उदयपुर। उदयपुर की अपर सेशन न्यायाधीश क्रम संख्या-2 दमयंती पुरोहित की ओर से बहुचर्चित राज्य बनाम सिल्वेस्टर उर्फ दीपू मामले में अपना निर्णय सुनाया। यह मामला 2021 की घटना से जुड़ा है, जिसमें अधिवक्ता पूरणमल जैन के घर के बाहर कथित तौर पर फायरिंग और तोड़फोड़ हुई थी।


न्यायालय के सामने अभियोजन पक्ष ने दावा किया कि अभियुक्त ने अधिवक्ता पूरणमल जैन और उनके परिवार को डराने के लिए अवैध पिस्तौल से फायर किया, गाली-गलौज की और उनकी कार को क्षतिग्रस्त किया। पुलिस ने घटनास्थल से एक खाली कारतूस और क्षतिग्रस्त मारुति सुजुकी कार (RJ 27 CA 3756) बरामद की थी। बाद में अभियुक्त से एक देशी पिस्तौल और दो खाली मैगजीन मिलने का दावा किया गया। इस आधार पर पुलिस ने उसके खिलाफ धारा 307, 387, 440, 504, 506 भारतीय दंड संहिता और धारा 3/25 आर्म्स एक्ट में मामला दर्ज किया। अभियोजन पक्ष की ओर से अपर लोक अभियोजक दिनेश गुप्ता ने गवाहों के बयान, वीडियो रिकॉर्डिंग और बरामद हथियार को आधार बनाकर अपराध सिद्ध करने की कोशिश की। गवाहों में अधिवक्ता पूरणमल जैन, उनके परिवारजन देवेन्द्र जैन, आशा जैन, रीना जैन, सोनिका जैन और अन्य शामिल थे। पुलिस अधिकारी यशपाल सिंह (एएसआई) ने रिपोर्ट दर्ज की, अनुसंधान अधिकारी दिवानी सिंह ने जांच की और मालखाना प्रभारी दुर्गवत सिंह ने बरामदगी का विवरण दिया।


वहीं बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता राव रतनसिंह ने तर्क दिया कि यह झूठा मुकदमा है। उन्होंने कहा कि एफआईआर दर्ज करने में दो दिन की देरी हुई, गवाह सभी एक ही परिवार से हैं और बरामदगी संदिग्ध है। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि मामूली पार्किंग विवाद को हत्या के प्रयास का रूप दिया गया। उन्होंने कई न्यायिक दृष्टांत पेश किए जिनमें स्टेट आफ मध्याप्रदेश बनाम नंदे, स्टेट आफ राजस्थान बनाम गजेंद्रसिंह, राजेश बनाम स्टेट आफ हरियाणा जैसे मामले शामिल थे। बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि घटनास्थल पर गोली चलने के कोई निशान नहीं मिले और पिस्तौल की बरामदगी संदिग्ध है।
न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में असफल रहा। अदालत ने स्पष्ट किया कि अभियोजन का दायित्व था यह साबित करना कि अभियुक्त ने वास्तव में फायर किया और उसका उद्देश्य अधिवक्ता तथा उनके परिवार को नुकसान पहुँचाना था। लेकिन प्रस्तुत गवाहों के बयान परस्पर विरोधी पाए गए और सभी गवाह एक ही परिवार से संबंधित थे। एफआईआर दर्ज करने में देरी हुई, जिससे अभियोजन की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा।


न्यायालय ने यह भी कहा कि घटनास्थल पर गोली चलने के कोई निशान नहीं मिले। बरामद पिस्तौल और मैगजीन की जब्ती प्रक्रिया में गंभीर खामियाँ थीं। आर्म्स विशेषज्ञ की रिपोर्ट में भी यह स्पष्ट नहीं किया गया कि बरामद पिस्तौल से घटना के समय फायर हुआ था। वीडियो और ऑडियो साक्ष्य को भी अदालत ने तकनीकी आधार पर अविश्वसनीय माना क्योंकि धारा 65B का प्रमाण पत्र प्रस्तुत नहीं किया गया था।
अपने आदेश में न्यायाधीश दमयंती पुरोहित ने लिखा कि “अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य संदेह से परे अपराध सिद्ध करने में सक्षम नहीं हैं। गवाहों के बयान विरोधाभासी हैं, बरामदगी की प्रक्रिया संदिग्ध है और तकनीकी साक्ष्य अधिनियम के अनुरूप नहीं हैं। ऐसी स्थिति में अभियुक्त को दोषसिद्ध करना न्यायसंगत नहीं होगा।” न्यायालय ने अभियुक्त सिल्वेस्टर को दोषमुक्त किया है।


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