जयपुर, 28 सितंबर। बाल यौन शोषण सामग्री (CSEAM) के प्रसार के खिलाफ राजस्थान पुलिस की साइबर क्राइम शाखा ने बड़ी कार्रवाई की है। पुलिस ने तकनीकी विश्लेषण और एनसीएमईसी की टिपलाइन रिपोर्ट के आधार पर 15,326 मोबाइल नंबर, करीब 7,800 यूआरएल/सोशल मीडिया प्रोफाइल और 100 डिवाइस चिन्हित कर ब्लॉक करवाए हैं। प्रदेश के कई जिलों में ऐसे मामलों में एफआईआर दर्ज कर कार्रवाई भी की गई है।

महानिदेशक पुलिस राजीव कुमार शर्मा के निर्देश पर चल रही कार्रवाई की जानकारी देते हुए अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक साइबर क्राइम वी.के. सिंह ने बताया कि टेलीग्राम और डिस्कॉर्ड जैसे प्लेटफॉर्म पर गुप्त अथवा पेड ग्रुप और चैनल बनाकर बाल यौन शोषण संबंधी आपत्तिजनक सामग्री का आदान-प्रदान किया जा रहा है। इनमें कई लोग फर्जी अथवा गुमनाम पहचान के साथ जुड़ते हैं।

पुलिस के अनुसार कई मामलों में सामग्री निजी संदेशों के जरिए भेजी जाती है, जबकि कुछ मामलों में गूगल ड्राइव या अन्य क्लाउड स्टोरेज पर सामग्री अपलोड कर उसका लिंक साझा किया जाता है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पुलिस की नजर से बचने के लिए कोडेड शब्दों और हैशटैग का इस्तेमाल किए जाने की भी जानकारी सामने आई है। कई बार इंस्टाग्राम या फेसबुक से संपर्क शुरू करने के बाद बातचीत को अपेक्षाकृत कम निगरानी वाले प्लेटफॉर्म पर ले जाया जाता है।

एनसीएमईसी रिपोर्ट के आधार पर एफआईआर

एडीजी वी.के. सिंह के अनुसार एनसीएमईसी की टिपलाइन रिपोर्ट के आधार पर बार-बार ऐसी गतिविधियों में संलिप्त पाए गए लोगों को चिन्हित किया गया। चूरू, नागौर, अलवर, खैरथल-तिजारा, सीकर, हनुमानगढ़ और चित्तौड़गढ़ जिलों के संबंधित थानों में ऐसे मामलों में प्रकरण दर्ज किए गए हैं।

राजस्थान पुलिस अन्य राज्यों की पुलिस एजेंसियों के साथ भी समन्वय कर ऐसे ग्रुप और नेटवर्क पर नजर रख रही है। सीएसईएएम के आदान-प्रदान में सक्रिय लोगों की पहचान होने पर संबंधित राज्य की पुलिस को सूचना देकर कानूनी कार्रवाई के लिए समन्वय किया जा रहा है।

डिजिटल ट्रेल से हो रही पहचान

राजस्थान पुलिस ने चेताया है कि इंटरनेट पर फर्जी नाम या गुमनाम पहचान के पीछे छिपकर ऐसी सामग्री देखना, डाउनलोड करना, रखना या साझा करना सुरक्षित नहीं है। पुलिस तकनीकी माध्यमों से डिजिटल गतिविधियों की निगरानी कर रही है और उपलब्ध डिजिटल ट्रेल के आधार पर संबंधित अकाउंट, मोबाइल नंबर और अन्य कड़ियों की पहचान की जा रही है।

पुलिस के मुताबिक बाल यौन शोषण संबंधी सामग्री से जुड़ी गतिविधियां पॉक्सो अधिनियम, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता के प्रासंगिक प्रावधानों के तहत गंभीर दंडनीय अपराध हैं।

अभिभावकों से भी सतर्क रहने की अपील

राजस्थान पुलिस ने अभिभावकों से बच्चों के मोबाइल और इंटरनेट इस्तेमाल पर नजर रखने तथा उन्हें असुरक्षित ऑनलाइन गतिविधियों के प्रति जागरूक करने की अपील की है। किसी संदिग्ध लिंक, समूह, चैनल या ऐसी सामग्री की जानकारी मिलने पर तत्काल पुलिस को सूचना देने की सलाह दी गई है।

एडीजी वी.के. सिंह ने नागरिकों से संदिग्ध साइबर गतिविधियों की सूचना साइबर हेल्पलाइन 1930 या राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर देने का आह्वान किया है। पुलिस ने कहा है कि साइबर क्राइम शाखा ऐसी गतिविधियों पर लगातार निगरानी रखते हुए नेटवर्क और बार-बार अपराध करने वालों के खिलाफ कार्रवाई जारी रखेगी।

महानिदेशक पुलिस राजीव कुमार शर्मा के निर्देश पर चल रही कार्रवाई की जानकारी देते हुए अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक साइबर क्राइम वी.के. सिंह ने बताया कि टेलीग्राम और डिस्कॉर्ड जैसे प्लेटफॉर्म पर गुप्त अथवा पेड ग्रुप और चैनल बनाकर बाल यौन शोषण संबंधी आपत्तिजनक सामग्री का आदान-प्रदान किया जा रहा है। इनमें कई लोग फर्जी अथवा गुमनाम पहचान के साथ जुड़ते हैं।

पुलिस के अनुसार कई मामलों में सामग्री निजी संदेशों के जरिए भेजी जाती है, जबकि कुछ मामलों में गूगल ड्राइव या अन्य क्लाउड स्टोरेज पर सामग्री अपलोड कर उसका लिंक साझा किया जाता है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पुलिस की नजर से बचने के लिए कोडेड शब्दों और हैशटैग का इस्तेमाल किए जाने की भी जानकारी सामने आई है। कई बार इंस्टाग्राम या फेसबुक से संपर्क शुरू करने के बाद बातचीत को अपेक्षाकृत कम निगरानी वाले प्लेटफॉर्म पर ले जाया जाता है।

एनसीएमईसी रिपोर्ट के आधार पर एफआईआर

एडीजी वी.के. सिंह के अनुसार एनसीएमईसी की टिपलाइन रिपोर्ट के आधार पर बार-बार ऐसी गतिविधियों में संलिप्त पाए गए लोगों को चिन्हित किया गया। चूरू, नागौर, अलवर, खैरथल-तिजारा, सीकर, हनुमानगढ़ और चित्तौड़गढ़ जिलों के संबंधित थानों में ऐसे मामलों में प्रकरण दर्ज किए गए हैं।

राजस्थान पुलिस अन्य राज्यों की पुलिस एजेंसियों के साथ भी समन्वय कर ऐसे ग्रुप और नेटवर्क पर नजर रख रही है। सीएसईएएम के आदान-प्रदान में सक्रिय लोगों की पहचान होने पर संबंधित राज्य की पुलिस को सूचना देकर कानूनी कार्रवाई के लिए समन्वय किया जा रहा है।

डिजिटल ट्रेल से हो रही पहचान

राजस्थान पुलिस ने चेताया है कि इंटरनेट पर फर्जी नाम या गुमनाम पहचान के पीछे छिपकर ऐसी सामग्री देखना, डाउनलोड करना, रखना या साझा करना सुरक्षित नहीं है। पुलिस तकनीकी माध्यमों से डिजिटल गतिविधियों की निगरानी कर रही है और उपलब्ध डिजिटल ट्रेल के आधार पर संबंधित अकाउंट, मोबाइल नंबर और अन्य कड़ियों की पहचान की जा रही है।

पुलिस के मुताबिक बाल यौन शोषण संबंधी सामग्री से जुड़ी गतिविधियां पॉक्सो अधिनियम, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता के प्रासंगिक प्रावधानों के तहत गंभीर दंडनीय अपराध हैं।

अभिभावकों से भी सतर्क रहने की अपील

राजस्थान पुलिस ने अभिभावकों से बच्चों के मोबाइल और इंटरनेट इस्तेमाल पर नजर रखने तथा उन्हें असुरक्षित ऑनलाइन गतिविधियों के प्रति जागरूक करने की अपील की है। किसी संदिग्ध लिंक, समूह, चैनल या ऐसी सामग्री की जानकारी मिलने पर तत्काल पुलिस को सूचना देने की सलाह दी गई है।

एडीजी वी.के. सिंह ने नागरिकों से संदिग्ध साइबर गतिविधियों की सूचना साइबर हेल्पलाइन 1930 या राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर देने का आह्वान किया है। पुलिस ने कहा है कि साइबर क्राइम शाखा ऐसी गतिविधियों पर लगातार निगरानी रखते हुए नेटवर्क और बार-बार अपराध करने वालों के खिलाफ कार्रवाई जारी रखेगी।


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