प्रधानमंत्री कहते हैं पेट्रोल-डीजल कम खर्च कीजिए।बात बिल्कुल सही है। युद्ध के बीच दुनियाभर में बने हालात में महंगाई के इस दौर में आम आदमी खुद भी यही चाहता है कि पेट्रोल व डीजल पर कम से कम खर्च कम किया जाए। यही सच्ची देशभक्ति भी है कि संकट हो तो एक आहवान पर हम सबको वो सब करना है जो देश हित में है। जनता में कोई बेवजह गाड़ी नहीं चलाना चाहता। लोग अब बाइक निकालने से पहले भी आजकल सोचते हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह सीख सिर्फ जनता के लिए है?उदयपुर में ही देख लीजिए। जैसे ही कोई वीआईपी आता है, पूरा लवाजमा उसकी आवाजाही में लग जाता है। आगे पायलट गाड़ियां, पीछे पुलिस के वाहन, फिर अधिकारियों की गाड़ियां, फिर एम्बुलेंस, फिर अग्निशमन वाहन… और नेताओं के समर्थकों की गाड़ियों का तो कोई अंत ही नहीं है। कोई गिनती नही है। इनके बीच फंसा आम आदमी।जिसे ऑफिस जाना है, वह रुका हुआ है। जिसे अस्पताल पहुंचना है, वह परेशान खड़ा है। स्कूल से लौटते बच्चे धूप में इंतजार कर रहे हैं। बच्चे पूछ रहे हैं कि ये क्या बला है!! कौन है ये खास लोग!!! कहां से आते हैं, हमारा टाइम क्यों खोटी कर रहे हैं।किसी को समझ नहीं आता कि आखिर सड़कें जनता की हैं या सिर्फ वीआईपी आवाजाही के लिए।सबसे ज्यादा तकलीफ तब होती है जब लोगों को बिना वजह रोका जाता है। पंद्रह मिनट… बीस मिनट… कभी-कभी आधा घंटा तक। वह भी मई की तपती दोपहर में। सच कहें तो आम आदमी को इससे कोई मतलब नहीं होता कि कौन नेता आया, कौन अधिकारी गया। उसे अपने काम से मतलब है। उसे समय पर ओफिस और घर पहुंचना है। उसे रोजी-रोटी कमानी है।ऐसे में जब पेट्रोल बचाने की सलाह सुनाई देती है और दूसरी तरफ सड़कों पर लंबा-चौड़ा काफिला निकलता दिखता है, तो लोगों के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है।सुरक्षा जरूरी है, इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन सुरक्षा और दिखावे में फर्क होता है। हर दौरे को शक्ति प्रदर्शन बनाना जरूरी नहीं है। अगर सचमुच ईंधन बचाने की चिंता है तो शुरुआत ऊपर से होनी चाहिए। वीआईपी काफिले छोटे किए जा सकते हैं।अनावश्यक वाहन हटाए जा सकते हैं। सड़कों को घंटों रोकने की परंपरा खत्म हो सकती है।और सच तो यह है कि जनता उन नेताओं को ज्यादा पसंद करती है जो बिना शोर-शराबे के आते हैं, लोगों से मिलते हैं और चुपचाप चले जाते हैं। वीआईपी चाहें तो उन बसों में सफर करके एक बार देख लें जिनमें सांस तक लेना मुश्किल हो जाता है। खुद की पहचान को छिपाते हुए सीधे गंतव्य तक पहुंच सकते हैं। या फिर बडे कार्यक्रमों को ऐसी जगह पर रख सकते हैं जहां पर यातायात का दबाव कम हो। ईंधन की बचत राष्ट्रीय कर्तव्य है व हर हाल में हम सबको इस ओर ध्यान देना है मगर जब आस पास देखते हैं कि विभिन्न समाज रैलियां निकाल रहे हैं,घंटों तक दुपहिया व चार पहिया में ईंधन केवल इसलिए जाया कर रहे हैं कि वाहवाही हो तो इस पर पुनर्विचार की जरूरत है। जिस दौर में ईंधन की कमी है, जनता के प्रिंय प्रधानमंत्री तक कम खर्च का आहवान कर रहे हों वहां पर ऐसी बेरूखी ना सिर्फ अनुचित है बल्कि उस पर प्रशासनिक लगाम भी लगनी चाहिए मगर लगे तो कैसे। खुद अधिकारी बडे बडे वाहनों में सवाल होकर चलते हैं। कभी वाहन पुलिंग नहीं करते। यही हाल हर तरफ दिखाई देता है। ऐसे में ईंधन बचाने की आखिरी जिम्मेदारी केवल जनता पर डालना उचित नहीं है। Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading… Related Discover more from 24 News Update Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Post navigation 40 साल बाद बदलेगा रेलवे का रिजर्वेशन सिस्टम, AI बताएगा वेटिंग टिकट कंफर्म होगा या नहीं