24 News Update नई दिल्ली। राजस्थान में पुलिस कस्टडी में हुई 11 मौतों के मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने आज सख़्त रुख अपनाते हुए साफ कहा कि पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाए जाना मात्र औपचारिकता नहीं हो सकती। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि कैमरों का लगातार और प्रभावी रूप से काम करना अनिवार्य है और यदि किसी घटना के समय कैमरे बंद, खराब या अनुपलब्ध पाए जाते हैं तो यह स्थिति अपने आप में गंभीर संवैधानिक सवाल खड़े करती है। कोर्ट ने यह भी दोहराया कि कस्टडी से जुड़े मामलों में पारदर्शिता और जवाबदेही से किसी तरह का समझौता स्वीकार्य नहीं होगा।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व निर्देशों को दोहराते हुए राज्यों को यह सुनिश्चित करने को कहा कि सभी पुलिस थानों के सीसीटीवी कैमरे एक केंद्रीकृत सर्वर प्रणाली से जुड़े हों। पीठ ने स्पष्ट किया कि Centralized Server System का उद्देश्य केवल निगरानी नहीं, बल्कि डेटा की सुरक्षा, रिकॉर्ड के संरक्षण और संस्थागत जवाबदेही को सुनिश्चित करना है, ताकि किसी भी संवेदनशील घटना के समय यह बहाना न दिया जा सके कि कैमरे बंद थे या फुटेज उपलब्ध नहीं है।
शपथ पत्र में सरकार ने यह कहा
इस पर राजस्थान सरकार की ओर से पेश किए गए शपथ-पत्र में बताया गया कि प्रदेश में कुल 1050 पुलिस थानों में से 915 थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाए जा चुके हैं, जबकि 135 थानों में यह प्रक्रिया अभी लंबित है और 10 थाने निर्माणाधीन हैं। सरकार ने यह भी कहा कि प्रत्येक थाने में कैमरों की संख्या 6 से बढ़ाकर 16 की जा रही है और इसके लिए 75.12 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बजट स्वीकृत किया गया है। हालांकि इन दावों पर कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल आंकड़े पेश करना पर्याप्त नहीं है, असली कसौटी यह है कि कैमरे हर समय कार्यशील हों और उनका रिकॉर्ड जरूरत पड़ने पर उपलब्ध कराया जाए। अतिरिक्त महाधिवक्ता शिव मंगल शर्मा ने कोर्ट को अवगत कराया कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही निर्देश दे चुका है कि प्रत्येक राज्य एक केंद्रीकृत सर्वर प्रणाली विकसित करे, जिससे सभी थानों के कैमरे आपस में जुड़े हों और डेटा के साथ किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ की संभावना समाप्त हो। इस पर पीठ ने दो टूक कहा कि यदि डेटा मौजूद है, तो जवाबदेही भी तय होनी चाहिए और यह व्यवस्था केवल कागजों में नहीं, व्यवहार में दिखाई देनी चाहिए।
24 न्यूज अपडेट ने उठाया था मामला
यहीं से वह बिंदु सामने आता है, जिसे 24 न्यूज अपडेट ने राज्य-स्तरीय मुहिम के ज़रिये लगातार उजागर किया है। पत्रकार व आरटीआई एक्टिविस्ट जयवंत भैरविया ने पूरे राज्य में यह मुहिम सबसे पहले चला कर खुलासा किया था कि राजस्थान में थानों के सीसीटीवी के नाम पर मजाक चल रहा है। घटनाएं होने पर सीसीटीवी फुटेज नहीं दिए जा रहे हैं। भरपूर बहाने इसके पुलिस बार बार बना कर टाल रही है। उदयपुर में भी ऐसे कई मामले सामने आए। 24 न्यूज अपडेट ने यह सवाल उठाया कि जब सरकार और पुलिस दावा कर रही है कि अधिकांश थानों में सीसीटीवी लगे हैं, तो फिर हर संवेदनशील घटना के बाद फुटेज क्यों नहीं दिया जाता। इस मुहिम के तहत सामने आया कि थानों में अक्सर तकनीकी खराबी, सुरक्षा कारण या निजी सूचना का हवाला देकर फुटेज देने से इनकार कर दिया जाता है।
जमीनी स्तर पर कोई बदलाव नहीं
इस संदर्भ में 24 न्यूज अपडेट से बातचीत में पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट जयवंत भैरविया ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के पुराने और हालिया निर्देशों के बावजूद ज़मीनी स्तर पर स्थिति में कोई ठोस बदलाव नहीं आया है। उन्होंने बताया कि कई मामलों में पुलिस यह कहकर सीसीटीवी फुटेज देने से मना कर देती है कि पहले आप घटना का पूरा विवरण दीजिए, उसके बाद ही फुटेज उपलब्ध कराया जाएगा। उदयपुर में ऐसा मामला सामने आ चुका है, जिसे भैरविया ने न केवल हास्यास्पद बल्कि सुप्रीम कोर्ट की मंशा के विपरीत बताया। आरटीआई के ज़रिये पूरे राज्य के पुलिस थानों से जो तस्वीर सामने आई है, वह और भी चिंताजनक है। कई मामलों में बताया गया कि घटना के समय कैमरे बंद थे, कभी उन्हें खराब बता दिया गया, कभी मेंटेनेंस का हवाला दिया गया और कई बार फुटेज को निजी सूचना कहकर रोक लिया गया। सवाल यह है कि जब ये कैमरे जनता के टैक्स के पैसे से लगाए गए हैं, तो थाने के भीतर होने वाली घटनाएं निजी कैसे हो सकती हैं। इससे भी बड़ा सवाल यह है कि अगर थाने में किसी के साथ कुछ गलत नहीं होता, तो फिर फुटेज देने में इतनी हिचक क्यों है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्वत: संज्ञान लेते हुए इसे जनहित याचिका में तब बदला था, जब यह तथ्य सामने आया कि साल 2025 के पहले आठ महीनों में राजस्थान में पुलिस कस्टडी में 11 लोगों की मौत हो चुकी है। कोर्ट ने राजस्थान सहित अन्य राज्यों से उनके यहां थानों में सीसीटीवी कैमरों की स्थिति और उनके संचालन को लेकर विस्तृत जानकारी मांगी थी। गौरतलब है कि इससे पहले दिसंबर 2020 में परमवीर सिंह सैनी बनाम बलजीत सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट स्पष्ट आदेश दे चुका है कि सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके अधीन प्रत्येक पुलिस स्टेशन में सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं और उनका रिकॉर्ड सुरक्षित रखा जाए।
सबसे बड़ा सवाल—क्या जमीनी स्तर पर यह हो पाएगा??
आज की सुनवाई के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब सुप्रीम कोर्ट के निर्देश इतने स्पष्ट हैं, तो ज़मीनी स्तर पर बहानेबाज़ी क्यों जारी है। क्या अब कोर्ट को और अधिक सख़्त, दंडात्मक दिशा-निर्देश देने पड़ेंगे, या फिर सिस्टम खुद समझेगा कि यह मामला केवल तकनीक का नहीं, बल्कि किसी की जान, स्वतंत्रता और आत्मसम्मान से जुड़ा हुआ है। 24 न्यूज अपडेट ने इस मुद्दे को सामने रखा है, सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दे दिए हैं, अब असली परीक्षा शासन और पुलिस व्यवस्था की है।
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