24 News Update सागवाड़ा, 12 अगस्त (जयदीप जोशी)। नगर के आसपुर मार्ग पर लोहारिया तालाब के सामने स्थित कान्हडदासधाम रामद्वारा में शाहपुरा धाम के रामस्नेही संत कीर्तिराम महाराज ने शिव के बारे में बताया कि शिव ही सम्पूर्ण जगत का परम सार व शुद्ध चैतन्य हैं। शिव कोई सीमित देवता नहीं, अपितु वही निरुपाधिक, सर्वव्यापक, अद्वैत ब्रह्म हैं, जो प्रत्येक जीव के हृदय में आत्मस्वरूप से गुह्य रूप में विराजमान हैं।
संत ने कहा कि शिव मंत्र साधक को स्थूल से सूक्ष्म, दृश्य से अदृश्य और नाम-रूप से परे उस परम तत्त्व की ओर ले जाता है, जिसके ज्ञान से समस्त बंधन स्वतः नष्ट हो जाते हैं। जिस प्रकार घृत का सर्वोत्तम और सूक्ष्मतम सार सहज दृष्टि से उपलब्ध नहीं होता, उसी प्रकार परमात्मा भी इंद्रियगोचर नहीं हैं। वे समस्त अनुभवों के अधिष्ठान हैं, किन्तु स्वयं किसी विषय की भांति ग्रहण नहीं किए जा सकते। यह सूक्ष्मता आकार की नहीं, अपितु शुद्ध चैतन्य की है। ब्रह्म मन, बुद्धि और इंद्रियों से परे होकर भी उन्हीं को प्रकाशित करते हैं। वे ज्ञेय नहीं, बल्कि समस्त ज्ञान के आधार हैं। संत ने बताया कि शिव का अर्थ है—कल्याणस्वरूप, मंगलमय, परमब्रह्म। वही परमात्मा प्रत्येक जीव के भीतर आत्मरूप से स्थित हैं। अज्ञान के कारण जीव उन्हें बाहर खोजता है, जबकि वे उसके स्वयं के चैतन्यस्वरूप में ही प्रकाशित हैं। जैसे अग्नि लकड़ी में अप्रकट रहती है और मंथन से प्रकट होती है, वैसे ही आत्मा श्रवण, मनन और निदिध्यासन के द्वारा प्रकट होती है। वास्तव में आत्मा कभी अप्राप्त नहीं होती; केवल अज्ञान का आवरण हटता है। ब्रह्म के अतिरिक्त कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं।
संत ने कहा, ज्ञान ही मोक्ष का कारण है। लौकिक बंधन नहीं, बल्कि अविद्या, अहंकार, राग-द्वेष, कर्म, जन्म-मरण तथा पुनर्जन्म का सम्पूर्ण चक्र ही बंधन है। इन सबका मूल कारण आत्मा और अनात्मा का अध्यास है। जीव देह, मन और इंद्रियों का मिथ्या आरोप आत्मा पर करता है। यही संसार है। ज्ञान होने पर यह अध्यास समाप्त हो जाता है। तब ज्ञानी अनुभव करता है कि परम सत्य किसी दूरस्थ लोक में नहीं, बल्कि प्रत्येक प्राणी के अंतःकरण में स्थित है।
वह सूक्ष्मातिसूक्ष्म, सर्वव्यापक, मंगलमय परमशिव ही सम्पूर्ण विश्व का आधार है। जब साधक उस परमशिव का अपने आत्मस्वरूप के रूप में प्रत्यक्ष साक्षात्कार करता है, तब अविद्या, कर्म, भय, मृत्यु और संसार के समस्त पाश स्वतः टूट जाते हैं। वही ज्ञान परम मुक्ति है, वही अमृतत्व है और वही अद्वैत वेदांत का परम निष्कर्ष है। आत्मा और ब्रह्म भिन्न नहीं; उनका प्रत्यक्ष अनुभव ही मानव जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि है।
संत प्रसाद सारिका सेवक परिवार का रहा। सत्संग के दौरान संत ने प्रस्तुत किए भजन ‘मेरे तन में भी शिव, मेरे मन में भी शिव’ पर श्रद्धालु भाव-विभोर होकर झूम उठे। आज के सत्संग में दामोदर दलाल, विनोद कोठारी, विष्णु भासरिया, हेमंत सोमपुरा, बाबूलाल सेवक, सुरेश ठाकुर, नाथू परमार, विजय पंचाल, बालकृष्ण सोमपुरा के अतिरिक्त कई श्रद्धालु महिलाएं एवं पुरुष मौजूद रहे।


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