उदयपुर, 21 सितंबर। झीलों की नगरी की सियासत में सोमवार को एक लंबे राजनीतिक सफर का अगला अध्याय खुला। नगर निगम के मेयर चुनाव में भाजपा के पारस सिंघवी ने 55 वोट हासिल कर मेयर की कुर्सी अपने नाम कर ली। कांग्रेस की पूनम कुंवर राठौड़ को 25 वोट मिले। 80 सदस्यीय निगम में बहुमत का आंकड़ा 41 था, यानी सिंघवी ने बहुमत से 14 वोट अधिक हासिल किए।

पारस सिंघवी के लिए यह निगम की राजनीति में उस सफर का पड़ाव है, जिसमें वे पहले पार्षद, फिर उपमहापौर और अब महापौर की कुर्सी तक पहुंचे हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार 2026 में वार्ड 24 से वे पांचवीं बार पार्षद चुने गए और इससे पहले उपमहापौर की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं।

पांचवीं बार पार्षद, अब सीधे मेयर की कुर्सी
सिंघवी की मौजूदा जीत की एक खास बात यह है कि मेयर बनने से पहले ही उनका निगम की राजनीति में लंबा अनुभव रहा है। 2026 के चुनाव में भाजपा ने उन्हें वार्ड 24 से मैदान में उतारा। राज्य निर्वाचन आयोग के आंकड़ों पर आधारित उपलब्ध चुनावी विवरण के अनुसार सिंघवी ने वार्ड में 2,449 वोट लेकर 1,680 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की। इसके बाद मेयर पद के लिए भाजपा के भीतर नामों पर मंथन शुरू हुआ। शुरुआती दौर में दिनेश भट्ट और प्रमोद सामर के नाम प्रमुखता से चर्चा में रहे, जबकि पारस सिंघवी और पंकज बोराणा भी संभावित नामों में थे। आखिरकार 16 सितंबर को भाजपा ने सिंघवी के नाम पर मुहर लगा दी और उन्होंने नामांकन दाखिल किया। जिस नाम पर शुरुआती दौर में पार्टी के भीतर कई दावेदारों के बीच चर्चा थी, वही नाम आखिरकार अंतिम प्रत्याशी बना और अब परिणाम के बाद मेयर भी बन गया।

उदयपुर में भाजपा की तीन दशक पुरानी राजनीतिक पकड़

सिंघवी के मेयर बनने को उदयपुर नगर निगम की भाजपा राजनीति के लंबे इतिहास से अलग करके नहीं देखा जा सकता। उपलब्ध चुनावी रिकॉर्ड के अनुसार नगर परिषद से नगर निगम की व्यवस्था में आने के बाद उदयपुर में भाजपा का राजनीतिक दबदबा लगातार बना रहा है।
1994 में किरण माहेश्वरी, 1999 में युधिष्ठिर कुमावत, 2004 में रवींद्र श्रीमाली, 2009 में रजनी डांगी, 2014 में चंद्रसिंह कोठारी और 2019 में जी.एस. टांक भाजपा के मेयर रहे। इस क्रम के बाद अब 2026 में पारस सिंघवी के हाथ में निगम की कमान आई है।
इस लिहाज से सिंघवी का चुनाव भाजपा के लगातार सातवें बोर्ड के गठन के साथ जुड़ा है। 2026 के निकाय चुनाव में भाजपा ने 80 में से 53 वार्ड जीते और बहुमत के 41 के आंकड़े से 12 सीट अधिक हासिल कीं।

लेकिन मेयर चुनाव में 53 से बढ़कर 55 कैसे?
यहीं इस चुनाव का सबसे दिलचस्प राजनीतिक आंकड़ा सामने आता है। भाजपा के पास अपने 53 पार्षद थे। इसके बावजूद सिंघवी को 55 वोट मिले। चुनाव से पहले निर्दलीय पार्षदों के रुख को लेकर भी चर्चा थी। मतदान के बाद सामने आए आंकड़े बताते हैं कि सिंघवी को पार्टी के घोषित संख्याबल से दो वोट अधिक मिले।
दूसरी ओर कांग्रेस के 23 पार्षद और माकपा के एक पार्षद के समर्थन के बावजूद पूनम कुंवर राठौड़ के खाते में 25 वोट आए। ऐसे में चुनाव परिणाम ने पहले से चल रही क्रॉस वोटिंग की चर्चाओं को भी आंकड़ों के स्तर पर अलग संदर्भ दिया। यह भी ध्यान देने योग्य है कि मतदान से पहले भाजपा ने अपने पार्षदों की बाड़ेबंदी की थी। उन्हें बैलेट पेपर से मतदान की प्रक्रिया समझाई गई और मतदान के दिन बसों से निगम लाया गया। कांग्रेस की ओर से क्रॉस वोटिंग का दावा किया गया था, जबकि भाजपा ने इसे खारिज किया था।

सिंघवी की राजनीतिक यात्रा में एक और अहम मोड़
पारस सिंघवी का राजनीतिक सफर केवल मेयर प्रत्याशी घोषित होने के साथ शुरू नहीं हुआ। वे इससे पहले निगम में उपमहापौर रह चुके हैं। 2024 में उपमहापौर पद छोड़ने के दौरान उनका नाम उदयपुर की भाजपा की अंदरूनी राजनीति में भी चर्चा में रहा था। उस समय उन्होंने भाजपा विधायक ताराचंद जैन के साथ राजनीतिक मतभेदों को लेकर सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखी थी और विधानसभा चुनाव में टिकट नहीं मिलने की अपनी पीड़ा का भी जिक्र किया था। इस पृष्ठभूमि को देखते हुए 2026 में मेयर पद के लिए उनका नाम सामने आना उनके निगम राजनीतिक सफर में एक महत्वपूर्ण वापसी के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि उनके मेयर प्रत्याशी बनने से पहले भाजपा में अन्य दावेदारों के नाम भी प्रमुखता से चल रहे थे।

चुनाव से पहले भीतर की राजनीति, परिणाम में बाहर की एकजुटता
मेयर पद के प्रत्याशी के नाम को लेकर भाजपा के भीतर कई दिनों तक मंथन चला। स्थानीय रिपोर्टों में दावेदारी को लेकर अलग-अलग नेताओं के नाम और पार्टी के भीतर समीकरणों की चर्चा सामने आई थी। लेकिन नामांकन के बाद पार्टी संगठन ने सिंघवी के पीछे एकजुटता दिखाई। मतदान के दिन भाजपा के 53 पार्षदों के साथ निर्दलीय पार्षदों के समर्थन और अंततः 55 वोट का आंकड़ा यह बताता है कि मतदान के समय सिंघवी को पार्टी के घोषित संख्याबल से आगे का समर्थन मिला।

अब असली परीक्षा मेयर की कुर्सी पर
मेयर चुनाव जीतना सिंघवी के राजनीतिक सफर की बड़ी उपलब्धि है, लेकिन निगम की राजनीति में अगला सवाल अब ‘कौन जीता’ से आगे ‘क्या एजेंडा होगा’ का है।
उदयपुर जैसे पर्यटन और झीलों के शहर में नगर निगम के सामने शहरी बुनियादी ढांचे, सफाई, यातायात, पार्किंग, अतिक्रमण, झीलों से जुड़े शहरी मुद्दे और तेजी से बढ़ते शहर की नागरिक सुविधाओं जैसे कई विषय हैं। इसलिए 55 वोटों से मिली राजनीतिक ताकत अब अगले चरण में प्रशासनिक फैसलों और बोर्ड के कामकाज में दिखाई देगी।

और अब डिप्टी मेयर की बारी
मेयर का चुनाव पूरा होने के बाद निगम की अगली राजनीतिक बाजी डिप्टी मेयर पद की है। भाजपा के भीतर दिनेश भट्ट का नाम चर्चा में है, हालांकि पार्टी की ओर से औपचारिक घोषणा अभी बाकी है। ऐसे में उदयपुर निगम की तस्वीर फिलहाल साफ है—भाजपा का सातवां बोर्ड, पारस सिंघवी के हाथ में मेयर की कमान और अब डिप्टी मेयर के नाम पर निगाहें। सिंघवी के लिए यह सिर्फ नई कुर्सी नहीं, बल्कि निगम की राजनीति में लंबे समय से चली आ रही उनकी यात्रा का वह मुकाम है जहां डिप्टी मेयर से शुरू हुआ सफर अब मेयर की कुर्सी तक पहुंच चुका है।


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