सुखाड़िया जयंती पर विशेष डॉ. विजय विप्लवी यह महज एक पुराना छायाचित्र नहीं, बल्कि राजस्थान की राजनीतिक संस्कृति में सहिष्णुता, संवाद, सद्भाव और व्यक्तिगत संबंधों की गरिमा की एक उज्ज्वल विरासत का दस्तावेज है। वर्ष 1972 का यह चित्र आज की राजनीति को उस दौर की याद दिलाता है, जब विचारों में मतभेद हो सकते थे, राजनीतिक संघर्ष भी तीखा होता था, लेकिन व्यक्तिगत संबंधों में सम्मान और आत्मीयता बनी रहती थी। चित्र में राजस्थान के दो ऐसे राजनेता हैं, जिन्होंने प्रदेश के राजनीतिक इतिहास पर गहरी छाप छोड़ी—मोहनलाल सुखाड़िया और भैरोंसिंह शेखावत। इस आत्मीय भेंट के साक्षी तत्कालीन भारतीय जनसंघ के प्रदेशाध्यक्ष और उदयपुर के विधायक भानुकुमार शास्त्री भी हैं। 1972 में मोहनलाल सुखाड़िया मैसूर (वर्तमान कर्नाटक) के राज्यपाल थे। इसी दौरान दुर्घटना में घायल भैरोंसिंह शेखावत स्वास्थ्य लाभ ले रहे थे। दुर्योग से शेखावत जी 1972 का विधानसभा चुनाव हार गए थे और उस समय किसी संवैधानिक अथवा राजनीतिक पद पर नहीं थे। कुछ समय बाद वे राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए। राजनीतिक रूप से सुखाड़िया और शेखावत दो अलग-अलग विचारधाराओं के प्रतिनिधि थे। एक ओर कांग्रेस के अत्यंत प्रभावशाली नेता और राजस्थान के दीर्घकालीन मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया थे, तो दूसरी ओर कांग्रेस के राजनीतिक वर्चस्व के सामने वैकल्पिक विचारधारा को मजबूत करने वाले भारतीय जनसंघ के प्रमुख नेता भैरोंसिंह शेखावत। लेकिन राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के बावजूद दोनों के व्यक्तिगत संबंध आत्मीय थे। यही कारण था कि सुखाड़िया जी ने राज्यपाल पद की औपचारिकताओं और राजनीतिक प्रतिबद्धताओं से ऊपर उठकर घायल शेखावत जी की कुशलक्षेम पूछना उचित समझा। यही इस छायाचित्र का सबसे बड़ा संदेश है—राजनीति में प्रतिद्वंद्विता हो सकती है, शत्रुता नहीं। “राजनीति में विरोधी हो सकता है, शत्रु नहीं” भैरोंसिंह शेखावत प्रायः कहा करते थे—“राजनीति में मेरा कोई विरोधी हो सकता है, शत्रु नहीं।” यह महज एक राजनीतिक वाक्य नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक आदर्श आचार-संहिता है। शेखावत जी ने अपने लंबे राजनीतिक जीवन में इस भावना को व्यवहार में भी उतारा। वे वैचारिक दृढ़ता के लिए जाने जाते थे, लेकिन व्यक्तिगत संबंधों को राजनीतिक मतभेदों से प्रभावित नहीं होने देते थे। सुखाड़िया जी और शेखावत जी के संबंध इसी राजनीतिक संस्कार का प्रमाण हैं। दोनों के बीच राजनीतिक मुकाबला स्वाभाविक था, लेकिन उस मुकाबले ने उनके व्यक्तिगत रिश्तों को विषाक्त नहीं होने दिया। एक कमरे में तीन राजनीतिक धाराएँ नहीं, तीन संस्कार इस चित्र का एक और महत्वपूर्ण पक्ष भानुकुमार शास्त्री जी की उपस्थिति है। उस समय वे भारतीय जनसंघ के प्रदेशाध्यक्ष और उदयपुर के विधायक थे। वे स्वयं अनेक अवसरों पर सुखाड़िया जी के सामने चुनाव मैदान में उतर चुके थे। कल्पना कीजिए—एक ही स्थान पर ऐसे तीन व्यक्तित्व उपस्थित हैं, जो राजनीतिक रूप से अलग-अलग धाराओं के प्रतिनिधि थे; चुनावी मैदान में एक-दूसरे के सामने खड़े हुए थे और नीतियों तथा विचारधारा को लेकर एक-दूसरे का विरोध भी करते रहे थे। फिर भी उस कमरे में कटुता नहीं, संवाद था; वैमनस्य नहीं, आत्मीयता थी; विरोध नहीं, व्यक्ति के प्रति सम्मान था। यही लोकतंत्र की वास्तविक सुंदरता है। विरोध विचारों का हो, व्यक्ति का नहीं। चुनाव संघर्ष का हो, संबंधों का नहीं। राजनीतिक प्रतिस्पर्धा हो, व्यक्तिगत कटुता नहीं। सुखाड़िया जी के राजनीतिक संस्कार मोहनलाल सुखाड़िया का व्यक्तित्व केवल उनके लंबे मुख्यमंत्रित्वकाल और प्रशासनिक उपलब्धियों से नहीं आंका जा सकता। उनके राजनीतिक संस्कारों का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी था कि वे अपने राजनीतिक विरोधियों के साथ संवाद और संबंधों की गरिमा बनाए रखते थे। भैरोंसिंह शेखावत जैसे प्रखर विपक्षी नेता के प्रति उनका व्यक्तिगत स्नेह बताता है कि उस पीढ़ी के नेता राजनीति को लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा के रूप में देखते थे, व्यक्तिगत वैमनस्य के रूप में नहीं। यही बात शेखावत जी के व्यक्तित्व पर भी लागू होती है। वे राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के विचारों से असहमत हो सकते थे, लेकिन उसके व्यक्तित्व और सार्वजनिक योगदान का सम्मान करना जानते थे। राजस्थान की राजनीति की गौरवशाली परंपरा यह परंपरा केवल सुखाड़िया, शेखावत और भानुकुमार शास्त्री तक सीमित नहीं थी। राजस्थान की उस पीढ़ी के अनेक नेताओं ने यह सिद्ध किया कि राजनीति लोकतंत्र का संघर्ष है, सामाजिक संबंधों का युद्ध नहीं। आज जब सोशल मीडिया के दौर में राजनीतिक असहमति कई बार तत्काल आरोप, आक्षेप और व्यक्तिगत कटुता में बदल जाती है, तब आधी सदी से अधिक पुराना यह छायाचित्र हमें अपने राजनीतिक संस्कारों की ओर लौटने का संदेश देता है। राजनीतिक विचारधारा के प्रति निष्ठा और विरोधी के प्रति सम्मान—ये दोनों परस्पर विरोधी नहीं हैं। बल्कि स्वस्थ लोकतंत्र की बुनियाद ही इसी संतुलन पर टिकी होती है। आज के राजनीतिक जीवन के लिए संदेश मोहनलाल सुखाड़िया जी की जयंती पर यह स्मृति-चित्र केवल एक महान राजनेता को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि राजस्थान की उस उदात्त राजनीतिक संस्कृति को नमन करने का अवसर भी है, जिसमें विचारधारा की दृढ़ता और व्यक्तिगत संबंधों की मधुरता साथ-साथ चलती थी। सुखाड़िया जी और शेखावत जी की मित्रता तथा इस प्रसंग में भानुकुमार शास्त्री जी की उपस्थिति हमें बताती है कि लोकतंत्र की शक्ति केवल बहुमत में नहीं, बल्कि सहिष्णुता, संवाद और प्रतिद्वंद्वी के प्रति सम्मान में भी निहित है। आज की राजनीति के लिए इस चित्र का संदेश स्पष्ट है— राजनीति में विरोध रखिए, वैमनस्य नहीं। विचारों में दृढ़ रहिए, व्यवहार में विनम्रता रखिए। चुनाव में प्रतिद्वंद्वी बनिए, जीवन में शत्रु नहीं। आज जब हम मोहनलाल सुखाड़िया जी को उनकी जयंती पर स्मरण कर रहे हैं, तब उनके साथ-साथ राजस्थान की उस गौरवशाली राजनीतिक परंपरा को भी नमन करना चाहिए, जिसमें मतभेद थे, लेकिन मनभेद नहीं; संघर्ष था, लेकिन कटुता नहीं; राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता थी, लेकिन व्यक्तिगत शत्रुता नहीं। यही विरासत आज के सार्वजनिक जीवन के लिए सबसे मूल्यवान संदेश है। मोहनलाल सुखाड़िया जी को जयंती पर विनम्र नमन। — डॉ. विजय विप्लवी Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading… Related Discover more from 24 News Update Subscribe to get the latest posts sent to your email. 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