24 News Update उदयपुर। आधी रात को दर्ज हुई एफआईआर ने शहर की राजनीति में जितना शोर मचाया था, उससे कहीं ज्यादा अब उस ‘खामोश जांच’ पर सवाल उठ रहे हैं, जो दो दिन बाद भी कागजों से बाहर निकलती नजर नहीं आ रही। जिन कांग्रेस नेताओं पर राजकार्य में बाधा जैसे गंभीर आरोप लगाकर मुकदमा दर्ज किया गया, उन्हें अब तक न तो पुलिस का फोन आया, न पूछताछ के लिए बुलावा और न ही किसी प्रकार की औपचारिक सूचना। अब शहर में सवाल उठ रहा है कि आखिर यह कैसी जांच है? जिस वीडियो के आधार पर पुलिस कार्रवाई की बात कह रही है, वह वीडियो तो घटना के कुछ घंटों बाद ही सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर वायरल हो चुका था। हजारों लोग उसे देख चुके हैं। जनता अपनी राय भी बना चुकी है। राजनीतिक गलियारों में “दूध का दूध और पानी का पानी” होने की चर्चाएं भी हो चुकी हैं। फिर भी पुलिस की जांच वहीं खड़ी नजर आ रही है, जहां एफआईआर लिखी गई थी। सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर है कि आधी रात करीब 1 बजे जिस तत्परता से मुकदमा दर्ज हुआ, उसी तेजी से आगे कार्रवाई क्यों नहीं बढ़ी? अगर मामला इतना गंभीर था कि शहर कांग्रेस अध्यक्ष फतेहसिंह राठौड़, पूर्व विधायक और 88 वर्षीय त्रिलोक पूर्बिया, पंकज शर्मा, अरुण टांक, नजमा मेवाफरोश सहित अन्य नेताओं पर राजकार्य में बाधा का केस दर्ज करना पड़ा, तो फिर पुलिस अब तक उनसे संपर्क तक क्यों नहीं कर पाई? क्या मजबूरी रही होगी, पहले किसका दबाव था अब कौन पुलिस के हाथ खींच रहा है। कहीं मामले को ठंडे बस्ते में डालने की या रोलबेक करने की तैयारी तो नहीं। शहर की राजनीतिक चौपालों में यह सवाल भी तैर रहा है कि क्या यह एफआईआर सिर्फ मैसेज देने के लिए दर्ज की गई थी? क्योंकि जिन नेताओं पर आरोप हैं, वे खुद कह रहे हैं कि उन्हें मुकदमे की जानकारी उन्हें 24 न्यूज अपडेट से पहली बार मिली। किसी थाने से कॉल नहीं आया। किसी अधिकारी ने पूछताछ के लिए नहीं बुलाया।इधर, पुलिस प्रशासन का वही पारंपरिक बयान सामने आया है कि वीडियो मंगवाए जा रहे हैं, बयान लिए जाएंगे, जांच जारी है। लेकिन जनता पूछ रही है कि जब राजकाज में बाधा थी व रात को मामला दर्ज किया गया तो जिन पर आरोप है उनसे पूछताछ में इतना समय क्यों लग रहा है। इससे सवालों की सूई खुद पुलिस प्रशासन और उस अदृश्य शक्ति की तरफ घूम रही है जिस पर आरोप लग रहे हैं। वीडियो पहले से पब्लिक डोमेन में हैं, पूरा घटनाक्रम कैमरों में कैद है और संबंधित नेता खुलेआम शहर में घूम रहे हैं, मीडिया में बयान आ रहे हैं तो जांच की रफ्तार आखिर इतनी सुस्त क्यों है? सबने बताया कि आज शाम को 8 बजे तक उनके पास कोई फोन नहीं आया।राजनीतिक जानकार इसे “दबाव और प्रदर्शन की राजनीति” का मिश्रण मान रहे हैं। कांग्रेस इसे लोकतांत्रिक आवाज दबाने का प्रयास बता रही है, जबकि सत्ता पक्ष से जुड़े लोग इसे प्रशासनिक अनुशासन का मामला बता रहे हैं। अब तो माकपा ने भी कांग्रेस को इस मामले में समर्थन दिया है। लेकिन इन सबके बीच सबसे ज्यादा कटघरे में पुलिस की कार्यशैली आ गई है जो 200 सीसीटीवी कैमरे देख कर 24 घंटे में मामलों का खुलासा कर देती है। यहां तो आरोपी भी दस कदम पर व एक फोन कॉल पर उपलब्ध है।शहर में तंज कसते हुए लोग कह रहे हैं— उदयपुर पुलिस की जांच अब शायद वीडियो देखकर ही पूरी होगी, क्योंकि जिन लोगों पर केस है, उनसे पूछने की जरूरत शायद बची ही नहीं! वहीं यह सवाल भी चर्चा में है कि यदि नगर निगम आयुक्त ने अंततः ज्ञापन स्वीकार कर लिया था और मामला मौके पर शांत हो गया था, तो फिर देर रात ऐसा कौन-सा नया तथ्य सामने आ गया जिसने सीधे मुकदमे तक बात पहुंचा दी? और अगर मुकदमा सही था, तो अब कार्रवाई में यह ठहराव क्यों?बहरहाल, आधी रात की एफआईआर अब राजनीतिक बहस से ज्यादा पुलिस की निष्क्रियता पर सवाल बन चुकी है। शहर देख रहा है कि “राजकार्य में बाधा” का मामला आखिर जांच तक पहुंचेगा या सिर्फ सुर्खियों तक ही सीमित रह जाएगा। Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading… Related Discover more from 24 News Update Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Post navigation सुदर्शन चक्र-2 के तहत सायरा पुलिस की कार्रवाई, वर्षों से फरार महिला स्थायी वारंटी गिरफ्तार डॉक्टर मोहित मसार हत्याकांड का खुलासा: मामूली गाली-गलौज और बाड़ कूदने के विवाद में की थी हत्या, 2 आरोपी गिरफ्तार