हैं। हाथ पांव फूल जाते हैं। क्योंकि उनकी जवाबदेही जनता के प्रति नहीं, उपरी शक्ति वाले कुछ लोगों के प्रति दिखाई देती है जिनसे पूरे तंत्र के गहरे आर्थिक हित जुड़े होने के आरोप लगते रहते हैं। यूडीए की ओर से इस महाघोटाले की सूचनाओं पर पहरेदारी और चौकीदार का काम ना सिर्फ पूर्व आयुक्त राहुल जैन ने किया बल्कि लोक सूचना अधिकारी हेमेंद्र नागर भी हर बार जवाब देने से बचते रहे। आरटीआई में पूर्व प्रथम अपीलीय अधिकारी भी रहे राहुल जैन ने तो हद कर दी। पूरे कार्यकाल के दौरान मामले में ऐसी चुप्पी साधे रखी मानों किसी के आदेश की अनुपालना कर रहे हो। मामला राज्य सूचना आयोग तक पहुंच गया, आदेश भी हो गए, लेकिन उसके बावजूद महीनों तक फाइलें दबाकर बैठना इस पूरे प्रकरण को और ज्यादा संदिग्ध बना रहा है। अब जिन अधिकारियों के पास कार्यभार है, वे भी इस विस्फोटक मामले में कोई खास दिलचस्पी लेते नजर नहीं आ रहे।
पूरे प्रकरण में पत्रकार और एक्टिविस्ट जयवंत भैरविया लगातार उन सवालों के जवाब मांग रहे हैं, जिनसे डीपीएस स्कूल के भूमि आवंटन की पूरी कहानी खुल सकती है। एडमिशन से जुड़े चिट्ठे सामने आ सकते हैं जो चौंकाने वाले हैं। गरीबों के हक पर डाका मारने वाले हैं, आदिवासियों के हितों पर कुठाराघात करने वाले हैं। लेकिन हर बार जवाब की जगह चुप्पी, टालमटोल और फाइलों का खेल सामने आ रहा है। ऐसा लग रहा है पूरा सिस्टम ही सिलसिलेवार किसी को बचाने में लग गया है।

जब मांगे तो बताया कि कार्रवाई का रिकॉर्ड ही नहीं दिया गया
पहली आरटीआई में जयवंत भैरविया ने पूछा था कि मंगलम एजुकेशन सोसायटी यानी डीपीएस स्कूल के चेयरमैन गोविंद अग्रवाल को UIT/UDA द्वारा आवंटित जमीन की शर्तों का पालन नहीं होने की पुष्टि जांच रिपोर्ट में हो चुकी थी, तो फिर उस आवंटन को निरस्त करने की कार्रवाई क्या हुई? साथ ही यह भी पूछा गया कि पूर्व यूडीए आयुक्त राहुल जैन द्वारा मंगलम एजुकेशन सोसायटी को जारी किए गए नोटिसों की प्रतियां उपलब्ध कराई जाएं। लेकिन जवाब में साफ कहा गया कि ना तो कोई आवंटन निरस्त किया गया और ना ही कोई नोटिस जारी हुआ। यानी जिस मामले में शर्तों के उल्लंघन की चर्चा वर्षों से होती रही, उसमें कार्रवाई का रिकॉर्ड ही नहीं दिया गया।
इसके बाद जयवंत भैरविया ने दूसरी आरटीआई लगाई। इसमें उन्होंने राज्य सरकार के आदेश के बाद गठित जांच समिति की पूरी रिपोर्ट मांगी। इस कमेटी में सचिव प्राधिकरण हेमेन्द्र नागर, जोन उपायुक्त जितेन्द्र ओझा, प्रभारी अधिकारी विधि शाखा बिन्दुवाला, तहसीलदार अभिनव शर्मा, भू अभिलेख निरीक्षक बाबूलाल तेली, राजेन्द्र सेन और सुरपाल सिंह सोलंकी शामिल थे।
आरटीआई में पूछा गया कि कमेटी ने भूमि आवंटन, मौके पर भूमि की उपलब्धता और आवंटन शर्तों की पालना की जो जांच रिपोर्ट तैयार कर राज्य सरकार को भेजी थी, उसकी सत्यापित प्रतियां उपलब्ध कराई जाएं। लेकिन इस आरटीआई पर ना सूचना दी गई, ना अपील की सुनवाई हुई। मामला राज्य सूचना आयोग पहुंचा, जहां 30 दिन में सूचना देने के आदेश हुए। इसके बावजूद आठ महीने गुजर जाने के बाद भी रिपोर्ट उपलब्ध नहीं कराई गई।
इसके बाद तीसरी आरटीआई ने पूरे मामले को और विस्फोटक बना दिया। इसमें पूछा गया कि डीपीएस स्कूल को कौड़ियों के भाव आवंटित लगभग 4 लाख वर्गफीट जमीन की शर्तों के अनुसार वर्ष 2007 से 2014 के बीच विधवा महिलाओं के बच्चों, शहीद सैनिकों के बच्चों, दिव्यांग बच्चों, एससी-एसटी वर्ग और आदिवासी गरीब बच्चों को 25 प्रतिशत रियायती प्रवेश दिए गए या नहीं? यदि दिए गए तो उनकी सूची उपलब्ध कराई जाए।

आदिवासी बच्चों का हक मार दिया
साथ ही पूछा गया कि क्या बाद में आरटीई एक्ट के तहत मिलने वाले 25 प्रतिशत एडमिशन को ही आवंटन शर्तों वाले 25 प्रतिशत प्रवेश मान लिया गया? अगर ऐसा हुआ तो उसका आदेश किसने जारी किया? क्या राज्य सरकार ने ऐसा कोई आदेश जारी किया था, जिसके आधार पर डीपीएस स्कूल को दी गई जमीन की मूल शर्तों को बदला गया?
जयवंत भैरविया ने यह भी पूछा कि स्कूल खुलने से लेकर अब तक गोविंद अग्रवाल द्वारा आवंटन शर्तों के अनुसार कितने रियायती प्रवेश दिए गए और UDA द्वारा इस पूरे मामले में राज्य सरकार को कौन सी रिपोर्ट भेजी गई। आरटीआई में साफ लिखा गया कि डीपीएस स्कूल को कौड़ियों के भाव दी गई करोड़ों की बेशकीमती जमीन से जुड़े घोटालों पर बनाई जा रही न्यूज के लिए यह सूचना मांगी जा रही है और अधूरी या भ्रामक जानकारी की जिम्मेदारी UDA की होगी।
लेकिन इस आरटीआई पर भी कोई जवाब नहीं आया। मामला फिर राज्य सूचना आयोग तक पहुंच गया। इसके बाद चौथी आरटीआई में डीपीएस स्कूल और मंगलम सोसायटी की जमीन घोटालों की जांच से जुड़े सभी सर्वे, नक्शे, गूगल KMZ फाइलें, सेटेलाइट इमेजिंग रिपोर्ट और टेक्निकल रिपोर्ट की कॉपी मांगी गई। लेकिन यहां भी वही कहानी दोहराई गई—न सूचना, न जवाब, न पारदर्शिता।


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