रिपोर्ट— जयवंत भैरविया24 News Update उदयपुर। लेकसिटी में जनता के टेक्स के पैसों से बन रहे 137 करोड़ रुपये की लागत के एलिवेटेड में नगर निगम और ठेका लेने वाली कंपनी के बीच तगड़ी मैच फिक्सिंग हो गई लगती है। ठेकेदार मनमर्जी से इसे बनाए जा रहा है और निगम टेण्डर शर्तों की पालना नहीं करने पर भी आंख मूंद कर बैठी हुई है। ये सब वैसा ही है जैसे कि आपने कोई महाभोज रखा और उसमें पता चला कि इवेंट मैनेजर की हलवाई से फिक्सिंग हो गई। क्या पकवान बनाने हैं, कौनसे काउंटर लगाने हैं….से लेकर तंदूरी दाल में काउंटर तक का फैसला खुद ही किए जा रहा है। आप पूछ रहे हैं कि भैया, मिठाई टेस्ट तो करवा दो कैसी बन रही है, मगर इवेंट वाला आपको जवाब ही नहीं दे रहा है। याने पइसा आपकी जेब का खरच हो रहा है और मजे इवेंट वाला और हलवाई ले रहा है।अब तो आप समझ ही गए होंगे कि यही सब हमारे उदयपुर के एलिवेटेड रोड याने कि एलिवेटेड फलाई ओवर के निर्माण में हो रहा है। पैसा जनता का है मगर जनता केवल टुकुर—टुकुर देख रही है कि आज यहां पिलर खड़ा हुआ, कल वहां। आज यहां खोद दिया, कल वहां। मगर उसको यह जानने का हक ही नहीं दिया गया है कि उस जनता का इवेंट मैनेजर याने की नगर निगम उसी का टेक्स का पइसा लेकर हलवाई याने कि एलिवेटेड के ठेकेदार के साथ क्या गुल खिला रहा है। खबर यहां तक पढ़ते—पढ़ते आपके मन में भी जिज्ञासा जागी होगी कि इस सार्वजनिक कमठाणे में चल रहे काम में सीमेंट कितनी, कौनसे ग्रेड की लगी है, सरिया कौनसे मानकों का है। ठेकेदार कि किए कराए की जांच कौनसी लेब में हो रही है। मगर यह सब पूछने पर आपको निगम जवाब ही नहीं दे रहा है। याने लोकतंत्र में मेरी ही बिल्ली, मुझ ही से म्याऊ करती नजर आ रही है। आरटीआई के तहत बार—बार पूछने पर भी निगम यह नहीं बता रहा है कि एलिवेटेड रोड के टेण्डर की लिखित शर्तों के अनुसार काम हो रहा है या नहीं?? टेण्डर में बताई गई टेस्टिंग लेब कहीं पर है भी या नहीं?? या फिर जनता क्या उखाड़ लेगी…वाली बात सोच कर पर्दे के पीछे कुछ और ही खेल चल रहे हैं। सच कहें तो ऐसे जीमण को लूटने वाले हलवाई को बर्दाश्त तो नहीं किया जा सकता। एलिवेटेड रोड के निर्माण के दौरान जमीन पर हालाता विकट हैं। एलिवेटेड रोड के ठेकेदार ने टेंडर एग्रीमेंट पर दस्तखत किए, पर शर्तें मान कौन रहा है? और हमारे एलिवेटेड के निर्माता—निर्देशक भी हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। ऐसा लग रहा है उनको कुछ पड़ी ही नहीं हैं??? याने कि जिन पर निगरानी की जिम्मेदारी हमने सौंपी थी, वे खुद ही किसी और को जिम्मेदारी सौंपकर मस्त हो गए। सार्वजनिक धन की चौकीदारी भी उनसे नहीं हो रही है।साइट आफिस हो गया हवा—हवाईजानकार इंजीनियरों की नजर में प्रोजेक्ट में तकनीकी खामियां साफ़ दिखती हैं, मगर निगरानी का ढांचा ही अधूरा और चरमराया हुआ है। टेंडर दस्तावेज़ों में स्पष्ट है कि एलिवेटेड रोड को बनाने वाले वाला ठेकेदार को 200 वर्गफीट का साइट ऑफिस (टॉयलेट सहित) उपलब्ध कराना होगा, जिसमें फर्नीचर, बिजली-पानी, टेलीफोन, इंटरनेट, लेटेस्ट कॉन्फ़िगरेशन वाला कंप्यूटर और आवश्यक सॉफ्टवेयर तक शामिल होगा। इतना ही नहीं, सड़क और पुल निर्माण के लिए मिनिस्ट्री ऑफ रोड ट्रांसपोर्ट एंड हाइवे (MoRTH) के सेक्शन 120 के अनुरूप एक फील्ड लेबोरेटरी भी अनिवार्य होगी। ताकि गुणवत्ता की जांच मौके पर हो सके। लेकिन कोई नहीं बता पा रहा है कि लेब कहां है जो टेस्ट कर रही है?? आज अगर उदयपुर के जागरूक लोग जानना चाहें कि जो ढांचा खड़ा हो रहा है उसकी टेस्टिंग लेब कहां पर है?? तो नगर निगम जवाब देने की हालत में नहीं है??? भाई, ऐसी अंधेरगर्दी तो आज तक हमने कहीं नहीं देखी।कोई निगरानी नहीं, धूल में लठ चल रहे हैंअब ज़रा मज़ेदार—या कहें चिंताजनक—तथ्य देखिए। एलिवेटेड रोड के कई पिलर खड़े हो चुके हैं, लेकिन साइट ऑफिस और फील्ड लेबोरेटरी का कहीं नामोनिशान नहीं। नगर निगम द्वारा नियुक्त ऑथोरिटी इंजीनियर को न साइट ऑफिस सौंपा गया, न गुणवत्ता परीक्षण की लैब। ऐसे में जब निगरानी के औज़ार ही नहीं थे, तो गुणवत्ता किस आधार पर परखी गई? परखी भी जा रही है या फिर नहीं???आरटीआई के तहत जानकारी मांगी गई जानकारी(1) साइट ऑफिस के हैंडिंग-ओवर/टेकिंग-ओवर की सत्यापित रिपोर्ट,(2) मटेरियल टेस्टिंग फील्ड लेबोरेटरी के हैंडिंग-ओवर/टेकिंग-ओवर की सत्यापित रिपोर्ट। संदर्भ—एग्रीमेंट का शिड्यूल सी-2 (g), पृष्ठ 176, समग्र पृष्ठ 262—जहां साइट ऑफिस के टेबल-कुर्सी से लेकर ड्रॉइंग कैबिनेट और इंटरनेट-सक्षम कंप्यूटर तक का पूरा खाका दर्ज है।इस अति महत्वपूर्ण और जनता के हितों की रक्षा के लिए लगाई गई आरटीआई का नगर निगम ने पहले जवाब देना ज़रूरी नहीं समझा। प्रथम और द्वितीय अपील के बाद भी आरटीआई के प्रति गंभीरता नदारद रही। आखिरकार सूचना आयोग तक मामला गया। सूचना आयोग ने कहा कि जवाब दे दीजिए, प्रोब्लम क्या हे?? इस आदेश के बाद नींद में खर्राटे ले रे अफसरों की आंख खुली और जो जवाब दिया आया, उसने पूरे मामले से पर्दा उठा दिया। नगर निगम का जवाब था केवल दो पंक्तियों का: “सूचना उपलब्ध नहीं है।”ये तो धोखा हुआ उदयपुर की जनता के साथअब सवालों की बौछार शुरू होती है। सूचना उपलब्ध नहीं है तो क्या साइट ऑफिस बना ही नहीं? फील्ड लेबोरेटरी बनी नहीं—तो गुणवत्ता जांच कैसे हो रही है? अगर बनी थी—तो हैंडओवर का रिकॉर्ड कहां गया? और अगर रिकॉर्ड नहीं है— तो भुगतान किस भरोसे पर हो रहा है? क्या 137 करोड़ की परियोजना बिना अनिवार्य निगरानी ढांचे के आगे बढ़ती जा रही है? और अगर हां—तो जिम्मेदारी किसकी है: ठेकेदार की, नगर निगम की, या दोनों की? सूचना उपलब्ध नहीं जवाब का अर्थ सीधा है कि अगर साइट ऑफिस और फील्ड लेबोरेटरी टेंडर शर्तों के अनुसार बनाकर निगम को सौंपी जातीं, तो उनकी रिपोर्ट होती। रिपोर्ट होती, तो सूचना होती। सूचना नहीं है, तो या तो शर्तें पूरी नहीं हुईं, या जानबूझकर आंखें मूंदी गईं। दोनों ही स्थितियों में यह मामला सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि सार्वजनिक धन और जनहित के साथ खिलवाड़ का संकेत देता है।ठेकेदार से बहुत याराना लगता हैजनता का सवाल साफ़ है— टेंडर शर्तों की खुली अवहेलना पर क्या कोई कार्रवाई होगी? क्या ठेकेदार से जवाबदेही तय की जाएगी? या फिर “सूचना उपलब्ध नहीं” कहकर 137 करोड़ के इस एलिवेटेड रोड को भी कागज़ी पुल बनाकर छोड़ दिया जाएगा? एलिवेटेड रोड कोई मजाक नहीं है। अब तो नेताओं और जन प्रतिनिधियों को तुरंत दखल देकर इस बारे में जवाब मांगना चाहिये कि भाई ये क्या गोरखधंधा चल रहा है, टेस्ट नहीं करोगे तो गुणवत्ता का पता कैसे चलेगा?? कम से कम वे बड़े कद के नेताजी तो पूछ ही सकते हैं जो दावा करते थे पूरे काम पर हमारी सख्त निगरानी रहेगी?? भाई, साहब यहां तो निगरानी दूर की कौड़ी हो गई। निगम और ठेकेदार का फिक्सिंग वाला मैत्री मैच शुरू हो गया है। जवाब आज के आज चाहिए, फीता काटते समय नहीं, क्योंकि तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। नहीं तो पछतावा वैसा ही बाद में होगा जैसा कि बिल्ली को दूध की रखवाली का जिम्मा देने वालों को होता है। धन भी गया, धरम भी गया!!! 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