लेखक: डॉ मन्नालाल रावत-सांसद उदयपुर लोकसभा

हमारी धरती पुण्य भूमि है। हमारा देश पावन धरा है। यहां कई दुर्लभ मनीषियों ने जन्म लिया। जिन्होंने इतिहास रचा। मानव कल्याण के लिए कई सूत्र दिए। कइयों ने तो स्वयं को होम किया परंतु एक बड़ो विचार दिया जो सनातन भाव से उत्प्रेरित रहा। ऐसा ही एक भाव 15 नवंबर 1875 को वर्तमान झारखंड की धरती से जागृत हुआ। लोगों ने उसे विचार को श्धरती आबाश् कहा। स्वाधीनता की ओर बढ़ते कालखंड में भारत ने उन्हें भगवान बिरसामुंडा कहा।
श्रीमद् भगवद्गीता में भगवान का आश्वासन है किष् यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम।।
धर्मसं स्थापनार्थाय संभावनामि युगे युगे ॥
भावार्थ जगद्गुरु भगवान श्रीकृष्ण हमारे लिए मार्गदर्शन दिया है: जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं प्रकट होता हूं अर्थात् अवतार होता हूं। साधुजनों का विनाश करने के लिए, पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की स्थापना करने के लिए, मैं हर युग में प्रकट होता हूं।
क्या अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांति का शंखनाद करने और आम जन आत्मविश्वास जागृत करने करते हुए संघर्ष की राह पर आगे बढ़ाने के लिए भगवान बिरसा मुंडा इसी महान आश्वासन का एक प्रवाह ही तो है। आम जन यह भाव आज भी है और जनता ने इस कल 25 वर्ष का जीवन जीने वाले महान क्रांतिसूर्य नायक को श्भगवानश् बनाया। उनके कृतित्व एवं व्यक्तित्व की विशालता में यह सार्थक ही है।
आने वाली पीढ़ियां हमसे प्रश्न करेगी कि क्यों भगवान बिरसा मुंडा भगवान है? प्रभु श्री राम और भगवान श्री कृष्ण की जीवन की भांति आरंभिक जीवन, भगवान बनने की कठिन तपस्या जैसा काफी कुछ घटित हुए हम देख सकते हैं। अभाव एवं गरीबी वाले बचपन में धर्मांतरण का दंश झेलना उसकी मजबूरी है। पुरखों की संस्कृति और माटी का जीवंत रंग हमें सहज बनाता है परंतु विजातीय तत्व स्वतरू विकर्षण ही पैदा करते हैं। यह एक अजीब सा भाव उत्पन्न करता है जो व्यवहार में सदैव चुभता है। यह अपना नहीं लगता। सब कुछ यांत्रिक लगता है। हम उसमें जान नहीं सकते फिर भगवान बिरसा कैसे बचपन में ईसाइ मिशनरी के स्कूल में धर्मांतरण का कष्टदायक अध्याय जिया।
उन्होंने बचपन में ही जान लिया कि श्टोपी-टोपी एक साहब अर्थात् अंग्रेजों और ईसाइ मिशनरी की दो टोपियां हैं। दोनों का एक ही लक्ष्य है- भारत की सत्ता को हथियाना और व्यक्ति को आंतरिक रूप से पराभाव की ओर ले जाना। यह गलत है। इसके विरुद्ध एक आंदोलन करना आवश्यक है, जो उलगुलान है। महा क्रांति है। यह वह पर है जो विदेशी शासकों से मुक्त करता है और स्वदेशी जीवन पद्धति में रमन है। भाव एक ही यही राह भारत माता की जय है।
उनके इस युग उद्घोष का भारी प्रभाव होता है। जनमानस में यह भाव जागृत व प्रतिष्ठित होता है कि हां! यही वह मार्ग है जिसमें जल, जंगल, जमीन जान और जानवर मुक्त होंगे। पूरा छोटा नागपुर मानने लगता है, यही वह नायक है जो विदेशी दासता से हमें मुक्त कर सकता है।
तब हमारा ज्ञान परंपरा का आता भंडार में एक है- आयुर्वेद और संगीत। बिरसा के अंतर्मन में यह विचार जागृत हुआ कि संगीत से हम ईश्वर प्राप्ति का मार्ग चुन करते हैं। साथ ही परंपरागत आयुर्वेद से जनता जनार्दन के शारीरिक कष्टों का निवारण कर सकते है।
सेवा की प्रेरणा भगवान बिरसा के जीवन में उच्च स्तरीय थी। इस प्रकार उन्होंने सांस्कृतिक उत्थान का 10 सूत्रीय रास्ता जिसे बिरसायत पंथ की मूल शिक्षाएं कह सकते हैं। इन दस शिक्षाओं में पुरखों की संस्कृति है, सप्ताह में एक दिन व्रत रखना है और श्परश् धर्म से अच्छा श्स्वधर्मश् को मानना है। नायक का मानना था कि यही हमारी अपनी मूल अस्मिता है।
बिरसा जी का एक-एक तत्व का भाव, जब जग जाहिर हुआ, तब सब स्वजन जुड़ते चले गये। सही ही कहा है, जब हमारा स्वयं का कोई हित ना हो तो व्यापक हित के लिए सबजन जुड़ते हैं। साथ ही सरल तर्क व सरल अध्यात्म हो तो भारत का आम जन समूह चुंबक की तरह आकर्षित होते हैं। यही हुआ बिरसायत पंथ में। एकता की मशाल जल उठी और अब टोपी-टोपी एक साहब के संयुक्त पारितंत्र के विरुद्ध अथक संघर्ष हुआ जिसमें भगवान बिरसा मुंडा को जेल जाना पड़ा।
खूंटी जो अब झारखंड में है, उन पर मुकदमा चला और जेल की सजा हुई। जन भावनाओं को देखकर एक बार तो बिरसा को मुक्त किया परंतु जीवन स्वयं संघर्ष का पथ अपना ले तो प्रकृति रुकने नहीं देती। अब एक बार फिर संघर्ष, गिरफ्तारी व जेल।सरकार ने ₹500 का इनाम घोषित किया। अनेक मुंडा सरदारों पर भी इनाम घोषित किया, लेकिन सदैव ही एक दुविधा रही है- विश्वास घाती। हमारे अगल-बगल ही कोई होता है। मुखबिरी होती है। भगवान बिरसा मुंडा के साथ भी यही हुआ और इस महान क्रांतिकारी को एक बार फिर कैद मिली।
उन पर एक आम आदमी की तरह मुकदमा चला। लूटपाट, हत्या आदि के आरोप लगे। इसके अंतर्गत 15 आरोपों की सूची तैयार की गई। बिरसा जी को मुख्य अभियुक्त बनाया गया।
जेल हुई। 30 मई सन 1900 को प्रातः काल के समय बिरसा कुछ अस्वस्थ अनुभव की है परंतु कोई विशेष ध्यान नहीं दिया। एक दिन अन्य कैदियों के साथ उन्हें अदालत ले जाया गया। उनकी अचानक तबियत बिगड़ने लगी उन्हें पुनरू जेल लाया गया। उनकी नाड़ी तेज चल रही थी। गला सूखा हुआ था। आंखें अंदर की ओर धंस गई थी। आवाज लड़खड़ा रही थी। ऐसे में जेल चिकित्सक ने उन्हें दवा दी। माना सब ठीक हो जाएगा परंतु होने कुछ और ही था।
8 जून को पुनः उनकी तबीयत बिगड़ने लगी बार-बार होने वाली दस्त उनके शरीर की शक्ति छीनने लगी। 9 जून सन 1900 की सुबह बहुत ही कठिन थी 8 बजे के आसपास उन्हें खून की उल्टी होने लगी। अत्यधिक कमजोरी होने के कारण भी लगभग बेहोश हो गए और फिर 9 बजे धरती का देवता संसार से सदैव के लिए विदा हो गया। अंग्रेजों द्वारा जहर देकर उन्हें मार दिया गया।
उनके निधन होने पर सरकार की नींद उड़ गई। भय सताने लगा। चुपके से सुवर्ण नदी के घाट पर बिरसा का शव जेल-कर्मचारियों द्वारा कंडांे की आग में गुपचुप तरीके से जला दिया गया। इसकी भनक किसी को नहीं लगी।
देश स्वाधीन हुआ सत्ता की गलियों में एक-दो परिवारों ने ही आजादी दिलाई ऐसी कहानियां चल पड़ी। एक को तो लोक देवता के रूप में प्रस्तुत किया और दूसरे तो संत ही बन गए। स्वाधीनता की वेला पर भगवान बिरसा मुंडा की भांति सैकड़ो नायक- नायिकाएं गुमनामी में चले गए, परंतु धन्य हो यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिन्होंने अमर गाथा पुनरू लिखना आरंभ किया, जिसमें से एक है, जनजाति गौरव के प्रतीक राष्ट्र नायक भगवान बिरसा मुंडा। भारत माता की जय।


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