24 News Update उदयपुर, 29 अगस्त। नगर निगम चुनाव के टिकट वितरण ने भाजपा के वार्ड 57 में ऐसा सियासी तूफान खड़ा कर दिया है, जो वक्त रहते नहीं थमा तो पार्टी की मजबूत मानी जा रही सीट के समीकरण बिगाड़ सकता है। महिला सामान्य सीट वाले इस वार्ड में टिकट को लेकर अंदरखाने शुरू हुई रस्साकशी अब कार्यकर्ताओं के असंतोष में बदलती दिखाई दे रही है। बागी के सामने आने का खतरा मंडराने लगा है तो अंदरखाने भितरघात से जमीन सरकने के भी संकेत मिलने लगे हैं। विवाद की जड़ में आखिरी वक्त पर पैनल के बाहर से आगे बढ़ाए गए नाम और पर्ची के जरिए आने वाले नाम के फाइनल हो जाने की चर्चा तक पहुंच जाने का है। वार्ड में टिकट के लिए 11 महिलाओं ने दावेदारी की थी। इनमें पार्टी संगठन से लंबे समय से जुड़ी महिलाएं, पूर्व पार्षद, वार्ड पंच और अलग-अलग सामाजिक वर्गों से आने वाली दावेदार शामिल थीं। इसके बावजूद अंतिम क्षणों में जिस तरह नाम बदले जाने की चर्चा सामने आई, मनी पावर का प्रभाव, विधायक से नजदीकिया, आर्थिक तरक्की वाले रिश्ते आदि की चर्चाओं ने दावेदारों और उनके समर्थकों को बेचैन कर बगावती बना दिया है। पर्यवेक्षकों की बैठक में पर्ची आ गई, और नाम तय हो गयाभाजपा की पार्टी की प्रक्रिया के तहत पर्यवेक्षक महेश भारद्वाज और चंद्रकांता बोल्या वार्ड के भाजपा दावेदारों से रायशुमारी और चर्चा के लिए पहुंचे थे। कार्यकर्ताओं के बीच बताया गया कि एक नाम पर्ची से आया है। बाद में पता चला कि पर्ची वाले इतने पावरफुल निकले कि सब पर भारी पड़ गए। सवाल यह उठा कि एक नामजिसको आखिरी समय में पर्ची से बढ़ाया गया, जो दावेदार उस प्रक्रिया तक में सामने ही नहीं थीं, उसका नाम पर्ची से चलते हुए ऊपर कैसे पहुंच गया। इस पर्ची पर फूल वाला वजन किसका था। कार्यकर्ताओं में चर्चा तेज है कि क्या संगठन की तय प्रक्रिया से तैयार पैनल के बजाय आखिरी समय में राजनीतिक दबाव का क्या इस्तेमाल किया गया। क्या आर्थिक गणित चला या फिर क्या पोलिटिकल प्रेशर आया, यह सबके बीच चर्चा का विषय है। 30 साल से पार्टी की सेवा करने वाले दरकिनार हो गएवार्ड में लंबे समय से सक्रिय ख्यातिप्राप्त डॉक्टर वक्तावरलालजी की पौत्री व 30 साल से कर्मठ कार्यकर्ता सुभाषिनी शर्मा प्रमुख दावेदारों में थीं। महिला मोर्चा की शहर जिला कार्यकारिणी सदस्य और पूर्व में शहर जिला महामंत्री रह चुकी सुभाषिनी बैंक की निदेशक भी हैं। पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच चर्चा है कि आखिरी वक्त में उनका नाम हटाकर मूमल कुंवर राठौड़ का नाम क्यों आगे किया गया। मूमल कुंवर राठौड़ के पति और स्वयं ग्रामीण क्षेत्र में वार्ड पंच रह चुके हैं। यही बात अब पार्टी के भीतर चर्चा का विषय बनी हुई है कि संगठन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले दावेदारों की तुलना में स्थानीय चुनावी अनुभव और अन्य समीकरणों को नजरअंदाज क्यों कर दिया गया। ‘पार्टी के लिए जाजम उठाने वालों’ में सबसे ज्यादा बेचैनीदावेदारी करने वाली महिलाओं का प्रोफाइल भी इस नाराजगी को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। करीब 11 महिला दावेदारों में कई एमए, बीएड और उच्च शिक्षित बताई जा रही हैं। जैन, राजपूत, साहू, ब्राह्मण सहित विभिन्न सामाजिक वर्गों की महिलाओं ने टिकट के लिए दावेदारी की थी। इनमें पूर्व पार्षद सीमा साहू भी शामिल हैं, जिन्होंने पिछले बोर्ड में इसी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया था और चुनाव में 1917 मतों से जीत दर्ज की थी। प्रियंका कुंवर शक्तावत, अधिवक्ता जितेंद्रसिंह शक्तावत की पत्नी भी दावेदार थीं और पूर्व में वार्ड पंच रह चुकी हैं। भाजपा कार्यकर्ता रोहित राठौड़ की माताजी ने भी दावेदारी की थी। निर्मला पालीवाल का नाम भी प्रमुख दावेदारों में रहा। उनके पति यशवंत पालीवाल भाजपा में सक्रिय हैं और जिला क्रिकेट संघ में उपाध्यक्ष हैं। उनका परिवार लंबे समय से जनसंघ-भाजपा से जुड़ा होने की बात पार्टी के भीतर कही जाती है। खेल जगत में भी पालीवाल परिवार की पहचान है और क्रिकेट संघ में राज्यपाल कटारिया से लेकर फूलसिंह मीणा से उनका सीधा जुड़ाव है। इसके अलावा हंसा जैन, मनीला जैन समेत अन्य महिलाओं ने भी दावेदारी की थी। मनीला जैन के परिवार का भाजपा संगठन और हिरणमगरी व्यापार मंडल से जुड़ाव बताया जाता है। चाय पर चर्चा में साथ चलने का संकल्प, अब टिकट पर टकरावटिकट प्रक्रिया के दौरान कल ही दावेदारों के बीच ‘चाय पर चर्चा’ भी हुई थी। उस दौरान सभी ने एकजुट होकर चुनाव लड़ने और पार्टी प्रत्याशी को जिताने की बात कही थी। लेकिन टिकट को लेकर अंतिम समय में बदले घटनाक्रम ने उस एकजुटता की परीक्षा ले ली है। अब कार्यकर्ताओं के बीच सवाल उठ रहा है कि जब पार्टी ने अलग-अलग सामाजिक वर्गों और संगठन से जुड़ी महिलाओं को पैनल में शामिल किया था, तो फिर अंतिम समय में प्रक्रिया को बदलने की जरूरत क्यों पड़ी? विधायक के पास पहुंचे कार्यकर्ता, जताया असंतोषटिकट को लेकर पैदा हुआ असंतोष शनिवार को उदयपुर ग्रामीण विधायक फूलसिंह मीणा तक भी पहुंचा। दावेदारों और कार्यकर्ताओं से जुड़े लोग उनसे मिलने पहुंचे और घोर आपत्ति दर्ज कराई।सूत्रों के अनुसार विधायक की ओर से फिलहाल देखते हैं, बात करते हैं जैसा जवाब दिया गया। लेकिन नाराज कार्यकर्ताओं का कहना था कि अब सिर्फ आश्वासन से बात नहीं बनेगी। उनका संदेश साफ था कि कोहनी में गुड़ लगाने से काम नहीं चलेगा नेताजी। कार्यकर्ता अब सीधे और स्पष्ट समाधान चाहते हैं।कार्यकर्ताओं की नाराजगी में शिक्षा और संगठन का मुद्दा भीवार्ड में चर्चा सिर्फ टिकट पाने और खोने तक सीमित नहीं है। कुछ कार्यकर्ता दावेदारों की शैक्षणिक योग्यता और संगठन में उनकी सक्रियता को भी मुद्दा बना रहे हैं। उनका कहना है कि जब कई दावेदार उच्च शिक्षित हैं और वर्षों से पार्टी का काम कर रहे हैं, तो टिकट तय करते समय संगठनात्मक योगदान को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। इसी संदर्भ में कार्यकर्ताओं के बीच यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि वार्ड पंच रहना और संगठन में वर्षों तक काम करना—इन दोनों में पार्टी के लिए राजनीतिक महत्व किसका ज्यादा होना चाहिए? अब भाजपा के पास सिर्फ रविवारवार्ड 57 में पैदा हुआ यह असंतोष फिलहाल अंदरखाने है, लेकिन यदि टिकट को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हुई तो इसके और मुखर होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। भाजपा के लिए समय बेहद कम है। रविवार का दिन ही असंतुष्ट दावेदारों और कार्यकर्ताओं को साधने का आखिरी बड़ा मौका है। सोमवार को नामांकन की अंतिम तारीख है। ऐसे में अब निगाहें इस बात पर हैं कि पार्टी नेतृत्व वार्ड 57 के भीतर उठे तूफान को कैसे शांत करता है। क्योंकि सवाल यह बन चुका है कि पार्टी की चुनावी प्रक्रिया में पैनल, रायशुमारी और वर्षों की संगठनात्मक मेहनत भारी पड़ेगी या आखिरी वक्त की पर्ची और राजनीतिक सिफारिश? 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