24 News Update उदयपुर। नगर निगम के लिए कहा जाता है कि यहां पर रसूखदारों की ही चलती है और कुछ अफसरों से लेकर कर्मचारियों तक की लॉबी केवल और केवल खास लोगों के लिए ही काम करती है, यह बात अब धीरे धीरे सच साबित होती जा रही है। यह भी सामने आ रहा है कि कई मामलों में तो पूरा सिस्टम ही बड़े व रसूखदारों को बचाने के लिए पूरी ताकत झोंक रहा है जबकि आम आदमी या बिना एप्रोच वालों की बात आते ही लोगों की खुलेआम मानहानि करने से बाज नहीं आ रहा है। याने कुछ अफसर और कर्मचारी सरेआम लोगों को बदनाम करने पर तुले हुए हैं। जबकि नियमानुसार ऐसा करना उन्हीं के अनुसार कानूनन सही नहीं है। ऐसे में अफसरों व कर्मचारियों पर सख्त से सख्त कार्रवाई की जानी जरूरी हो गई है। क्योंकि अगर यह सब चलता रहा तो ये अफसर आगे जाकर और बड़े गुल खिलाने और पूरे के पूरे सिस्टम को हैक करने से बाज नहीं आने वाले हैं। अभी ये जनता को आंख दिखा रहे हैं, बाद में ना जाने नेताओं के संरक्षण से इनके हौसले और कितने बुलंद हो जाएंगे।हम बात कर रहे हैं। नगर निगम उदयपुर के नगरीय विकास कर (यूडी टैक्स) को लेकर यूडीए के अफसरों के रवैये की। पूरा का पूरा तंत्र नेक्सस की तरह से काम कर रहा है और गंभीर सवालों के घेरे में आ गया है। निगम की ओर से यूडी टैक्स के नाम पर हर साल सरकारी स्तर पर वसूली का पूरा काम निजी एजेंसी के भरोसे चल रहा है। याने साधारण शब्दों में कहें तो हमारे टेक्स के पैसों से तनख्वाह लेने वाले आयुक्त से लेकर साधारण कर्मचारी तक की शृंखला के कर्मचारी निरंकुश होकर हमें याने कि जनता को ही आंख दिखाने लग गए हैं। यूडी टेक्स जनता पर खर्च किया जाना है। जनता के सेवक बनकर काम करने वाले उसे संग्रहित कर रहे हैं। पैसा भी सरकारी राजकोष में जा रहा है। तो फिर ऐसा क्या है निगम के अफसर इस सूचना पर कुंडली मार कर बैठ गए हैं कि होटल लेक पैलेस, होटल लीला,उदय विलास, जग मंदिर आदि की ओर से पिछले दो वित्तीय वर्षों में कितना यूडी टेक्स जमा करवाया है?? याने सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत जानकारी मांगते ही लोक सूचना अधिकारी से लेकर आयुक्त साहब तक को करंट लग रहा है। नियमों की किताब खोल कर खुद अपनी ही हंसी उड़वाने पर तुले हुए हैं। ऐसे जवाब दे रहे हैं कि अब जनता ही उल्टे सवाल करने लग गई है कि क्या आप ही प्रशासन में अकेले समझदार बैठे हैं, जनता को मूर्ख समझते हैं क्या???? याने होटलों के बारे में मांगी गई सूचना पर इनको नियम याद आ रहे हैं। हद तो ये है कि यूडी टेक्स का बकाया जो निगम खुद जारी करता है, जमा करने पर पाबंद भी खुद करवाता है। वो आरटीआई में सूचना मांगने पर रसूखदारों के आगे लंबलोट हो रहा है। सूचना देने में उसके पसीने छूट रहे हैं। लोक सूचना अधिकारी को अचानक आरटीआई के अधिनियम की धारा 11 याद आ रही है और होटल वालों आदि को चिट्ठी लिख कर कहा जा रहा है कि आपकी अनुमति हो तो सूचना दे दें। होटल वाले लिख कर दे रहे हैं कि सूचना मत दो तो ये बदले में आरटीआई लगाने वालों से कह रहे हैं कि उन्होंने लिख कर दिया है इसलिए हम नहीं दे सकते। गजब की मजाक चल रही है नगर निगम में। अफसरों व लोक सूचना अधिकारी को लगता है कि सारी समझदारी का ठेका उन्होंने ही ले लिया है। और वे जैसा चाहेंगे नियमों को तोड़ मरोड़ कर चलताउ तरीके से जवाब दे देंगे ताकि सूचना की पहरेदारी और खासमाखासों के लिए कुंडली मार कर चौकीदारी कर लोयल्टी हासिल की जा सकी। ये क्यों हो रही है ये तो निगम के अफसर ही बता सकते हैं मगर यह गंभीर जांच का विषय है कि यूडी टेक्स के बारे में बताना आखिर कैसे निजी सूचना हो सकता है।जनता को जानने का अधिकार है कि जो बड़े नाम है वे कितना टेक्स दे रहा है, दे भी रहे हैं या नहीं दे रहे हैं??? कब दे रहे हैं, इनको भी नोटिस मिल रहे हैं क्या,,,?? या फिर इनके लिए कोई अलग ही सिस्टम बना हुआ है??? सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि निगम के अफसरों से लेकर लोक सूचना अधिकारी तक सूचना पर चौबीस घंटे की चौकीदारी का ठेका लिए हुए हैं।अब हमारी ओर से यह बताना भी जनहित में ही है कि अफसरों को जनता ने मोटी तनख्वाह लेकर इसलिए नहीं बिठा रखा है कि वे खुद मनमानी करने लग जाएं। वीआईपी संस्थानों को मैलोडी खिलाने को तत्पर दिखाई देने लगें। सूचना मांगने पर उटपटांग जवाब दे दें और बच निकलें बिना किसी लायबिलिटी के, यह अब चलने वाला नहीं है। ये ही करते हैं बकायदारों की सरेआम मानहानिएक तरफ तो निगम के लोक सूचना अधिकारी कहते हैं कि यूडी टेक्स की सूचना निजी और गोपनीय है मगर दूसरी ओर निगम की ओर से समय-समय पर यूडी टैक्स बकायेदारों के खिलाफ कार्रवाई करते हुए बकायदा सार्वजनिक रूप से नाम, बकाया राशि और संपत्तियों की तस्वीरें आदि जारी की जाती रही हैं। निगम की टीम सीजिंग कार्रवाई के दौरान भवनों पर नोटिस चस्पा कर संबंधित प्रतिष्ठानों को खुलेआम नेम एंड शेम करती है। ढोल बजाकर खुद आयुक्त साहब की ओर से खबरें प्रकाशित व प्रसारित की जाती है। खबरों में आयुक्त साहब चेतावनी देते हैं कि अभियान जारी रहेगा, बकायदारों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी??? क्या तब यूडी टेक्स के नाम निजी नहीं होते, क्या तब बकायदारों से परमिशन ली जाती है कि हम मीडिया में नाम दे दें क्या,,। हद की बात तो यहां तक है कि पिछली बार 80 हजार तक जिनके बकाया थे, उनके नाम भी उन्हीं लोगों ने मीडिया में सार्वजनिक करके उनके मानहानि की। याने साधारण बिना एप्रोच के लोगों के लिए नेम शेम की पॉलिसी और लेक पैलेस, लीला, उदय विलास, जग मंदिर का नाम आते ही अफसरों की घिघ्घी बंध जाती है, नियमों की दुहाई देने लगते हैं। ये ड्यूअल पॉलिसी अब चलने वाली नहीं है, पूरी तरह से एक्सपोज हो चुकी है। हद तो ये है कि नोटिस सार्वजनिक चस्पा होते हैं। बकायदारों के नाम के साथ ही उनके पिता के नाम, एड्रेस तक होते हैं। जबकि यहां तो सूचना मांगने पर रसूखदारों ने कितना यूडी टेक्स दिया, यह तक बताने को निजी सूचना मान रहे हैं। ऐसे में जनता को लगने लगा है कि अफसर और कुछ खास कर्मचारी जनता के सेवक हैं या वीआईपी के सेवक हैं। अब संशह होने लगा है कि क्या वीवीआईपी की सूचना यूडीए के पास नहीं है, कहीं ताले में बंद कर रखी है,, क्या सूचना सूचना देने से अधिकारियों के सुर्खाब के पर कतर दिए जाएंगे। उन पर गाज गिर जाएगी। किसी सुपरबॉस ने कहा है या किसी नेता ने मुंह पर ताला लगवा रखा है, आखिर राज क्या है यह बड़ा सवाल है।यहीं से निगम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं। Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading… Related Discover more from 24 News Update Subscribe to get the latest posts sent to your email. 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