24 News Update सागवाड़ा (जयदीप जोशी)। नगर के महिपाल विद्यालय खेल मैदान में दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा आयोजित सात दिवसीय शिव कथा के प्रथम दिन 28 दिसम्बर रविवार को दिव्य गुरु आशुतोष महाराज की शिष्या साध्वी सुश्री गरिमा भारती ने शिव महापुराण कथा सुनाते हुए कहा कि धर्म वास्तव में एक ही है, जो मानव को मानव से जोड़ता है। ईश्वर को जानने से शाश्वत शांति मिलती है।
कथा के प्रथम दिन दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज की शिष्या कथा व्यास साध्वी सुश्री गरिमा भारती जी ने कथा का शुभारम्भ करते हुए शिव महापुराण की कथा सुनाई तथा उपस्थित श्रद्धालुओं को शवत्व से ऊपर उठकर शिवत्व को जानने का संदेश दिया। साध्वी ने कहा कि कथा भक्तों की जीवन गाथा हमें शिव भक्ति से अपने जीवन को कृतार्थ करने के लिए प्रेरित करती है।
साध्वी जी ने बताया कि जब भी मानव समाज सत्य, न्याय एवं धर्म की परिभाषा को भूलकर अधर्म व पाप की पगडंडी पर अपने पग बढ़ाता है, तब शिव रूपी सत्ता स्वयं संत-महापुरुष के रूप में अवतरित होकर मानव को धर्म के वास्तविक स्वरूप से अवगत करवाती है। आज मानव दुष्कर्म करते हुए स्वयं को धार्मिक कहलाता है, क्योंकि वह धर्म शब्द से तो परिचित है, पर उसके स्वरूप से अनभिज्ञ है।
समाज में चारों ओर फैली अनैतिकता, अशांति, अनुशासनहीनता एवं भ्रष्टाचार का मूल हमारी धर्म से अनभिज्ञता ही है। धर्म वास्तव में एक ही है, जो मानव को मानव से जोड़ता है। धर्म मानवता को प्रेम के सूत्र में बांधता है। घोर विडम्बना है कि आज हम धर्म के नाम पर विभाजित हैं। दुनिया में सबसे अधिक रक्तपात धर्म के नाम पर होता है। जो धर्म मानव के खून का प्यासा हो, वह धर्म कैसे हो सकता है? जिसे हमने धर्म मान लिया है, वह धर्म नहीं बल्कि सम्प्रदाय है।
यदि हम समाज में शांति एवं एकता की स्थापना कर आज़ाद फ़िज़ा में सांस लेना चाहते हैं, तो हमें धर्म की वास्तविक प्रक्रिया से गुजरना ही पड़ेगा। हमारे समस्त धार्मिक शास्त्रों के अनुसार धर्म एक है, जो आदिकाल से चला आ रहा है। वह कहीं बाहर नहीं, अपितु हम सबके भीतर है। ईश्वर को अपने अंतःकरण में देख लेना ही वास्तविक धर्म है। धर्म को अंग्रेज़ी में Religion कहा जाता है, जो लैटिन भाषा से निष्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ है—अपने मूल से जुड़ना। हमारा मूल ईश्वर है। उससे विमुख होने के कारण ही आज मानव समाज में भ्रष्टाचार, नशाखोरी, अनैतिकता, कन्या भ्रूण हत्या, गोहत्या जैसी कुरीतियाँ जन्म ले रही हैं। धर्म से जुड़ने के पश्चात ही मानव को वास्तविकता का ज्ञान संभव है। धर्म का अर्थ अपने मूल परमात्मा से जुड़ना है। इसके लिए एक श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरु का सान्निध्य आवश्यक है। जब जीवन में गुरु का पदार्पण होगा, तभी वह ब्रह्मज्ञान प्रदान करेगा, जिससे ईश्वर का दर्शन संभव होगा। इस अवसर पर नगर एवं आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों सहित उदयपुर, बांसवाड़ा, डूंगरपुर आदि दूर-दराज़ से श्रद्धालु उपस्थित रहे।


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By desk 24newsupdate

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