उदयपुर। भारतीय चिंतन व्यक्ति की सीमाओं से आगे बढ़कर परिवार, समाज और समूची सृष्टि को एक सूत्र में देखने की दृष्टि देता है। ‘मैं’ से ‘हम’ की ओर बढ़ना ही भारतीय जीवन-दर्शन का मूल भाव है। यह बात माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष हनुमान सिंह राठौड़ ने ‘हम भारत के लोग’ विषय पर आयोजित हस्तीमल व्याख्यानमाला में कही।

पाथेय कण संस्थान, विश्व संवाद केंद्र एवं रवींद्रनाथ टैगोर आयुर्विज्ञान महाविद्यालय, उदयपुर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता पाथेय कण संस्थान के अध्यक्ष एवं हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलगुरू प्रो. नंदकिशोर पांडे ने की। आरएनटी मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य एवं नियंत्रक डॉ. राहुल जैन तथा विश्व संवाद केंद्र उदयपुर के अध्यक्ष कमल प्रकाश रोहिला भी मंच पर मौजूद रहे।

राष्ट्रीय पहचान के सवाल से शुरू हुई बात

राठौड़ ने कहा कि वर्तमान समय में यह समझना जरूरी है कि ‘हम कौन हैं’ और हमारी राष्ट्रीय पहचान का आधार क्या है। भारत को केवल राजनीतिक अथवा भौगोलिक सीमा के रूप में देखने के बजाय उसकी सांस्कृतिक चेतना और जीवन-मूल्यों के संदर्भ में समझना होगा।

उपनिषदों और भारतीय दर्शन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा संसार की प्रत्येक वस्तु में ईश्वर के अंश को देखने की दृष्टि देती है। त्याग, संवेदना और अपनत्व से व्यक्ति का दायरा स्वयं से परिवार तक, परिवार से समाज तक और समाज से पूरे विश्व तक विस्तृत होता है।

उन्होंने कहा कि भारतीय चिंतन की विशेषता यही है कि इसमें व्यक्ति अकेली इकाई नहीं है। परिवार, समाज और संपूर्ण विश्व को एक व्यापक कुटुंब मानने की भावना इसी परंपरा से निकली है। यही विचार आगे चलकर ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ जैसी अवधारणाओं में दिखाई देता है।

सिर्फ इंसान नहीं, पूरी सृष्टि के प्रति संवेदना

राठौड़ ने कहा कि भारतीय जीवन-दृष्टि में मनुष्य के साथ-साथ पशु-पक्षियों और समस्त जीव-जगत के प्रति भी आत्मीयता का भाव रहा है। परिवार और समाज के जीवन में जीवों के प्रति संवेदना इसके उदाहरण हैं। वेद और उपनिषदों ने इसी व्यापक दृष्टिकोण को आगे बढ़ाया।

उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति केवल अपने हित और अपने समूह तक सीमित रहता है, वह ‘हम’ की व्यापक भावना को विकसित नहीं कर सकता। भारत का चिंतन किसी एक वर्ग या समूह के हित तक सीमित नहीं, बल्कि समूची मानवता के कल्याण की बात करता है।

विभाजन की सोच से ऊपर उठने की जरूरत

वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए राठौड़ ने कहा कि जाति, वर्ग और अलग-अलग समूहों के आधार पर समाज को बांटने वाली प्रवृत्तियों से सावधान रहने की आवश्यकता है। भारतीय दर्शन और सामाजिक समरसता की भावना को मजबूत करके ही समाज में व्यापक ‘हम’ का भाव विकसित किया जा सकता है।

भारत की ऐतिहासिक भूमिका पर उन्होंने कहा कि देश ने दुनिया पर प्रभाव शस्त्रों के बल पर नहीं, बल्कि ज्ञान, शिक्षा, संस्कृति, वेदों और अपने चरित्र के माध्यम से डाला। ऋषियों और आचार्यों ने अपने आचरण के जरिए ऐसी जीवन-पद्धति दी, जिसमें कुटुंब भाव और मानवीय मूल्यों को महत्व मिला।

संविधान सभा की चर्चाओं को पढ़ने का आह्वान

राठौड़ ने संविधान सभा की बहसों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रत्येक नागरिक को स्वतंत्र भारत की पहचान, भाषा, राष्ट्र और राष्ट्रीय प्रतीकों से जुड़े संविधान सभा के विमर्श को पढ़ना चाहिए। उन्होंने राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के निर्धारण से जुड़े प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि राष्ट्र के प्रति मातृभाव और अपनत्व की अनुभूति नागरिक को ‘मैं’ से ‘हम’ की ओर ले जाती है।

उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर समाज और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी का भाव विकसित किया जाए।

1.85 लाख सदस्यों तक पहुंचा पाथेय कण

संस्थान के सचिव महेंद्र सिंहल ने पाथेय कण संस्थान की गतिविधियों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इस वर्ष पाथेय कण पत्रिका ने अपने पुराने सदस्यता रिकॉर्ड को पीछे छोड़ते हुए 1 लाख 85 हजार सदस्य जोड़े हैं। पत्रिका के माध्यम से गांव-गांव तक जनजागरण और साहित्यिक गतिविधियों को पहुंचाने का कार्य किया जा रहा है।

15 देहदानी परिवारों का सम्मान

कार्यक्रम में महर्षि दधीचि देहदान सम्मान भी आयोजित किया गया। वर्ष 2025-26 में देहदान करने वाले 15 परिवारों के परिजनों को शॉल, अभिनंदन पत्र और स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

सम्मानित परिवारों में दिवंगत देहदानी रवि खमेसरा, पुष्पा देवी, मुरारी लाल अग्रवाल, सकु बाई जी, प्रह्लाद कुमार सुहालका, धर्मदेव चौबे, कुसुमबाई चावत, चन्द्रा खमेसरा, सुशीला जैन, संध्या नाहर, नाथू लाल चंडालिया, आशु लाल कुरडिया, बसंती लाल पगारिया, रोशन लाल हिरण और इला चक्रवर्ती के परिजन शामिल रहे।

देहदान के लिए लोगों को प्रेरित करने वाली 2 संस्थाओं को भी सम्मानित किया गया। इस अवसर पर जिला चिकित्सालय अम्बामाता की प्रभारी डॉ. नाजिमा तथा शरीर रचना विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. श्वेता अस्थाना उपस्थित रहीं।

नृत्य प्रस्तुति से लेकर संविधान प्रदर्शनी तक

कार्यक्रम का आरंभ राष्ट्रगीत वंदे मातरम् से हुआ और समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ। अतिथियों ने भारत माता के चित्र के समक्ष पुष्पांजलि अर्पित की। नृत्य-सृष्टि समूह के कलाकारों ने शास्त्रीय नृत्य की प्रस्तुति दी।

मंच संचालन डॉ. सुनील खटीक एवं डॉ. सुनील शर्मा ने किया। धन्यवाद ज्ञापन विकास छाजेड़ ने किया, जबकि हनुमान चौहान ने पुस्तक परिचय कराया। शैलेश चौरड़िया ने दिवंगत हस्तीमल के जीवन और उनके कार्यों पर प्रकाश डाला।

कार्यक्रम में लगाई गई संविधान चित्र प्रदर्शनी और साहित्य प्रदर्शनी भी आकर्षण का केंद्र रही। बड़ी संख्या में श्रोताओं ने दोनों प्रदर्शनियों का अवलोकन किया।

राष्ट्रकार्य को समर्पित था हस्तीमल का जीवन

हस्तीमल हिरण का जन्म राजसमंद जिले के आमेट में हुआ था। विद्यार्थी जीवन से ही वे संघ कार्य से जुड़े और अपना जीवन राष्ट्रकार्य के लिए समर्पित कर दिया। उदयपुर में प्रचारक के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने संघ के विभिन्न दायित्वों का निर्वहन किया। वर्ष 2004 से 2015 तक वे अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख रहे।

उनके जीवन की प्रमुख विशेषताओं में अध्ययन, संगठन, आत्मीयता और सेवा को विशेष रूप से रेखांकित किया गया। इन्हीं मूल्यों को केंद्र में रखकर हस्तीमल व्याख्यानमाला का आयोजन किया जा रहा है।


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