24 न्यूज अपडेट, उदयपुर, 7 अप्रैल। पर्यावरणीय संकट के बीच समाधान की तलाश में मंगलवार को उदयपुर का शैक्षणिक परिसर वैश्विक विमर्श का केंद्र बन गया, जब राजस्थान विद्यापीठ के शिक्षा संकाय स्थित लोकमान्य तिलक शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय में दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन “एनवायरमेंटल अवेयरनेस फ्रॉम नॉलेज टू एक्शन—पर्यावरणीय जागरूकता: ज्ञान से क्रिया तक” का भव्य आगाज हुआ। सर्व विद्यालय केलवानी मंडल, काडी (गांधीनगर, गुजरात) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस सम्मेलन में देश-विदेश से डेढ़ सौ से अधिक शिक्षाविद्, शोधार्थी और पर्यावरणविद भाग ले रहे हैं। कार्यक्रम का शुभारंभ ‘वॉटर मैन ऑफ इंडिया’ के रूप में विख्यात मैग्सेसे पुरस्कार विजेता डॉ. राजेंद्र सिंह, कुलपति प्रो. एस.एस. सारंगदेवोत, यूनेस्को सीईओ डॉ. राम भुज, प्राचार्य प्रो. सरोज गर्ग, प्रो. वीणा पटेल, प्रो. रचना राठौड़ एवं प्रो. बलिदान जैन द्वारा माँ सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। मुख्य वक्ता डॉ. राजेंद्र सिंह ने अपने संबोधन में भारतीय परंपरा को पर्यावरणीय समाधान की जड़ बताते हुए कहा कि “सनातन केवल आस्था नहीं, बल्कि प्रकृति, संस्कृति और व्यवहार का वैज्ञानिक समन्वय है। भारत ने इसी ज्ञान के आधार पर विश्व को दिशा दी थी।” उन्होंने अरावली पर्वतमाला के संरक्षण को राष्ट्रीय कर्तव्य बताते हुए कहा कि “यह केवल पहाड़ नहीं, हमारी सभ्यता की रीढ़ है।” उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 21, 48ए और 51ए का उल्लेख करते हुए पर्यावरण संरक्षण को नागरिक और राज्य दोनों की जिम्मेदारी बताया। सारंगदेवोत का तीखा संदेश: “प्रकृति नहीं बचेगी तो मानव का अस्तित्व भी नहीं बचेगा” सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. एस.एस. सारंगदेवोत ने अपने संबोधन में पर्यावरणीय मुद्दों पर स्पष्ट और कठोर रुख अपनाया। उन्होंने कहा— “आज सबसे बड़ा भ्रम यही है कि हम सोचते हैं कि पर्यावरण को हमारी जरूरत है, जबकि सच्चाई उलट है—हमें पर्यावरण की जरूरत है। अगर प्रकृति का संतुलन बिगड़ा, तो मानव सभ्यता का अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाएगा।” उन्होंने जोर देकर कहा कि केवल नीतियाँ बनाना अब पर्याप्त नहीं है— “ज्ञान के भंडार तैयार कर लेने से कुछ नहीं होगा, जब तक वह व्यवहार में न उतरे। पर्यावरण संरक्षण की असली चुनौती ‘ज्ञान से क्रिया’ तक पहुंचने की है, और यही इस सम्मेलन का मूल संदेश है।” सारंगदेवोत ने जलवायु परिवर्तन, बढ़ते प्रदूषण, जल संकट और संसाधनों के अंधाधुंध दोहन को मानव निर्मित संकट बताते हुए कहा— “हमने विकास के नाम पर विनाश को आमंत्रण दिया है। अब समय है कि हम विकास की परिभाषा बदलें और प्रकृति के साथ संतुलन को प्राथमिकता दें।” उन्होंने विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों की भूमिका को निर्णायक बताते हुए कहा— “यदि शिक्षा व्यवस्था संवेदनशील नागरिक तैयार नहीं कर पा रही, तो वह अधूरी है। हमें ऐसी शिक्षा देनी होगी जो विद्यार्थियों को केवल डिग्री नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का बोध कराए।” आमजन से सीधा संवाद करते हुए उन्होंने कहा— “पर्यावरण बचाने के लिए बड़े अभियानों का इंतजार मत कीजिए। अपने घर से शुरुआत कीजिए—जल बचाइए, पेड़ लगाइए, प्लास्टिक छोड़िए और स्वच्छता अपनाइए। छोटे-छोटे कदम ही बड़े बदलाव की नींव बनते हैं।” “गर्मी के 11 साल—चेतावनी नहीं, आपातकाल” : डॉ. राम भुज विशिष्ट अतिथि यूनेस्को सीईओ डॉ. राम भुज ने वैश्विक परिप्रेक्ष्य में पर्यावरण संकट की गंभीरता को रेखांकित करते हुए कहा— “पिछले 11 वर्ष मानव इतिहास के सबसे गर्म वर्ष रहे हैं। यह केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि क्लाइमेट इमरजेंसी का स्पष्ट संकेत है।” उन्होंने जैव विविधता के क्षरण, कार्बन उत्सर्जन और प्लास्टिक प्रदूषण को पृथ्वी के लिए त्रिस्तरीय खतरा बताते हुए कहा कि समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र भी तेजी से प्रभावित हो रहा है। “यदि अब भी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य की पीढ़ियों को हम केवल संकट सौंपेंगे,” उन्होंने चेताया। उन्होंने पेरिस समझौते के लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए 2025 तक त्वरित और ठोस कार्रवाई की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि— “जागरूकता, शिक्षा और एक्शन—इन तीनों का समन्वय ही समाधान का रास्ता है, और इसमें युवाओं व शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है।” तकनीकी सत्रों में गूंजे समाधान के सूत्र प्रारंभ में प्राचार्य प्रो. सरोज गर्ग ने अतिथियों का स्वागत करते हुए सम्मेलन की पृष्ठभूमि रखी। समन्वयक प्रो. रचना राठौड़ ने जानकारी दी कि पहले दिन पर्यावरण शिक्षा, भारतीय पारंपरिक तकनीकें और सतत विकास, उर्वरकों के विकल्प, तथा जैव विविधता जैसे विषयों पर तकनीकी सत्र आयोजित किए गए। दो दिवसीय सम्मेलन में चार प्रमुख विषयों पर गहन मंथन होगा, जिसमें शोध पत्र प्रस्तुत किए जा रहे हैं। इस दौरान ‘लोकमान्य शिक्षक’ के भाषा, शिक्षा और संस्कृति विशेषांक का विमोचन भी अतिथियों द्वारा किया गया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. हरीश चौबीसा एवं डॉ. कुसुम ने किया, जबकि आभार प्रो. बलिदान जैन ने व्यक्त किया। इस अवसर पर प्रो. एम.पी. सिंह, प्रो. अमी राठौड़, प्रो. सुनीता मुर्डिया, प्रो. अलका सिंह, प्रो. बी.एल. श्रीमाली, डॉ. भाविक शाह, डॉ. शाहिद कुरैशी, डॉ. कैलाश चंद्र चौधरी, डॉ. कुसुम यादव, डॉ. फरजाना, डॉ. मनीषा सक्सेना, डॉ. पुनीत पंड्या, डॉ. जगदीश पटेल, डॉ. सरिता मेनारिया, डॉ. हरीश मेनारिया, डॉ. अमित दवे सहित अनेक शिक्षाविद उपस्थित रहे। Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading... 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