24 News Update. उदयपुर। उदयपुर के नेताओं की उदयपुर फाइल्स के खूब चर्चे होने के बाद अब उदयपुर पुलिस फाइल्स के चर्चे हो रहे हैं। जयपुर से दिल्ली तक, उपर से नीचे तक, महकमे से लेकर चाय थड़ी तक चर्चा ए आम हो चला है कि किस तरह पुलिस में सिंडिकेट चल रहा है और कुछ लोग वसूली का खुला खेल कुछ खास लोगों के लिए सीक्रेटली खेल रहे हैं। जो पकड़े गए हैं वे आरोपी कहला रहे हैं नौकरी से निलंबित हो गए मगर जो नहीं पकड़े गए हैं चर्चे तो उन चेहरों के हो रहे हैं। सिंघम को बचाने के लिए किस तहर से सुपर सिंघम के फोन आ रहे हैं तो कौन इस टेस्ट मैच में भूतपूर्व होते हुए भी कप्तानी पारी खेल गया है। 24 न्यूज अपडेट की टीम ने जब इस मामले की तफतीश की तो कई चौंकाने वाली बातें सामने आई। सिस्टमेटिक ढंग से चल रहे आर्थिक तंत्र में सेंधमारी और घोंचेबाजी यह तथ्य छिपा हुआ नहीं है कि पुलिस तंत्र का अपना एक फुलप्रूफ वेल सेटल्ड इको—नोमिक सिस्टम है जिसमें बहुत ही ईमानदारी से सबकी भागीदारी और हिस्सेदारी पहले से तय होती है। क्या और कितना नीचे से उपर जाएगा यह सबको पता होता है इसलिए कहीं कोई व्यवधान नहीं होता और सबका साथ सबका विकास का मूल मंत्र साकार होता रहता है। सबका विश्वास भी बना रहता है। थानों की अघोषित ग्रेडिंग का सिस्टम भी खास भूमिका निभाता है। प्रभारी संतरी से लेकर प्रभारी मंत्री तक के भाई ‘चारे’ वाली यह व्यवस्था चाक—चौबंद चलती चली आ रही है। लोग बदलते रहते हैं, चेहरे बदलते रहते हैंं। मगर अब इसमें सेंधमारी और घोंचेबाजी होने की खबर मिली है। कानून लागू करने से ज्यादा “मंथली मैनेजमेंट” के मैनेजमेंट में लगे कुछ लोगों ने बताया जा रहा है कि एक ऐसा सिस्टम डिवलप कर लिया जो सबकी नजरों में खटकने लगा है।एसीबी की ताजा कार्रवाई ने उस परत को उधेड़ कर रख दिया है। आमतौर पर थानों की फाइलों और अफसरों की चुप्पियों के नीचे जिसकी चर्चा होती थी वो अब चकल्ल्स का रूप ले चुकी है। कयास लगाए जा रहे हैं कि ट्रेप हुआ कांस्टेबल किसी खास स्पेशल वाली वसूली टीम का हिस्सा था। ऐसी टीम जो हमेशा फेरी वाला सर्कल करते हुए ताक में रहती थी कि कब किस बड़े मुर्गे को सिस्टमेटिक ढंग से हलाल करना है। स्पेशल सेवा टीम के हो रहे चर्चे भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो की स्पेशल यूनिट ने कांस्टेबल नागेंद्र सिंह को उस समय धर दबोचा जब वह एक गैराज संचालक से पहली किस्त के रूप में 20 हजार रुपए लेने पहुंचा था। शिकायतकर्ता ने एसीबी की शरण ली और कहा था कि सादी वर्दी में सरकारी गाड़ी से पहुंचे पुलिसकर्मियों ने उनके गैराज पर चोरी की गाड़ियां काटने और नाबालिगों से काम कराने के झूठे आरोप लगाकर सीज करने की धमकी दी थी। इसके बदले पहले 50 हजार रुपए महीना मांगा गया, बाद में सौदा 25 हजार में तय हुआ। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती है असली सवाल तो अब उस “स्पेशल सेवा टीम” से शुरू होते हैं, जो इस तरह की वसूली के लिए कथित रूप से बनाई गई थी यह आरोप हैं। जिसका अस्तित्व शायद कहीं नियमों की किताब में कहीं दर्ज ही नहीं है। किसने दिए पावर, कौन है खेवनहार-गॉडफादर!!! अपना सर्कल अपनी स्पेशल टीम, अपना पावर, अपनी टेरिटरी। ये ऐसे शब्द हैं जिन पर खूब चर्चा हो रही है। लोग पूछ रहे हैं कि क्या इस तरह से पावर का डिसेंट्रेलाइजेशन किया जा सकता है?? चर्चा है कि “सिंघम” के आने के बाद ही कुछ खासमखासों को विशेष रूप से आर्थिक सरोकारों के नजराना सुरक्षा शुल्क वाले काम में तैनात कर दिया गया था। वो भी हवा हवाई आदेशों के साथ। गाड़ी और रूतबे के एक्स्ट्रा बेनिफिट के साथ। इस मैच में कोई कप्तानी पारी भी खेल रहा था इसके भी चर्चे हैं। चर्चा है कि मामला खुलते ही सिंघम ने सुपर सिंघम से फोन करवा कर खुद को मामले से अलग करवा लिया। उसके बाद जब एसीबी की जांच का दायरा आगे बढ़ता दिखा तो अचानक एक पूर्व ‘खिलाड़ी’ ने एंट्री ली और कप्तानी पारी खेल कर गेम को डेथ ओवर्स में जाने से बचा लिया। तथ्यों की अलटा पलटी और कागजों पर हैंडराइटिंग सुधार के लिए राइटिंग—री राइटिंग किए जाने के भी खूब चर्चे हैं। सरकारी गाड़ी, निजी वसूली खाकी का सब्सक्रिप्शन मॉडल अब खूब चर्चा में है। तुम मुझे सबस्क्राइब करो, मैं तुम्हें सेवा और सुरक्षा की गारंटी दूंगा…। एसीबी जांच में तथ्य सामने आया बताते हैं कि टीम सरकारी वाहन का इस्तेमाल कर शहर के गैराज संचालकों और कबाड़ी कारोबारियों के यहां दबिश देती थी। याने जांच तो बहाना है, सिंघम के लिए सब कुछ कर दिखाना है वाली बात हो रही थी। गाड़ी कहां से आई, किसने दी, किसकी थी?? इसमें कहानी उलझ गई है। कांस्टेबल के पास गाड़ी क्या कर रही थी?? यह भी बड़ा सवाल उठने लगा है। क्या वो अकेला इतना पराक्रमी जांबाज था कि पूरी रिस्क खुद उठा रहा था, यह भी सवाल उठ कर बड़े बड़ों की तरफ उंगलियां उठा रहा है। पहले नियमों का पाठ, फिर समाधान के तौर पर सबस्क्रिप्शन का पैकेज—लोग चकित हैं कि इस मॉडल पर। मेरा वचन ही मेरा शासन, वसूली ही उपलब्धि सबसे बड़ा सवाल यह है कि वसूली के लिए गए पुलिसवाले क्या सेल्फ गाइडेड थे या पीछे से कहीं उनको कंट्रोल भी किया जा रहा था?? इस वसूली टीम को किसके वचन ने इतना पावरफुल बना दिया था कि थानों को बाइपास करते हुए सर्कल में सर्कस का हंटर चला रहे थे?? लोग पूछ रहे हैं कि पकड़े गए और नामजद लोगों की टीम के लिए वसूली ही सबसे बड़ी उपलब्धि थी। फिलहाल सिर्फ एक “मंथली मॉडल” सामने आया है, जिसमें शहर के गैराज और कबाड़ी बाजार को संभावित ग्राहक की तरह देखा जा रहा था। ऐसे कितने मॉडल और चल रहे हैं इनकी जांच होनी चाहिए। साइन बनाम मंथली साइनिंग अमाउंट अब यह चर्चा है कि पकड़े गए कांस्टेबल सहित अन्य आरोपियों के दैनिक कार्यों, रिपोर्ट और कार्रवाई के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कहां होते थे? इनका मूवमेंट किनके आदेशों पर होता था। या फिर से खुद ही एक स्वचालित ‘मोबाइल कलेक्शन यूनिट’ बन चुके थे सवाल ये भी उठ रहा है कि सरकारी वाहन, पुलिसकर्मी और सादी वर्दी में चल रहे हैं, कार्रवाइयों की भनक आखिर उनको क्यों नहीं लग रही जिनको हर हाल में लगनी ही थी??? तो फिर उनके होने न होने तुक ही क्या है??? और अगर जानकारी थी, तो फिर सवाल और भी गंभीर हो जाते हैं। आखिर किसके लिए थी मंथली? पूरे मामले का सबसे बड़ा रहस्य यही है कि यह मासिक बंदी आखिर किसके लिए ली जा रही थी? सिर्फ कुछ पुलिसकर्मियों की व्यक्तिगत लालच की कहानी है या इसके पीछे कोई बड़ा “सिस्टम” काम कर रहा था? धीरे-धीरे फुसफुसाहट तेज हो रही है कि खेल नया नहीं है। फर्क इतना भर है कि इस बार एसीबी का जाल वहां पड़ गया, जहां आमतौर पर कानून की नजर भी झिझक जाती है। वर्दी का उद्देश्य कानून की रक्षा करना होता है, लेकिन जब वही वर्दी बाजार में “मंथली पैकेज” तय करने लगे, तो चर्चाकरना जरूरी हो जाता है। तीखे सवाल उठाना भी जरूरी हो जाता है। जो भी हो, दोषियों पर सख्त कार्रवाई जरूरी है। पुलिस की वर्दी पर दाग लगाने वालों पर सख्त कार्रवाई जरूरी है, सफाई के साथ पूरे तंत्र में कुछ लोगों का सफाया भी वक्त की मांग हो गई है। ताकि जनता में पुलिस का इकबाल हमेशा कायम रह सके। कानूनी अस्वीकरण (Legal Disclaimer)यह लेख उपलब्ध दस्तावेजों, सार्वजनिक रूप से सामने आए तथ्यों, आधिकारिक कार्रवाई की सूचनाओं, तथा विभिन्न स्रोतों से प्राप्त चर्चाओं और संकेतों के आधार पर तैयार किया गया एक पत्रकारिता-आधारित विश्लेषणात्मक एवं व्यंग्यात्मक आलेख है। लेख में वर्णित घटनाक्रम का उद्देश्य किसी भी व्यक्ति, पदाधिकारी या संस्था की मानहानि करना नहीं है, बल्कि सार्वजनिक महत्व के एक मुद्दे पर प्रश्न उठाना और संभावित प्रणालीगत खामियों की ओर ध्यान आकर्षित करना है।इस आलेख में प्रयुक्त कुछ शब्द, रूपक और पात्र जैसे “सिंघम”, “सुपर सिंघम”, “कप्तान”, “स्पेशल टीम” आदि प्रतीकात्मक एवं व्यंग्यात्मक संदर्भ में प्रयुक्त किए गए हैं। इनका उद्देश्य किसी विशिष्ट व्यक्ति की पहचान करना या उसे आरोपित करना नहीं है।लेख में जिन घटनाओं या आरोपों का उल्लेख किया गया है, वे भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) द्वारा की गई कार्रवाई और उससे संबंधित शिकायतों/जांच से जुड़े संदर्भों पर आधारित हैं। इन मामलों में अंतिम सत्य या दोष-निर्धारण केवल सक्षम न्यायालय अथवा वैधानिक जांच एजेंसियों द्वारा ही किया जा सकता है।पाठकों से अपेक्षा की जाती है कि वे इस लेख को एक पत्रकारिता-आधारित विश्लेषण, जनचर्चा और व्यंग्यात्मक प्रस्तुति के रूप में देखें। यदि किसी व्यक्ति या पक्ष को लेख के किसी अंश पर आपत्ति हो तो उनका पक्ष या स्पष्टीकरण प्रकाशित करने के लिए मंच उपलब्ध है। Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading… Related Discover more from 24 News Update Subscribe to get the latest posts sent to your email. 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