24 News Update नई दिल्ली। वोटर लिस्ट की विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया यानी SIR को लेकर चल रहे देशव्यापी विवाद पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुआई वाली बेंच ने चुनाव आयोग की इस प्रक्रिया को वैध और संवैधानिक ठहराते हुए कहा कि निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए आयोग विशेष प्रक्रिया अपना सकता है और इसे मनमाना नहीं माना जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने साथ ही चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि जिन लोगों के नाम संदिग्ध नागरिकता के आधार पर वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं, उनके मामलों को चार सप्ताह के भीतर केंद्र सरकार की संबंधित एजेंसियों के पास भेजा जाए। अदालत ने कहा कि संबंधित एजेंसियां प्रभावित लोगों को नोटिस देकर उनका पक्ष सुनें और चुनाव से पहले अंतिम फैसला लें।

दरअसल, चुनाव आयोग ने करीब 11 महीने पहले बिहार से SIR अभियान की शुरुआत की थी। इसके बाद पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में भी विशेष पुनरीक्षण कराया गया, जबकि असम में स्पेशल रिवीजन प्रक्रिया अपनाई गई। इन राज्यों में करीब 2.65 करोड़ मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए थे। बिहार में शुरू हुई यह प्रक्रिया बाद में सुप्रीम कोर्ट पहुंची, जहां अलग-अलग राज्यों से कई याचिकाएं दायर की गईं।

करीब 10 महीने तक चली सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पांच प्रमुख सवालों पर अपना फैसला सुनाया। अदालत ने साफ कहा कि चुनाव आयोग के पास SIR कराने का अधिकार है और केवल इसलिए इसे अवैध नहीं कहा जा सकता क्योंकि यह सामान्य प्रक्रिया से अलग है। कोर्ट ने माना कि SIR का उद्देश्य चुनावी व्यवस्था को कमजोर करना नहीं, बल्कि वोटर लिस्ट को अधिक पारदर्शी और शुद्ध बनाना है।

अदालत ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया संतुलित है और इसमें किसी प्रकार की मनमानी नहीं दिखती। कोर्ट के मुताबिक आयोग के कदम जरूरत से ज्यादा कठोर नहीं हैं और वोटर लिस्ट को अद्यतन रखने के लिए इस तरह की प्रक्रिया जरूरी हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि SIR प्रक्रिया ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम’ के खिलाफ नहीं है। अदालत ने कहा कि जब प्रक्रिया कानूनी और उचित पाई गई है तो इसे कानून का उल्लंघन नहीं माना जा सकता।

दस्तावेजों की जांच को लेकर भी अदालत ने चुनाव आयोग के पक्ष को सही माना। कोर्ट ने कहा कि आधार कार्ड समेत 11 प्रकार के दस्तावेजों को मान्य मानना मनमाना फैसला नहीं है। साथ ही बिना किसी स्पष्ट नियम के दस्तावेजों की जांच करना भी उचित नहीं होगा।

इस पूरे मामले में विपक्ष लगातार चुनाव आयोग पर सवाल उठाता रहा है। विपक्षी दलों का आरोप है कि SIR प्रक्रिया के जरिए बड़ी संख्या में लोगों को मतदान अधिकार से वंचित करने की कोशिश की गई। विपक्ष ने यह भी पूछा कि अगर वोटर लिस्ट में इतनी खामियां थीं तो पिछले दो दशकों में हुए चुनावों की विश्वसनीयता पर सवाल क्यों नहीं उठाया गया।

विपक्ष ने बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले SIR प्रक्रिया शुरू किए जाने के समय पर भी सवाल खड़े किए। विपक्ष का कहना है कि अगर पुनरीक्षण जरूरी था तो इसे चुनाव के बाद भी कराया जा सकता था, लेकिन जल्दबाजी में उठाए गए कदमों ने संदेह पैदा किया।


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By desk 24newsupdate

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