— पसलियों में फ्रैक्चर के बावजूद इलाज में देरी, व्हीलचेयर तक नहीं मिली, डिजिटल एक्स-रे की रिपोर्ट के लिए भी करना पड़ा इंतजार 24 News Update उदयपुर, 2 सितम्बर। त्वरित उपचार के दावों और सरकारी उपाधियों, पुरस्कारों के झांसे में आकर भूल कर भी ऐसे सरकारी अस्पताल में मत चले जाना जहां पर पछतावे और झिड़कियों के अलावा कुछ ना मिले। क्योंकि कागजों में ही ऐसे अस्पताल तरक्की कर रहे हैं, जमीनी हकीकत बहुत भयावह है। सरकारी अस्पतालों में बेहतर चिकित्सा सुविधाओं और मरीजों को तत्काल उपचार उपलब्ध कराने के दावों के बीच जमीनी हकीकत दिल दहला देने वाली है। शहर के सेक्टर-6 स्थित सेटेलाइट अस्पताल में ऐसा ही वाकया आज सामने आया। एक प्रतिष्ठित परिवार की महिला बाथरूम में गिरने से गंभीर रूप से चोटिल हो गई। परिजन उन्हें तत्काल सेटेलाइट अस्पताल सेक्टर 6 लेकर पहुंचे, लेकिन वहां गंभीर मरीज के प्रति अपेक्षित संवेदनशीलता और तत्परता नजर नहीं आई। महिला की हालत ऐसी थी कि वह ठीक से खड़ी तक नहीं हो पा रही थी। परिजनों ने बताया कि अस्पताल में व्हीलचेयर तक उपलब्ध नहीं थी। बड़ी मुश्किल से एक्स-रे कराया गया तो पसलियों में फ्रैक्चर सामने आया। इसके बावजूद एक्स-रे प्रक्रिया के दौरान तकनीशियन ने महिला के साथ अच्छा बर्ताव नहीं किया और उन्हें वहां से जाने के लिए कहा। दो एक्स-रे मशीन, फिर भी रिपोर्ट में देरीपरिजनों के अनुसार अस्पताल में दो एक्स-रे मशीनें उपलब्ध हैं और मशीनें डिजिटल होने के बावजूद एक्स-रे तत्काल उपलब्ध कराने के बजाय करीब 30 मिनट का इंतजार करना पड़ा। अस्पताल में इस व्यवस्था को संभालने के लिए महज चार कर्मचारियों का स्टाफ होने की बात सामने आई है। गंभीर रूप से घायल मरीज के इलाज में हुई देरी और कर्मचारियों के व्यवहार से परेशान परिजनों को जब पता चला कि आरएनटी अस्पताल के प्रिंसिपल डॉ. राहुल जैन उसी परिसर में एक कार्यक्रम में मौजूद हैं, तो उन्होंने उनसे मुलाकात कर पूरे मामले से अवगत कराया। शिकायत लेने के बजाय बारकोड स्कैन करने की सलाहहद तो तब हो गई जब परिजनों ने डॉ. राहुल जैन से मामले की लिखित शिकायत लेने का आग्रह किया, लेकिन शिकायत लेने के बजाय उन्हें अस्पताल के बारकोड को स्कैन कर ऑनलाइन शिकायत करने के लिए कह दिया गया। इससे परिजन और अधिक नाराज हो गए।मामला सिर्फ एक मरीज की परेशानी का नहीं था बल्कि उस व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है जहां गंभीर हालत में अस्पताल पहुंचा मरीज तत्काल उपचार और संवेदनशील व्यवहार की उम्मीद करता है। अगर बार कोड सिस्टम से ही सब चल रह है तो खुद अस्पताल अधीक्षक की भी क्या जरूरत है??? शिकायत तो ओनलाइन वैसे भी की जा सकी हैं। शिकायत करने वाला पैनिक सिचुएशन में हैं और डाक्टर साहब क्यूआर कोड स्कैन करने की बात कर रहे हैं, पूरे सिस्टम पर सवालिया निशान है। अगर अस्पताल में मौजूद जिम्मेदार अधिकारी के सामने शिकायत रखने के बाद भी पीड़ित की बात दर्ज नहीं की जाती, तो फिर मरीज अपनी समस्या लेकर आखिर किसके पास जाए? अब इस मामले में जिला कलेक्टर से शिकायत की गई है। सवालों के घेरे में अस्पताल की व्यवस्थापूरे घटनाक्रम ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं— क्या गंभीर मरीज के साथ अस्पताल में ऐसा व्यवहार स्वीकार्य है? व्हीलचेयर जैसी बुनियादी सुविधा के लिए सेटेलाइट अस्पताल में मरीज को क्यों परेशान होना पड़े? दो डिजिटल एक्स-रे मशीनें होने के बावजूद रिपोर्ट में 30 मिनट की देरी क्यों? महिला मरीज के साथ बुरे बर्ताव पर कार्रवाई कौन करेगा? और सबसे बड़ा सवाल—अगर यही स्थिति अस्पताल के किसी अधिकारी के अपने परिजन के साथ होती, तो क्या तब भी शिकायत को ऑनलाइन बारकोड तक सीमित कर दिया जाता? सरकार सरकारी अस्पतालों में करोड़ों रुपए खर्च कर आधुनिक उपकरण और सुविधाएं उपलब्ध कराने का दावा करती है, लेकिन उपकरणों के साथ पर्याप्त स्टाफ, संवेदनशील व्यवहार और जवाबदेही नहीं होगी तो ये सुविधाएं मरीज के लिए कितनी कारगर साबित होंगी, यह घटना उसका आईना दिखाती है। Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading… Related Discover more from 24 News Update Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Post navigation यात्रीगण कृपया ध्यान दें : उदयपुर-चंडीगढ़ ट्रेन सितंबर-अक्टूबर में अंबाला तक ही जाएगी भींडर पुलिस का वाहन चोर गिरोह पर शिकंजा, दो आरोपी गिरफ्तार; नौ चोरी की मोटरसाइकिलें बरामद