24 News Updaet उदयपुर। मतदान केंद्र लोकतंत्र का मंदिर है। यह बात आम मतदाता को हर चुनाव में समझाई गई है। लेकिन इस मंदिर के कुछ नियम अलग-अलग भक्तों के लिए अलग-अलग दिखाई दे रहे हैं। आम मतदाता को मतदान केंद्र के भीतर मोबाइल फोन ले जाने पर हिदायत, रोक-टोक और कभी-कभी कड़ी फटकार मिल रही है। जबकि रसूखदारों और नेताओं के लिए वही परिसर कैमरा-फ्रेंडली फोटोशूट लोकेशन बनता नजर आता है।आज उदयपुर सहित पूरे प्रदेश में मतदान के दौरान सामने आई तस्वीरों ने इस दोहरे व्यवहार पर सवाल खड़े किए हैं। एक ओर आम मतदाताओं को स्पष्ट रूप से कहा जा रहा है कि मोबाइल फोन मतदान केंद्र के भीतर नहीं ले जा सकते। बाहर जमा करवा दो, पकड़े गए तो सख्त कार्रवाई होगी। खुद जिला कलेक्टर ने कल सख्त हिदायती आदेश दिया था। और तो और पत्रकारों तक को वोट डालते समय किसी का भी फोटो लेने से सख्त मनाही थी। मगर आज कलेक्टर साहब के आदेश धरे के धरे रहे गए। धज्जियां उड़ गई उन आदेशों की। प्रशासनिक अमला नेताओं और प्रत्याशियों के आगे बौना और बेबस नजर आया। लगा कि उसमें इच्छाशक्ति ही नहीं है, नियमों पर अमल करवाने की। कुछ जनप्रतिनिधि और राजनीतिक चेहरे मतदान केंद्र परिसर के भीतर तस्वीरें खिंचवाते दिखाई दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर डाल रहे हैं। सवाल यह नहीं कि तस्वीर किस—किसने व कैसे खिंचवाई। सवाल यह है कि नियमों की किताब में आम आदमी और प्रभावशाली व्यक्ति के लिए अलग-अलग अध्याय कब जुड़ गए? आम मतदाता के लिए अनुशासन, वीआईपी के लिए नियम ताक मेंचुनाव आयोग की व्यवस्था का मूल उद्देश्य मतदान की गोपनीयता और निष्पक्षता सुनिश्चित करना है। मोबाइल फोन या कैमरे के उपयोग पर प्रतिबंध इसी व्यवस्था का हिस्सा है, ताकि गोपनीयता प्रभावित न हो और मतदाता किसी दबाव में न आए। लेकिन यही नियम किसी साधारण मतदाता के लिए लोहे की दीवार बन गया और प्रभावशाली व्यक्ति के सामने उसकी धज्जियां उड़ गईं। प्रभावशाली नेता व प्रत्याशी स्याही लगाते हुए फोटो खिंचवा रहे हैं, लाइनों में लगे हुए फोटो खिंचवा रहे हैं। और तो और वोट डालते समय, उसके बाद भी शान से मतदान कक्ष में ही फोटो सेशन चल रहे हैं। उस समय प्रशासनिक अमले की बुद्धि लगता है घास चरने चली जाती है और जैसे ही आप और हम याने कि आमजन मोबाइल लेकर बूथ में प्रवेश करते हैं, नियमों की झड़ी लग जाती है। ऐसे में लोकतंत्र की विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। मतदान केंद्रों पर तैनात कर्मचारी आमजन से नियमों का पालन कराने में पूरी सख्ती दिखा रहे हैं। यह उनका कर्तव्य भी है। मगर वही प्रशासनिक मशीनरी जब नेताओं के मामले में चुप्पी साध लेती है, कई बार तो भीड़ को छंटवा रहे हैं कि हट जाओ, वरना नेताजी का फोटो बिगड़ जाएगा। संदेश बेहद स्पष्ट जाता है—कानून सबके लिए समान नहीं है, कुछ लोग उससे उपर है। कैमरा बंद करने की सलाह जनता को, फोटो फ्रेम नेताओं के लिएविडंबना देखिए कि जिस आम मतदाता को अपना मोबाइल बाहर जमा कराने, बंद रखने या मतदान केंद्र से दूर रखने की हिदायत दी जाती है, वही मतदाता जब किसी नेता को केंद्र के भीतर कैमरे के सामने सहजता से खड़ा देखता है, तो उसके मन में एक सीधा सवाल पैदा होता है—क्या लोकतंत्र में नागरिकता के साथ हैसियत भी बची है कि नहीं। उसका भी मन करता है कि बैलेट पैनल के पास खडा होकर फोटो सेशन करवाए। मगर उसके लिए तो यह सपने जैसा ही है। प्रशासन की भूमिका पर उठे सवालयदि किसी मतदान केंद्र पर मोबाइल फोन ले जाना नियमों के विरुद्ध है, तो यह प्रतिबंध सभी पर समान रूप से लागू होना चाहिए। चुनावी प्रक्रिया में सबसे बड़ी पूंजी जनता का विश्वास है जो प्रशासन ने खो दिया है। ये सभी तस्वीरें सिर्फ फोटो नहीं हैं। ये उस लोकतांत्रिक व्यवस्था का आईना हैं, जिसमें मतदान की गोपनीयता का पहरा आम आदमी के हिस्से आता है और कैमरे की चमक हर बार सत्ता के गलियारों तक पहुंच जाती है। Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading… Related Discover more from 24 News Update Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Post navigation उदयपुर में 60 प्रतिशत वोटर अब भी घरों से नहीं निकले, बुजुर्ग वोट डाल आए, आप क्या कर रहे हो?? राजस्थान में छोटे शहरों ने दिखाया दम, बड़े निगमों में मतदान की रफ्तार सुस्त चुनाव नहीं मजाक कहिये, वोटर लिस्ट में भाई साहब—भाभीजी और पत्नी का नाम, पतिदेव का नाम गायब!!! बीएलाओ बोलीं—पता नहीं ये कैसे हुआ?? बड़े स्तर पर महाघपले की आशंका