24 न्यूज अपडेट. उदयपुर। मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय उदयपुर में 6 साल बाद एक बार फिर से शिक्षकों का संगठन सूटा निशाने पर आ गया है। कुलसचिव की ओर से आज अखबारों में विज्ञापन जारी करके बताया गया कि सूटा नाम का संगठन वैधानिक रूप से मान्य नहीं है। इस संगठन नाम से मीडिया को सूचना दी जाती है तो कानूनी कार्रवाई की जाएगी। आपको बता दें कि 6 साल पहले भी इसी तरह की सूचना जारी की गई थी जिसके बाद सूटा की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी जो अब तक पेंडिंग है। सूटा नामक संगठन सुविवि में तब से चल रहा है जब से विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। मजे की बात तो यह है कि 6 साल पहले प्रतिबंध लगाने की सूचना के बाद से लगातार सूटा के अध्यक्ष को उनके पदनाम से सूचित करते हुए विभिन्न सर्कुलर और संदेश भेजे जा रहे थे जिसके मायने ये हुए कि संगठन को आंतरिक रूप से सर्व सहमति थी।
अब अचानक ऐसा क्या हो गया कि सुविवि प्रशासन ने यू टर्न ले लिया। कोई इसे दबाव की राजनीति के रूप में देख रहा है तो कोई पावर टसल के रूप में। जो भी हो इससे सुविवि की राजनीति में भूचाल जरूर आ गया है। एक अन्य कारण सत्ता पक्ष के करीबी शिक्षकों की भी आपसी खीचंतान भी बताई जा रही है। जो भी हो, सवाल टाइमिंग पर उठ रहे हैं कि यदि कार्रवाई ही करनी थी तो अब तक सुविवि प्रशासन क्या कर रहा था। क्या उसे नहीं पता था कि एक ऐसा शिक्षक संगठन काम कर रहा है जो मान्यता प्राप्त ही नहीं है। कुछ टीचर्स के प्रमोशन की पॉलिटिक्स चल रही है। प्रमोशन की मांग की जा रही है। कहीं यह उससे जुड़ी बात तो नहीं है यह भी चर्चा हो रही है। यदि संगठन अवैध है तो अब तक जिन्होंने इसे वैध बताया उनके खिलाफ सुविवि प्रशासन क्या कार्रवाई कर रहा है, क्या उनको भी नोटिस देकर जवाब मांगा जा रहा है? ये सवाल भी उठ खड़े हुए हैं। इसके साथ ही अब यह भी पूछा जा रहा है कि आखिर संगठनों की मान्यता के सुविवि में नियम और कायदे क्या हैं।
बहरहाल, आज शिक्षकों ने इस बारे में ज्ञापन देकर सूटा की वैधानिक मान्यता के पक्ष को रजिस्ट्रार के सामने रखा। ज्ञापन देने वालों में अखिल राजस्थान विश्वविद्यालय शिक्षक महासंघ के प्रदेश महासचिव डॉक्टर देवेंद्रसिंह राठौड़ और प्रदेश उपाध्यक्ष डाक्टर गिरिराज सिंह शामिल थे। अखिल राजस्थान विश्वविद्यालय शिक्षक महासंघ के प्रदेश महासचिव डॉक्टर देवेंद्रसिंह राठौड़ ने बताया कि विवि की ओर से अध्यक्ष सूटा के नाम से जो विभिन्न कॉरस्पोंडेंस मिले हैं वे सब फाइलों में मौजूद हैं। 2018 में सूटा को अवैध बताया गया था जिसके बाद संगठन कोर्ट चला गया था। इन छह सालों में सुविवि प्रशासन ने खुद संगठन को रिकॉग्नाइज किया है। नेक की टीम के सामने सूटा प्रेसिडेट के रूप में खड़ा किया गया, सर्कुलरों की प्रतिलिपियां भी दी गईं। जब तक हाईकोर्ट से अंतिम निर्णय नहीं आ जाता तब तक इस प्रकार की विज्ञप्ति जारी करना न्यायपालिका के तौहीन नहीं तो और क्या है। सूटा सुविवि का 40 साल पुराना संगठन है। इसमें सभी विचारधाराओं के शिक्षक इसके पदाधिकारी व सदस्य रहे हैं। उसको इस प्रकार से बेन करना न्यायोचित नहीं है।
शिक्षकों के ज्ञापन में यह बताया
दिनांक 16.01.2025 को समाचार पत्रों में आपके द्वारा सुखाड़िया विश्वविद्यालय शिक्षक संघ सूटा की वैधानिक रूप से मान्यता के संदर्भ में जारी विज्ञप्ति के संबंध में निम्नलिखित बिंदुओं पर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहते है।

  1. सुखाडिया विश्वविद्यालय शिक्षक संघ की वैधानिक रूप से मान्यता को लेकर माननीय उच्च न्यायालय जोधपुर में वर्ष 2018 में सुखाडिया विश्वविद्यालय शिक्षक संघ बनाम सुविवि वाद विचाराधीन है, जिसका निर्णय अब तक लंबित है।
  2. मामला उच्च न्यायालय में विचाराधीन है, इस वाद के अंतिम निर्णय से पूर्व इस प्रकार की विज्ञप्ति जारी करना न्यायालय की प्रक्रिया का उल्लंघन प्रतीत होता है।
  3. वाद दायर होने के पश्चात भी विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा निरंतर सुखाड़िया विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के पदाधिकारियों के नाम पर पत्रों की प्रतिलिपि भेजी जाती रही है, जो इस बात की पुष्टि करता है कि विश्वविद्यालय ने इस संघ को मोहनलान सुखाड़िया विश्वविद्यालय के शिक्षकों का एकमात्र अधिकृत और वैधानिक संगठन स्वीकार के रूप में किया है।
  4. विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा विश्वविद्यालय अधिनियम और विनियमों की पूर्ण रूप से पालना हो तथा शिक्षकों के हितों की रक्षा हो इस हेतु सुखाड़िया विश्वविद्यालय शिक्षक संघ सदैव लोकतांत्रिक एवं विधि सम्मत तरीके से प्रयासरत रहा है। इस प्रकार की विज्ञप्ति जारी करना दमनकारी तथा लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।
  5. विश्वविद्यालय प्रशासन से यह अनुरोध है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने प्रशासनिक दृष्टिकोण से किसी संघ/संगठन को वैधानिक रूप से मान्यता प्रदान करने के लिए कोई मापदंड निर्धारित किए हैं, यदि है तो उनकी प्रतिलिपि सार्वजनिक की जाए।
  6. लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संघ/संघठन बनाने का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ब) के तहत एक मौलिक अधिकार है। यह अधिकार प्रत्येक भारतीय नागरिक को संघ या संगठन बनाने की स्वतंत्रता प्रदान करता है। यह स्वतंत्रता न केवल भारत के लोकतांत्रिक ताने-बाने को संरक्षित करती है, बल्कि यह संविधान के मूल ढांचे का भी अभिन्न अंग है। माननीय उच्चतम न्यायालय ने केसवानंद भारती बनाम राज्य केरल (1973) के ऐतिहासिक निर्णय में संविधान के मूल ढांचे की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहा है कि मौलिक अधिकार और लोकतांत्रिक स्वतंत्रताएं इस ढांचे के अपरिहार्य हिस्से हैं। इन अधिकारों का अतिक्रमण संविधान की आत्मा और उद्देश्य के विपरीत होगा। भारत में कर्मचारी संघों और संगठनों का निर्माण और संचालन इन्हीं संवैधानिक प्रावधानों के तहत संरक्षित है। इस संदर्भ में, किसी भी प्रकार की कार्रवाई या विज्ञप्ति, जो इन मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती हो, संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन मानी जाएगी। इस प्रकार, विश्वविद्यालय द्वारा जारी विज्ञप्ति न केवल अनुच्छेद 19 के तहत प्रदान किए गए अधिकारों का उल्लंघन करती है, बल्कि यह संवैधानिक मूल्यों और लोकतांत्रिक सिद्धांतों के खिलाफ भी प्रतीत होती है। ऐसी कार्रवाई संबैधानिक प्रक्रिया और भारत के नागरिकों के मौलिक अधिकारों के प्रति अवहेलना के समान है।

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