24 न्यूज अपडेट. उदयपुर। मेनान में आज जमरा बीज पर बारूद से होली खेली जाएगी। इसे देखने के लिए दूर-दूर से बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। उदयपुर से 40 किलोमीटर दूर मेनार गांव की होली के साथ पुरातन इतिहास जुड़ा हैं। करीब 500 वर्ष पूर्व इस गांव के रणबांकुरों ने मुगलों की सेना को शिकस्त देने के उत्साह में इस अनूठी होली का आयोजन किया था तब से यह परम्परा चली आ रही हैं। शाम ढलने के साथ ही गांव में होली की तैयारियां परवान चढ़ने लगती हैं। मेनारिया समाज के लोग अपने हाथों में गोला-बारूद के साथ होली खेलना शुरू कर देते हैं। पूरा गांव जमराबीज के दिन काफी खूबसूरत तरीके से रंग-बिरंगी लाइटें सजी हुई नजर आती हैं.वहीं, शाम ढलने के साथ ही गांव के अलग-अलग रास्तों से रणबांकुरों की टोलियां सेना की टुकड़ियों के वेश में अलग-अलग रास्तों से मुख्य चौक में पहुंचती हैं. इसके बाद यहां बंदूक और बारूद की चिंगारियां उस दिन की याद दिलाती हैं, जिस दिन यहां के आसपास के इलाकों में रणबांकुरों ने मुगल आक्रांताओं को धूल चटा दी थी. 500 साल से चली आ रही इस परंपरा को अब बारूद की होली के नाम से पहचाना जाने लगा है। आज भी प्राचीन ठाकुरजी मंदिर ओंकारेश्वर चौपक में मनाए जाने वाले पर्व की तैयारियों पूर्ण हो चुकी है। बंदूकें, तलवारे एवं तोपो की साफ सफाई पहले कर दी गई थी। वही अपनी पारंपरिक वेशभूषा के लिए भी कई युवा धोती, कुर्ता तैयार करवा दिए है।जब मुगलों पर टूट पड़े रणबांकुरेजब मेवाड़ पर महाराणा अमर सिंह का राज्य था। उस समय मेवाड़ की पावन धरा पर जगह जगह मुगलों की छावनिया (सेना की टुकडिया) पड़ी हुई थी। इसी तरह मेनार में भी गाँव के पूर्व दिशा में मुगलों ने अपनी छावनी बना रखी थी। इन छावनियों के आतंक से लोग दुःखी थे। मेनारिया ब्राह्मण भी मुग़ल छावनी के आतंक से त्रस्त हो चुके। उस समय जब मेनारवासियों को वल्लभनगर छावनी पर विजय का समाचार मिला तो गावं के वीरों ने ओंकारेश्वर चबूतरे पर इकट्ठे हुए और युद्ध की योजना बनाई गई। उस समय गांव छोटा और छावनी बड़ी थी। समय की नजाकत को ध्यान में रखते हुए कूटनीति से काम लिया। इस कूटनीति के तहत होली का त्यौहार छावनी वालो के साथ मनाना तय हुआ। होली और धुलंडी साथ साथ मनाई गई। चेत्र माघ कृष्ण पक्ष द्वितीय विक्रम संवंत 1657 की रात्रि को राजवादी गैर का आयोजन किया गया गैर देखने के लिए छावनी वालो को आमंत्रित किया गया। ढोल ओंकारेश्वर चबूतरे पर बजाया गया। नंगी तलवारों, ढालो तथा हेनियो की सहायता से गैर खेलनी शुरू हुई। अचानक ढोल की आवाज ने रणभेरी का रूप ले लिया। गांव के वीर छावनी के सैनिको पर टूट पड़े। रात भर युद्ध चला। ओंकार माराज के चबूतरे से शुरु हुई लड़ाई छावनी तक पहुंच गई और मुगलों को मार गिराया और मेवाड़ को मुगलो के आतंक से बचाया। आज मेनार में उसी याद में शौर्य और वीरता पर्व मनाया जाता है। Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading... Related Discover more from 24 News Update Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Post navigation भजनलाल सरकार ने 90 दिनों में किए ऐतिहासिक फैसले :-गरासिया मस्ती में डूबी पुलिस की होली