24 News update उदयपुर, 9 सितम्बर। एमबी अस्पताल में सेवाएं दे रही शाम्भवी डायग्नोस्टिक लैब से जुड़े मामले में हाथीपोल थाने में दर्ज एफआईआर के सामने आने के बाद कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। एफआईआर में पूर्व महापौर नगर निगम उदयपुर चन्द्र सिंह कोठारी को परिवादी बताया गया है और शाम्भवी लैब एवं अस्पताल प्रशासन से जुड़े मुकेश चौधरी के नाम आरोपी वाले कॉलम में दर्ज हैं। प्रकरण में धारा 125, 318(2) तथा 61(2) बीएनएस का उल्लेख किया गया है।
इस मामले में खास बात ये है कि पूर्व महापौर ने व्हीसल ब्लोअर बनकर कलेक्टर को जो शिकायत दी थी, उसी को आधार मानते हुए जांच हो गई, रिपोर्ट में दोषी सामने आ गए। लेकिन जब पुलिस के स्तर पर कार्रवाई की बात आई तो कोठारी साहब को ही परिवादी बना कर उनके नाम से ही एफआईआर दर्ज कर दी गई। शिकायत परिवाद बन गई और परिवाद से एफआईआर हो गई। गजब का खेल हो गया। जबकि खुद कोठारी ने ना एसपी को शिकायत देकर अपने नाम से एफआईआर करवाने की मांग की ना ही उन्हें बताया गया कि उनके नाम से ही एफआईआर की जा रही है। जो व्हीसल ब्लोअर है अब वही परिवादी बन गया है। ये गजब की बात राजनीतिक गलियारों में आज चर्चा का विषय बन गई है। लोग कह रहे हैं कि कोठारी साहब तो प्रशासन के पास अर्जी लेकर गए थे कि देखिये, सरकारी तंत्र में क्या गुल खिलाए जा रहे हैं और सरकारी तंत्र ने बजाय अपनी ओर से एफआईआर करवाने के, खुद पूर्व मेयर चंद्रसिंहजी को ही परिवादी बना दिया।
एफआईआर से जुड़ा सबसे बड़ा सवाल ये है कि परिवादी खुद अनजान है व हैरान है। पूर्व मेयर ने कहा कि मैंने तो कलेक्टर को शिकायत दी थी, मैं कैसे एफआईआर करवाने वाला बन गया। अब सवाल ये उठ रहा है कि क्या अनियमितताओं को उजागर करने वाला व्हिसलब्लोअर ही अब परिवादी बना दिए जाने का नया ट्रेंड उदयपुर में शुरू होने वाला है। अगर ऐसा हुआ तो यह बहुत ही खतरनाक ट्रेंड होगा। और लोग सरकारी सिस्टम में हुए महाभ्रष्टाचार को उजागर करने से ही कतराने लगेंगे। उनको डर रहेगा कि कहीं उनको ही परिवादी के रूप में पेश ना कर दिया जाए।

एक शिकायत ने बना दिया परिवादी
मामले से जुड़े सूत्रों के अनुसार पूर्व महापौर चन्द्र सिंह कोठारी की ओर से जिला कलेक्टर को दिया गया था। इस दौरान जिला कलेक्टर के आदेश क्रमांक 4105 दिनांक 6 मार्च, 2026 से पूरे मामले की प्रशासनिक जांच के लिए कमेटी गठित की गई। यानी प्रशासनिक स्तर पर एफआईआर से पहले ही मामला जिला प्रशासन के स्तर पर जांच के औपचारिक चरण से गुजर चुका था। ऐसे में अब सवाल उठ रहा है कि यदि मूल शिकायत जिला कलेक्टर को जनप्रतिनिधि की ओर से दी गई थी तो एफआईआर में परिवादी बदलने का आधार क्या था?

कलेक्टर के आदेश पर ही हुई थी विस्तृत जांच
अतिरिक्त जिला कलेक्टर (शहर) जितेन्द्र ओझा ने 23 मार्च 2026 को जिला कलेक्टर को जांच रिपोर्ट प्रस्तुत की। रिपोर्ट जिला कलेक्टर के 6 मार्च के आदेश के अनुपालन में गठित कमेटी की जांच पर आधारित थी। समिति में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. अशोक आदित्य, कोषाधिकारी (शहर) पार्थ शर्मा, चिकित्सक डॉ. धन्दरी जैन तथा डॉ. चंदन मल जैन भी शामिल थे। कमेटी ने शाम्भवी डायग्नोस्टिक सेंटर का मौका निरीक्षण किया और लैब प्रबंधन के स्पष्टीकरण के साथ आरएनटी मेडिकल कॉलेज, महाराणा भूपाल चिकित्सालय तथा संबंधित अधिकारियों से प्राप्त रिपोर्ट और दस्तावेजों का परीक्षण किया। इसके बाद छह प्रमुख बिंदुओं पर निष्कर्ष दर्ज किए गए।

जांच रिपोर्ट में लैब के NABL प्रमाण-पत्र पर सवाल
प्रशासनिक जांच में सामने आया कि महाराणा भूपाल चिकित्सालय में लैब सेवाओं के लिए NABL प्रमाणित लैब की अनिवार्यता रखी गई थी। रिपोर्ट के अनुसार दस्तावेजों के परीक्षण में 19 अगस्त 2023 से 8 सितंबर 2024 तक शाम्भवी लैब लखनऊ का NABL प्रमाण-पत्र उपलब्ध नहीं पाया गया। जांच समिति ने इसे निविदा की शर्त संख्या 08 का उल्लंघन माना।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि फर्म की ओर से निविदा कमेटी के समक्ष वाराणसी का NABL प्रमाण-पत्र प्रस्तुत किया गया था। जांच रिपोर्ट ने इस पूरे दस्तावेजी पहलू को गंभीरता से दर्ज किया है।

उदयपुर में लैब का संचालन, लेकिन रजिस्ट्रेशन नहीं
जांच समिति के अनुसार शाम्भवी लैब ने उदयपुर में अलग-अलग पते दर्शाए और बायोमेडिकल वेस्ट से संबंधित प्रमाण-पत्र तथा मशीनों की स्थापना का प्रमाण-पत्र भी प्रस्तुत किया। लेकिन रिपोर्ट में कहा गया कि उदयपुर में लैब संचालन के लिए नैदानिक स्थापना अधिनियम, 2010 के तहत रजिस्ट्रेशन नहीं कराया गया था। समिति ने इसे उदयपुर में लैब के संचालन से जुड़ा गंभीर बिंदु माना। रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि लैब प्रबंधन ने बताया कि शुरुआती दौर में उदयपुर में लैब संचालित की गई, लेकिन सैंपल कम होने के कारण इसे बंद कर दिया गया। जांच समिति ने सवाल उठाया कि इसकी सूचना अस्पताल प्रशासन को क्यों नहीं दी गई।

उदयपुर से लखनऊ सैंपल, 24 घंटे में रिपोर्ट पर संदेह
जांच रिपोर्ट में सैंपल परिवहन को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की गई है। रिपोर्ट के अनुसार निर्धारित प्रक्रिया के तहत कुछ जांचें शाम्भवी लैब को आउटसोर्स की जाती थीं और निविदा शर्तों के मुताबिक रिपोर्ट 24 घंटे के भीतर उपलब्ध कराना आवश्यक था। जांच समिति ने पाया कि शाम्भवी लैब द्वारा सैंपल लखनऊ भेजे जाते थे। ऐसे में समिति ने सवाल उठाया कि उदयपुर से सैंपल लखनऊ भेजे जाने के बावजूद 24 घंटे के भीतर रिपोर्ट प्राप्त होना किस प्रक्रिया के तहत संभव हुआ। रिपोर्ट में ऐसे मामलों में किए गए भुगतान की विस्तृत जांच की आवश्यकता भी बताई गई है।

सितंबर 2025 से जनवरी 2026 तक जांचों में अचानक बढ़ोतरी

जांच में रिकॉर्ड के आधार पर यह भी सामने आया कि संबंधित लैब को भेजी जाने वाली जांचों की संख्या में सितंबर 2025 से जनवरी 2026 के बीच अचानक वृद्धि हुई। समिति ने रिपोर्ट में कहा कि उपलब्ध दस्तावेजों में इस अचानक बढ़ोतरी का कारण स्पष्ट नहीं किया गया है।

अस्पताल प्रशासन की निगरानी पर भी गंभीर टिप्पणी
जांच रिपोर्ट का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि समिति ने केवल लैब प्रबंधन पर ही सवाल नहीं उठाए, बल्कि अस्पताल प्रशासन की निगरानी व्यवस्था पर भी गंभीर टिप्पणी की। रिपोर्ट के अनुसार निविदा अवधि के दौरान करीब दो वर्ष तक तथा 12 जनवरी 2026 को शिकायत प्राप्त होने के बाद भी महाराणा भूपाल चिकित्सालय के अधीक्षक या उनके प्रतिनिधि द्वारा लैब का भौतिक निरीक्षण नहीं किया गया। समिति ने इसे चिकित्सालय प्रशासन की गंभीर प्रशासनिक लापरवाही बताया। इसी प्रकार शिकायत मिलने के बाद सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल के अधीक्षक तथा आरएनटी मेडिकल कॉलेज के प्रधानाचार्य एवं नियंत्रक अथवा उनके प्रतिनिधि द्वारा भी लैब का भौतिक निरीक्षण नहीं किए जाने को समिति ने पर्यवेक्षणीय लापरवाही बताया।

जब जांच पहले ही हो चुकी थी तो अब एफआईआर में परिवादी एमबी अस्पताल के कर्ताधर्ता क्यों नहीं?

पूरा मामला अब पुलिस कार्रवाई की प्रक्रिया को लेकर सबसे बड़ा सवाल खड़ा करता है। उपलब्ध प्रशासनिक दस्तावेज बताते हैं कि 6 मार्च को जिला कलेक्टर ने जांच के आदेश दिए, कमेटी ने मौका निरीक्षण किया और 23 मार्च को विस्तृत जांच रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी। रिपोर्ट में लैब के दस्तावेजों, संचालन, सैंपल परिवहन, NABL प्रमाण-पत्र और अस्पताल प्रशासन की निगरानी सहित कई बिंदुओं पर टिप्पणियां दर्ज हैं। ऐसे में यदि पुलिस ने बाद में इसी मामले में एफआईआर दर्ज की तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि मूल आधार क्या था? क्या जिला कलेक्टर को दिया गया पूर्व महापौर का परिवाद था, कलेक्टर की जांच रिपोर्ट थी यदि हां थी तो सरकारी स्तर पर एफआईआर क्यों नहीं की गई। और यदि मूल परिवाद पूर्व महापौर की ओर से था, तो पुलिस रिकॉर्ड में व्हिसलब्लोअर को परिवादी बनाए जाने का आधार क्या है?

जनप्रतिनिधि के ज्ञापन को आधार मानकर एफआईआर तो जांच रिपोर्ट का क्या?
मामले में एक और अहम सवाल यह है कि यदि पुलिस ने जनप्रतिनिधि द्वारा जिला कलेक्टर को दिए गए ज्ञापन/परिवाद को ही अपराध का आधार माना, तो उस दस्तावेज और बाद में दर्ज एफआईआर के बीच की कड़ी रिकॉर्ड में स्पष्ट होनी चाहिए। क्योंकि जिला प्रशासन या जांच करने वाले तंत्र के पास जांच रिपोर्ट पहले ही उपलब्ध थी और उसमें जांच समिति ने कई बिंदुओं पर स्पष्ट निष्कर्ष दर्ज किए थे। पुलिस जांच में यह भी सामने आना चाहिए कि कलेक्टर की जांच रिपोर्ट में दर्ज निष्कर्षों को एफआईआर में किस रूप में लिया गया और किन बिंदुओं पर स्वतंत्र पुलिस जांच शुरू की गई।


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