24 News Update. पश्चिम एशिया में बढ़ता ईरान-अमेरिका तनाव अब केवल अंतरराष्ट्रीय खबर नहीं रह गया है। इसका असर सीधे भारत की अर्थव्यवस्था पर दिखाई देने लगा है। कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही हैं। आयात महंगा हो रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ने की आशंका है। आने वाले समय में महंगाई और ईंधन संकट की चुनौती और गंभीर हो सकती है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने ने हाल ही में देशवासियों से कई अहम अपीलें कीं। उन्होंने कहा कि एक साल तक सोना खरीदने से बचिए। अनावश्यक विदेश यात्राएं टालिए। पेट्रोल-डीजल की खपत कम कीजिए। कार पूलिंग अपनाइए। वर्क फ्रॉम होम और ऑनलाइन बैठकों को बढ़ावा दीजिए। सार्वजनिक परिवहन का अधिक उपयोग कीजिए। खाद्य तेल और संसाधनों की बर्बादी रोकिए। स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा दीजिए। ये अपीलें सामान्य सरकारी सलाह नहीं हैं। यह साफ संकेत है कि केंद्र सरकार आने वाले आर्थिक दबाव को लेकर चिंतित है और चाहती है कि देश अभी से संयमित जीवनशैली अपनाए। लेकिन दूसरी तरफ देश के कुछ शहरों की तस्वीर बिल्कुल उलट दिखाई देती है। हर दूसरे चौराहे पर विशाल पोस्टर दिख रहे हैं। करोड़ों रुपए के धार्मिक आयोजनों के, भव्य मंच और सैकड़ों वाहन, रातभर चलने वाली लाइटिंग, डीजल जनरेटरों की कतारें। हजारों लोगों के लिए भोजन और अल्पाहार की व्यवस्थाएं। ऐसा माहौल बनाया जा रहा है मानो देश किसी आर्थिक संकट नहीं, बल्कि उत्सवों के स्वर्णकाल से गुजर रहा हो। सवाल धर्म का नहीं है। सवाल प्राथमिकताओं का है। आखिर कौन हैं जो राष्ट्रीय अपील के विपरीत ये सब कर रहा है। वह भी तब जब आपके सीएम ईवी वाहन में सफर करने लगे हैं। अन्य मंत्री और सतंरी कोई रिक्शा में आ गया है तो कोई सरकारी बसों में सफर करके संदेश दे रहा हैं। सरकारी आयोजन इसलिए रोक दिए गए हैं क्योंकि उनमें फिजूलखर्ची साफ साफ दिखाई दे रही है। ऐसे में धर्म के नाम पर हो रहे आयोजनों को भी आखिर क्यों नहीं रोका जाना चाहिए। इनको ऐसा कौनसा लाइसेंस मिल गया है जो आम आदमी से लेकर पीएम नरेंद्र मोदी की अपीलों से भी उपर हो गया है। प्रशासनिक मशीनरी इनसे डरती क्यों हैं, परमिशन आखिर क्यों दे रही हैं जबकि ये आयोजन ओनलाइन आसानी से हो सकते हैं। प्रवचनों, उपदेशों आदि की गंगा ओनलाइन भी बहाई जा सकती है। जब देश का प्रधानमंत्री खुद ईंधन बचाने की अपील कर रहे है। तब हजारों लीटर पेट्रोल डीजल फूंकने वाले व फिजूलखर्ची वाले धार्मिक आयोजनों को क्या कहा जाए? जब सरकार लोगों से गैरजरूरी खर्च रोकने को कह रही है, तब करोड़ों रुपए केवल मंच, सजावट और प्रचार पर खर्च करना क्या जिम्मेदार आचरण है? जब आम आदमी को बचत का पाठ पढ़ाया जा रहा है, तब समाज का प्रभावशाली वर्ग खुलेआम खर्च की प्रतिस्पर्धा क्यों कर रहा है? आज कई धार्मिक आयोजन श्रद्धा से ज्यादा शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बनते जा रहे हैं। किसका पंडाल बड़ा, किसकी भीड़ ज्यादा, किसकी सजावट महंगी, किसके पोस्टर पूरे शहर में— यह प्रवृत्ति चिंताजनक ही नहीं महा मूर्खता का भी भौंडा प्रदर्शन है। धर्म अब कई जगहों पर आस्था से ज्यादा “इमेज बिल्डिंग” का मंच बनता दिखाई देता है। यहां पर नेता भी आमंत्रित हैं जो भीगी बिल्ली की भांति अपनी उपस्थित दर्ज करवा कर पीएम की अपीलों को खुली चुनौती देते नजर आ रहे हैं। विडंबना यह है कि जिन आयोजनों में सादगी और समाजसेवा का संदेश होना चाहिए, वहीं सबसे ज्यादा संसाधनों की खपत हो रही है। बिजली बचाने की अपीलें कागजों में रह जाती हैं और दूसरी तरफ चमकती “भव्यता” के प्रतीक बने ये आयोजन हर तरफ से हमारी इकोनोमी व पब्लिक मेंटलिटी को नुकसान पहुंचा रहे हैं। प्रश्न प्रशासन से भी है कि यदि हालात इतने सामान्य हैं कि हजारों लोगों के आयोजन बिना रोक-टोक हो सकते हैं, तो फिर स्कूलों को ऑनलाइन करने और वर्क फ्रॉम होम की सलाह क्यों दी जा रही है। दफ्तारों में काम को क्यों ओनलाइन बांटने की बातें हो रही हैं। और यदि खतरा और आर्थिक दबाव वास्तविक है, तो फिर इन आयोजनों पर कोई नैतिक या प्रशासनिक नियंत्रण क्यों नहीं? यह समय आत्ममंथन का है। धर्म कभी अपव्यय नहीं सिखाता। भारतीय संस्कृति संकट के समय संयम, सादगी और समाजहित की बात करती है। हमारे यहां त्याग को श्रेष्ठ माना गया है, तामझाम को नहीं। आज जरूरत यह समझने की है कि देश केवल सरकार से नहीं चलता। समाज को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी पड़ती है। क्योंकि आर्थिक संकट आने पर उसका बोझ केवल नेताओं या आयोजकों पर नहीं, बल्कि हर आम नागरिक पर पड़ता है। देश यदि ईंधन की कमी के कठिन समय की ओर बढ़ रहा है, तो सबसे पहले दिखावटी खर्च पर रोक लगनी चाहिए। अन्यथा आने वाले दिनों में जनता से बचत की अपील करना और मंचों से करोड़ों की भव्यता दिखाना— दोनों साथ-साथ नहीं चल पाएंगे। लोगों को भी चाहिए कि ऐसे धार्मिक आयोजनों में शामिल होकर पापा के भागीदार ना बनें । ना ही ऐसी किसी धार्मिक दो पहिया चार पहिया रैलियों का हिस्सा बनकर अपनी आत्मा पर बोझ बढ़ाएं। क्योंकि आयोजक नहीं मानेंगे उनके संपर्क उंचे हैं व लक्ष्य भी बहुत छिपे हुए हैं। लेकिन साधारण व्यक्ति ऐसे आयोजना का बहिष्कार करके सबक तो सिखा ही सकता है। यही सच्चा राष्ट्रवाद है। अगर आपके आस पास या आपके शहर में भी ऐसे आयोजन हो रहे हैं तो सवाल उठाना ना भूलें फिर चाहे जो धर्म हो चाहे जो पंथ हो फर्क नहीं पड़ना चाहिए। देश सबसे उपर है। उससे उपर कोई नहीं। Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading… Related Discover more from 24 News Update Subscribe to get the latest posts sent to your email. 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