मालदास स्ट्रीट आराधना भवन में चल रहे है निरंतर धार्मिक प्रवचन

24 News Update उदयपुर. मालदास स्ट्रीट स्थित आराधना भवन में जैनाचार्य श्रीमद् विजय रत्नसेन सूरीश्वर महाराज की निश्रा में बड़े हर्षोल्लास के साथ चातुर्मासिक आराधना चल रही है।  
श्रीसंघ के कोषाध्यक्ष राजेश जावरिया ने बताया कि मंगलवार को आराधना भवन में जैनाचार्य श्रीमद् विजय रत्नसेन सूरीश्वर ने प्रवचन देते हुए कहा पाप के स्वीकार में बालक बनो, इंसान मात्र भूल का पात्र है। जीवन में जाने-अनजाने में कई भूलें हो जाती हैं, परन्तु भूल हो जाने के बाद उन भूलों का हृदय से स्वीकार होना चाहिए। जो व्यक्ति अपनी भूलों को स्वीकार नहीं करता है, उस आत्मा की कभी शुद्धि नहीं होती है। भूलों की शुद्धि करने के लिए बालक जैसा हृदय होना चाहिए । बालक का हृदय दर्पण की भाँति एकदम स्वच्छ होता है, उसे माया कपट करना नहीं आता है। जो पाप जिस रूप में हो गया हो, उसे वह तुरन्त स्वीकार कर लेता है। अत: आलोचना प्रायश्चित्त करते समय बालक की तरह सरल बनना चाहिए । पाँव में काँटा लग जाय तो हम तुरन्त ही उसे बाहर निकालने की कोशिश करते हैं। यदि काँटे को बाहर न निकाला जाय तो वह भविष्य में भयंकर तकलीफ दे सकता है। जीवन में कोई पाप हो जाने के बाद उस पाप को छिपाना यह आत्मा का शल्य है। आत्मा में रहे इस शल्य को बाहर निकालना बहुत ही जरूरी है। समय रहते उस शल्य को बाहर नहीं निकाला जाय तो भविष्य में आत्मा की स्थिति अत्यन्त ही भयंकर हो सकती है। अत: साधक आत्मा को शल्य युक्त होकर एक क्षण भी नहीं रहना चाहिए । देह के शल्य से भी आत्मा का यह शल्य अत्यन्त ही खतरनाक है। देह का शल्य अल्प समय के लिए नुकसान करता है, जबकि आत्मा का यह शल्य अनेक भवों तक आत्मा को हैरान-परेशान करता है। लक्ष्मणा साध्वी आदि के प्रसंगों को जानने के बाद तो अपनी आत्मा की शुद्धि के लिए एक क्षण भी प्रमाद नहीं करना चाहिए । रोग को छिपाने से रोग घटता नहीं है, बल्कि बढ़ता ही जाता है, इसी प्रकार शल्य पूर्वक धर्म-आराधना करने से आत्मा का रोग मिटता नहीं है, बल्कि यह रोग बढ़ता ही जाता है। पाप की आलोचना भी शल्य रहित करे तो ही लाभ होता है। जिन-जिन आत्माओं ने पाप को छिपाने की कोशिश की, उन-उन आत्माओं का संसार बढ़ा है और जिन्होंने शल्य रहित होकर अपने पापों का प्रायश्चित किया, वे आत्माएँ अल्पकाल में ही मोह माया के बंधन से सर्वथा मुक्त बनी हैं। साधक आत्मा का यह कर्तव्य है कि वह भूलकर भी आत्मा शल्य को स्थान न दे । जो आत्मा सरल है अर्थात् जिसमें माया-कपट की गाँठें नहीं हैं, उन्हीं आत्माओं की शुद्धि हो सकती है, उन्ही आत्माओं का कल्याण हो सकता है । परन्तु जो आत्माएँ मायावी हैं, कपटी है, उन आत्माओं का कभी कल्याण नहीं हो सकता है। मायावी व्यक्ति का जीवन मुख में राम और बगल में छुरी जैसा होता है। हाथी के चबाने के दाँत अलग होते हैं और दिखाने के दांत अलग होते हैं। मायावी व्यक्ति बाहर से अलग दिखावा करता है और उसके भीतर कुछ और ही होता है। धागे में गाँठ आने के साथ ही जैसे सिलाई मशीन खटखटाने लगती है, उसी प्रकार हृदय में माया आने के साथ ही विकास की गति अवरुद्ध हो जाती है।
  इस अवसर पर कोषाध्यक्ष राजेश जावरिया, अध्यक्ष डॉ.शैलेन्द्र हिरण, नरेंद्र सिंघवी, हेमंत सिंघवी, जसवंत सिंह सुराणा, भोपाल सिंह सिंघवी, गौतम मुर्डिया, प्रवीण हुम्मड सहित कई श्रावक-श्राविकाएं मौजूद रही। 


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