24 News Update उदयपुर। पूर्व सांसद एवं आदिवासी राष्ट्रीय अधिकार मंच की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वृंदा करात ने कहा है कि जंगल बचाने के नाम पर सरकार की नजर जंगलों में बसे आदिवासियों पर है, जबकि वास्तविकता यह है कि आदिवासी ही जंगलों के सबसे बड़े संरक्षक हैं। उन्होंने कहा कि अब आदिवासियों के सामने अपने जीवन, सम्मान और संस्कृति की रक्षा के लिए “करो या मरो” की स्थिति है और उन्हें मजबूत जनआंदोलन खड़ा करना होगा।
वे शनिवार को माछला मंगरा स्थित शिराली भवन में उदयपुर और डूंगरपुर जिलों में वनाधिकार पट्टों की मांग को लेकर आयोजित युवा प्रशिक्षण शिविर को संबोधित कर रही थीं। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र में भाजपा सरकार बनने के बाद राजस्थान में किसी भी नए पात्र व्यक्ति को वनाधिकार का पट्टा नहीं मिला है, जिससे सरकार का आदिवासियों के प्रति रवैया स्पष्ट होता है। उन्होंने भाजपा को आदिवासियों की “दुश्मन नंबर एक” पार्टी बताते हुए कहा कि उसकी नीतियां आदिवासी समाज के अधिकारों को कमजोर कर रही हैं।
वृंदा करात ने कहा कि प्रदेश में वनाधिकार कानून के तहत प्राप्त 1.18 लाख से अधिक आवेदनों में से करीब 51 हजार आवेदनों को ही स्वीकृति मिली, जबकि 66 हजार से अधिक आवेदन निरस्त कर दिए गए। उन्होंने बताया कि उदयपुर जिले में भी 22 हजार से अधिक आवेदनों में लगभग 12 हजार स्वीकृत हुए, जबकि करीब 10 हजार आवेदन खारिज कर दिए गए। उनका आरोप था कि वनाधिकार कानून में 25 बीघा तक भूमि का अधिकार होने के बावजूद अधिकांश पात्र परिवारों को केवल दो से चार बीघा भूमि के ही पट्टे दिए गए हैं।
उन्होंने कहा कि कानून के अनुसार जिला स्तरीय समिति को वनाधिकार पट्टों पर अंतिम निर्णय का अधिकार है, लेकिन सरकारों ने इस व्यवस्था को प्रभावहीन बना दिया है। जंगलों में रहने वाले लोगों को सड़क, बिजली, पेयजल और स्कूल जैसी बुनियादी सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं कराई जा रही हैं, जबकि कानून में इसके लिए कोई रोक नहीं है। उन्होंने कहा कि “आदिवासी जितनी जमीन पर खेती करता है, वह उसी जमीन का मालिक है” और सरकार, प्रशासन तथा पूंजीपतियों को उसकी भावनाओं से खिलवाड़ नहीं करना चाहिए। उन्होंने घोषणा की कि वनाधिकार पट्टों के मुद्दे पर उदयपुर जिले में जल्द ही बड़ा आंदोलन शुरू किया जाएगा।
कार्यक्रम में आदिवासी जनाधिकार एका मंच के प्रदेश अध्यक्ष दुलीचंद मीणा ने आरोप लगाया कि अधिकारियों ने बिना समुचित जांच के बड़ी संख्या में आवेदनों पर “मौके पर कब्जा नहीं पाया गया” लिखकर उन्हें खारिज कर दिया, जिससे हजारों आदिवासी परिवार अपने अधिकारों से वंचित रह गए। उन्होंने कहा कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ने आदिवासियों के साथ न्याय नहीं किया तथा विभिन्न राजनीतिक दलों ने भी उनके मूल मुद्दों की अनदेखी की है।
दुलीचंद मीणा ने कहा कि आदिवासी “वनवासी” नहीं बल्कि जंगलों के मूल निवासी हैं और उन्हें किसी धर्म विशेष से जोड़ना भी उनके साथ अन्याय है। उन्होंने जनगणना में आदिवासियों के लिए अलग कॉलम बनाए जाने की भी मांग की।
शिविर में माकपा जिला सचिव राजेश सिंघवी, आदिवासी जनाधिकार एका मंच के जिला अध्यक्ष हाकरचंद खराड़ी, जिला सचिव प्रेम पारगी, देवाराम, प्रभुलाल भगोरा, श्रवण, नौजवान सभा के रमेश, डूंगरपुर के बाबूलाल, फाल्गुन बरांडा सहित कई सामाजिक कार्यकर्ता एवं युवा उपस्थित रहे।


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