24 News udpate उदयपुर, 7 सितम्बर। एकादशी केवल अन्न त्यागने का पर्व नहीं, बल्कि मन को भगवान से जोड़ने और जरूरतमंदों की सेवा का संकल्प लेने का अवसर है। व्रत तभी सार्थक है, जब उसका भाव स्वयं तक सीमित न रहकर किसी दूसरे के जीवन में राहत और प्रसन्नता लाए। यह बात नारायण सेवा संस्थान के अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल ने ‘अपनों से अपनी बात’ के दूसरे दिन कथा के दौरान कही।उन्होंने कहा कि जो व्रत केवल अपने लिए हो, वह उपवास है, लेकिन जो किसी और के लिए हो, वह प्रार्थना बन जाता है। ललित-ललिता के प्रसंग के माध्यम से उन्होंने मन की एकाग्रता और समर्पण का महत्व समझाया। उन्होंने बताया कि ललिता ने इंदिरा एकादशी का व्रत कर उसका पुण्य अपने पति को अर्पित किया। इससे यह संदेश मिलता है कि पुण्य को भी दूसरों के कल्याण के लिए समर्पित किया जा सकता है।राजा अंबरीष और दुर्वासा ऋषि के प्रसंग के माध्यम से उन्होंने विनम्रता, अतिथि-सत्कार और भक्ति का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि भक्ति का अर्थ इंद्रियों का त्याग करना नहीं, बल्कि उनकी दिशा बदलना है। हाथ वही रहें, लेकिन उनका इस्तेमाल किसी को कष्ट देने के बजाय सेवा में हो।राजा खट्वांग के प्रसंग से उन्होंने समय के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जीवन कितना लंबा है, यह महत्वपूर्ण नहीं, बल्कि उपलब्ध समय का उपयोग किस उद्देश्य के लिए किया जा रहा है, यह मायने रखता है। सेवा के लिए दिया गया समय भी पूजा के समान है।एकादशी के अवसर पर श्रद्धालुओं से सेवा का संकल्प लेने का आह्वान करते हुए अग्रवाल ने कहा, “भगवान को हमारा उपवास नहीं चाहिए, भगवान को हमारे हाथ चाहिए।” उन्होंने कहा कि किसी दिव्यांग, असहाय, वृद्ध या जरूरतमंद के काम आना ही भक्ति को व्यवहार में उतारना है। इस दौरान उन्होंने लाभान्वित दिव्यांगजनों से संवाद भी किया। Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading… Related Discover more from 24 News Update Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Post navigation नीट अभ्यर्थियों को विशेषज्ञों का मार्गदर्शन, मेडिकल प्रवेश की राह हुई आसान उदयपुर पुलिस का अपराधियों पर चौतरफा प्रहार