रिपोर्ट- जयवंत भैरविया24 News Update उदयपुर। ये उपाधियां यूडीए को यूं ही नहीं मिली है। यूडीए के अफसरों ने पुरातन काल से वर्तमान राहु—ल काल तक कुछ खास लोगों और खास तरह के समूहों की चरण वंदना करते हुए बहुत ही मेहनत से छलिया, दीवाना, अनाड़ी जैसी व्यांग्यात्मक उपाधियां हासिल की है। पब्लिक क्या सोचती होगी, किस तरह से लोगों में खुलेआम भ्रष्टाचार की चर्चा होती होगी, नियमों को तोड़ मरोड़ कर पेश करने पर कितनी भद्द पिटती होगी। यह शायद यूडीए के पूरे सिस्टम के थॉट प्रोसेस से ही बाहर की बात हो गई है। हर हाल में उनके लिए काम करना है, हर हाल में उनको बचाना है। फिर चाहे जिस हद से गुजर जाने की नौबत ही क्यों ना आ जाए। सत्ता का चाहे जो दौर हो, हाथ से लेकर कमल तक और अब तो भगवा भी। कोई भी रंग या रंगत हो, इन पर कोई असर नहीं हुआ। क्योंकि सिस्टम में केवल नाम बदलते हैं, लाभ पाने वालों के चेहरे बदलते हैं। अंदर से सब कुछ वैसा ही चलता रहा है।हमने उदयपुर के डीपीएस मामले की जो परतें खोली हैं, अगर आपने उसके सभी एपिसोड नहीं पढ़े हैं तो आज ही इस खबर के आनलाइन संस्करण के नीचे मौजूद सभी खबरों का अवलोकन जरूर करें। आपको पता चला जाएगा कि यूडीए किस तरीके से केवल डीपीएस को बचाने के लिए किस हद तक चला गया है। जमीनों का ऐसा खेल जो अब नजीर बन गया है, उदयपुर के महाघपलों के इतिहास की पन्नों के कवर पेज की स्टोरी बन गया है।ऐसी भी क्या मजबूरी राहु—ल जी, एक कागज तक नहीं चला पाएउदयपुर का सबसे बड़ा और सर्वाधिक चर्चित जमीन आवंटन घोटाला DPS स्कूल का है। किस तरह DPS की मंगलम एजुकेशन सोसायटी लगतार UDA की जमीनों को निगलती रही और बार—बार उनका कौड़ियों के भाव आवंटन भी किया जाता रहा यह अब जग जाहिर हो गया है। जमीन भु आवंटन नीति 2015 का उल्लंघन करके DPS को जमीन दी जाती रही और अब तक 4 लाख वर्ग फीट से ज्यादा जमीन दी जा चुकी है। फिर भी DPS स्कूल के कब्जे में UDA की और जमीन हैं। जिसे आंकड़ों का खेल खेलकर DPS को दिए जाने की तैयारी हो रही है। जनता पूछ रही है कि मुहोब्बत में हद से गुजर जाने के पीछे आखिर मजबूरी क्या है?? यूं ही नहीं कोई इतना दिलो—जान से किसी पर मरता है। कोई आशिक इस खबर को पढ़ रहा हो तो वो यूडीए से रश्क कर सकता है।आंकड़े हैं या गिरगिट, फाइलों में बदलते रहते हैं रंग!!DPS की कब्जाई जमीन के आंकड़ें गिरगिट की तरह रंग बदल रहे हैं। 2016 में तब के UIT सचिव रामनिवास मेहता की जांच में पाया गया कि 82,628 वर्ग फीट जमीन पर यूडीए की जमीन पर सोसायटी ने कब्जा कर रखा है, जिसे खाली करने का नोटिस भी दिया गया। इस पर जैक जरिये से बात नहीं बनी तो डीपीएस हाईकोर्ट चला गया। आपको अचरज होगा कि केस के दौरान ही अधिकारी भी जमीन के आंकड़े बदलते रहे। जैसे साल 2018 में उज्जवल राठौड़ ने 56,524 वर्ग फीट पर अग्रवाल का कब्जा बताया तो साल 2023 में नितेंद्रपाल सचिव ने 99,870 वर्ग फीट का कब्जा बताया। भाई ये कोई साम्राज्यवाद चल रहा है क्या, मेरे मन को भाया,,,,मैं जमीन का और कब्जा कर आया। क्या कैमेस्ट्री है यूडीए और सोसायटी की। बहुत याराना लगता है।पत्रकार की शिकायत पर राज्य सरकार का एक्शनपत्रकार की ओर से राज्य के तत्कालीन मुख्य सचिव सुधांशु पंत को शिकायत से जगाया गया। बताया गया कि भाई साहब, ये हो क्या रहा है?? ये कौनसा जादू है कि जमीन बढ़ते ही जा रही है। शिकायत के बाद UDA को जांच के आदेश जारी हुए। जांच में सामने आया कि DPS स्कूल को जिस उद्देश्य से कौड़ियों के भाव ज़मीन दी गई थी उनकी आवंटन शर्तो की पालना ही नही की गई है। राहु—ल काल की महामशीन का महा—अविष्कार, 23,894 वर्ग फीट की गैप भूमिराहु—ल काल तक आते—आते कहानी में और अधिक ट्विस्ट आ गया। इस बार गैप भूमि की एंट्री हो गई। हमारी पिछली खबर में आपने पढ़ा ही होगा कि गैप भूमि शब्द का खेल आखिर क्या है??? राहु—ल जी जपनाम करते नजर आ रहे हैं गेप भूमि का— तुझे जमीं, पर उतारा गया है…डीपीएस के लिए। तूं अब से पहले सितारों में बस रही थी कहीं…??? DPS के पास आवंटन से अधिक जमीन होने की जांच रिपोर्ट जो सरकार को भेजी गई उसमें भी विरोधाभास बातें आने पर। सरकार कन्फयूजिया गई। सरकार के पेट में हैडेक हो गया और आईएएस अफसरों की बुद्धि भ्रम का शिकार होकर पानी भरने चली गई। नाराजगी जताते हुए विस्तृत तथ्यात्मक टिप्पणी मांग ली गई। एकमेव सवाल जो उठा—भाई बताओ तो सही, असल जमीन कितनी दबा कर बैठे हैं। कोई तो ज्योग्राफिया होगा, कोई तो नाप, सूत, सांवल होगा या हर बार रिपोर्ट में धूल में लठ पेले जा रहे हो।सरकार को भेजी गई रिपोर्ट में UDA आयुक्त ने बताया कि सरजी, DPS के पास ओवरलेपिंग के कारण 23,894 की गैप भूमि दिख रही है। वाह….क्या सीन है???? अचानक गैप भूमि दिखने लग गई जो पहले कभी नहीं दिखाई दी। ना जाने आंखों में कौनसे बाबाजी वाली दवा डाल कर देख लिया और जमीन का नामकरण संस्कार भी कर दिया—गैप भूमि। शब्द का नामकरण संस्कार ना जाने कितने ”अन्न—प्राशन” संस्कार के बाद फलित हुआ यह अर्थशास्त्र तो हम नहीं बता सकते मगर हुआ जरूर कुछ तगड़ा वाला होगा। रेवेन्यू की शब्दावली बनाने वाला महापुरूष आज जिंदा होता तो 24 हजार वर्गफीट की गैप भूमि शब्द सुनकर ही संन्यास लेकर हिमालय क गुफाओं में तपस्या करने चला जाता। दुनिया से उसका मोह भंग हो जाता। अपना सपना मनी—मनी,,,,आंकड़ों में उलझाओ, डीपीएस को बचाओअब तक UIT अब UDA के तीन पूर्व सचिवों की जांच रिपोर्ट में DPS के कब्जे की भूमि के अलग—अलग आंकड़े बताए गए, जिन पूर्व UIT सचिव राम निवास मेहता की ईमानदारी की कसमें खाई जाती थी, उनकी जांच रिपोर्ट को भी सही नही माना गया तो फिर कैसे मान लिया जाए कि राहुल जैन की रिपोर्ट सही है?सवाल तो इसलिए भी उठते है कि DPS की फ़ाइल में लगभग 120 दिन बाद भी आवंटन शर्तो का उल्लंघन करने के कारण DPS का जमीन आवंटन निरस्त करने की कोई कार्यवाही नही की गई है और RTI में भी जवाब दिया गया है कि आवंटन निरस्त करने की कोई कार्यवाही नही की गई है और न ही DPS स्कूल को कोई नोटिस दिया गया है। सवाल यह ठोस है कि अब UDA इतना मजबूर क्यों है ?, क्यों अब तक आवंटन निरस्त नही किया गया है। कौनसे रंग का झंडा उसे दिख गया है जमीन पर?? या कहीं से फोन—फान आ गया किसी सिस्टम के हाथी का जो लंबलेट हुए जा रहे हो। सरकार को पत्र लिखने में भी राहु—ल जी की कलम क्यों कांप रही है??? उनको डर किससे लग रहा है। सवाल बहुत बड़े हैं। यदि पत्र नहीं लिखेंगे तो इतिहास उन्हें कायर कहने से कभी नहीं चूकेगा। गलत बातों पर पर्देदारी करने वाले अफसरों को भी आजीवन खुद को माफ नहीं कर सकने वाली गिल्ट से छुटकारा नहीं मिल पाएगा। Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading... 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