चित्तौड़गढ़। विश्व धरोहर चित्तौड़गढ़ दुर्ग में रविवार सुबह चला बुलडोजर सिर्फ एक अवैध इमारत नहीं गिरा रहा था, बल्कि वह उन सवालों को भी मलबे में दबाने की कोशिश करता दिखा जो वर्षों से प्रशासन और पुरातत्व विभाग की कार्यप्रणाली पर खड़े हो रहे हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की खातेदारी भूमि पर करीब 0.14 हेक्टेयर क्षेत्र में दो मंजिला व्यावसायिक भवन तैयार हो गया, स्विमिंग पूल के लिए गहरी खुदाई हो गई, ऐतिहासिक पत्थरों का इस्तेमाल हो गया, लेकिन जिम्मेदार विभागों को इसकी भनक तब लगी जब निर्माण लगभग पूरा होने की स्थिति में पहुंच गया। रविवार को जिला प्रशासन ने नौ जेसीबी, पांच ट्रैक्टर और भारी पुलिस बल की मौजूदगी में इस निर्माण को ध्वस्त कर दिया, लेकिन कार्रवाई के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उभरकर सामने आया कि आखिर इतनी बड़ी संरचना प्रशासन और संबंधित विभागों की आंखों के सामने कैसे खड़ी हो गई? क्या सिर्फ अतिक्रमण था या व्यवस्था की नाकामी का स्मारक? एएसआई का दावा है कि वर्ष 2024 में अवैध निर्माण की जानकारी सामने आने के बाद नोटिस जारी किए गए थे। इसके बावजूद निर्माण लगातार जारी रहा, जमीन का लेन-देन होता रहा और नए खरीदारों ने बेखौफ होकर दो मंजिला कमर्शियल बिल्डिंग तैयार कर दी। यदि विभाग की चेतावनियां वास्तव में प्रभावी थीं तो निर्माण कार्य उसी समय क्यों नहीं रुकवाया गया? यह सवाल अब स्थानीय लोगों के बीच भी चर्चा का विषय बन गया है। इतिहास के पत्थरों से खड़ी हुई आधुनिक इमारत जांच में सामने आया कि निर्माण सामग्री ऊपर पहुंचाने की कठिनाई से बचने के लिए खुदाई में निकले पत्थरों के साथ-साथ दुर्ग क्षेत्र के आसपास मौजूद ऐतिहासिक पत्थरों का भी इस्तेमाल किया गया। यही नहीं, परिसर में एक आलीशान स्विमिंग पूल बनाने के लिए गहरा गड्ढा भी खोदा गया। यह सब कार्य कई दिनों या हफ्तों में नहीं, बल्कि लंबे समय में हुआ होगा, जिससे निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। बुलडोजर चला, लेकिन सवाल अभी भी खड़े हैं सुबह चार बजे से ही नगर परिषद, एएसआई और पुलिस की संयुक्त टीम ने रामपोल से राणा रतन सिंह महल तक का रास्ता बंद कर कार्रवाई शुरू की। सुबह पांच बजे से भारी मशीनों ने भवन को तोड़ना शुरू किया और कुछ ही घंटों में पूरी इमारत मलबे में तब्दील कर दी गई। लेकिन कार्रवाई के दौरान यह भी स्पष्ट हुआ कि जिस अवैध निर्माण को रोकने के लिए शुरुआती स्तर पर छोटे कदम पर्याप्त हो सकते थे, उसे हटाने के लिए अब पूरे प्रशासनिक अमले और भारी संसाधनों की जरूरत पड़ गई। 22 साल में सिर्फ पांच नए अतिक्रमण? आंकड़े खुद बयान कर रहे कहानी सबसे चौंकाने वाला तथ्य एएसआई के रिकॉर्ड से सामने आया। वर्ष 2004 में दुर्ग क्षेत्र में 64 व्यावसायिक अतिक्रमण चिन्हित थे, जबकि 2026 तक यह संख्या 69 पहुंची। यानी विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार 22 वर्षों में केवल पांच नए अतिक्रमण बढ़े। जबकि स्थानीय स्तर पर पिछले दो-तीन वर्षों में ही कई नई व्यावसायिक इमारतें खड़ी होती दिखाई दीं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सर्वेक्षण और निगरानी केवल कागजों तक सीमित रही या फिर कहीं न कहीं प्रशासनिक उदासीनता ने अतिक्रमणकारियों का मनोबल बढ़ाया? कानूनी प्रक्रिया बनाम समय पर कार्रवाई एएसआई अधिकारियों का कहना है कि निर्माणाधीन अतिक्रमणों पर जिला मजिस्ट्रेट कार्रवाई कर सकते हैं, जबकि पूर्ण निर्मित भवनों के लिए दिल्ली स्थित महानिदेशक की मंजूरी आवश्यक होती है। लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि प्रारंभिक स्तर पर निर्माण रोक दिया जाए तो बाद में करोड़ों रुपये की लागत और भारी मशीनरी लगाने की नौबत ही नहीं आए। क्या मिलीभगत की भी होगी जांच? इतनी बड़ी व्यावसायिक इमारत, स्विमिंग पूल की खुदाई, भारी मात्रा में निर्माण सामग्री की आवाजाही और लगातार चल रहे निर्माण कार्य के बावजूद यदि किसी विभाग को समय रहते प्रभावी कार्रवाई की जरूरत महसूस नहीं हुई, तो यह केवल लापरवाही का मामला है या फिर इसके पीछे प्रशासनिक मिलीभगत की भी कोई परत छिपी है? फिलहाल इस प्रश्न का कोई आधिकारिक उत्तर नहीं है, लेकिन घटनाक्रम ने इस संभावना पर सार्वजनिक बहस जरूर छेड़ दी है। अभी भी दर्जनों अतिक्रमणों पर नजर एएसआई ने स्पष्ट किया है कि 1992 से पहले बने मकानों को फिलहाल नहीं हटाया जाएगा, हालांकि वे भी विभागीय रिकॉर्ड में अतिक्रमण की श्रेणी में हैं। ऐसे में यह कार्रवाई केवल एक इमारत तक सीमित रहेगी या दुर्ग क्षेत्र में वर्षों से पनप रहे अन्य अवैध निर्माणों पर भी इसी सख्ती के साथ बुलडोजर चलेगा, इस पर सबकी निगाहें टिकी हैं। कार्रवाई से बड़ा सवाल—जिम्मेदार कौन? रविवार की कार्रवाई ने एक अवैध निर्माण तो मिटा दिया, लेकिन उससे कहीं बड़ा सवाल अभी भी जस का तस है। यदि विश्व धरोहर जैसे संवेदनशील क्षेत्र में एएसआई की अपनी जमीन पर दो मंजिला व्यावसायिक इमारत तैयार हो सकती है, तो निगरानी व्यवस्था की जवाबदेही आखिर किसकी है? क्या केवल अतिक्रमणकारियों पर कार्रवाई पर्याप्त है या उन अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए, जिनकी आंखों के सामने यह निर्माण आकार लेता रहा? यही सवाल अब चित्तौड़गढ़ की प्राचीरों से निकलकर पूरे प्रशासनिक तंत्र के सामने खड़ा हो गया है। Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading… Related Discover more from 24 News Update Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Post navigation 15 जून से आपदा प्रबंधन नियंत्रण कक्ष 24 घंटे रहेगा सक्रिय चित्तौड़गढ़ RTO में बड़ा फर्जीवाड़ा: अधूरे टैंकरों का हुआ रजिस्ट्रेशन, 6 RC रद्द, तीन मालिकों पर केस