उदयपुर। सत्ता का पूरा खेल आज पलट गया। 13 के बहुमत पर बागी भारी पड़ गए। कमल की नाराज पंखुड़ियों ने कमल को ही मुरझा दिया। एक नारी सब पर भारी पड़ गईं। भाजपा के साम, दाम, दंड भेद सब धाराशायी हो गए। नेताओं के इशारों पर नोटिस—नोटिस का खेल खेलने वाली पुलिस, यूडीए उदयपुर और स्थनीय पालिका के अफसर बुरी तरह से एक्सपोज हो गए। उन्हें संदेश मिल गया कि सत्ता की चाटुकारिता और चरणवंदना से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला है। यहां पर बात हो रही है फतहनगर—सनवाड़ नगर पालिका की । पिछली बार यहां पर भाजपा 14-11 का स्कोर था। इस बार बाजी पल गई। इस बार निर्दलीय ममता चपलोत बिना चुनाव लड़े ही कांग्रेस के समर्थन से चेयरमैन बन गई। कुर्सी ऐसी छीनी कि कुर्सी को मैनज करने वाले बौखला कर रह गए। चुनाव से पहले नोटिस, एफआईआर और मतदान के दिन हिरासत से गरमाया माहौल। सुबह होत ही गरमाया माहौल, जबर्दस्त नारेबाजीफतहनगर-सनवाड़ नगर पालिका का चेयरमैन चुनाव सोमवार को वोटिंग और परिणाम की औपचारिकता से परे आज आन बान और शान पर बन आने का चुनाव हो गया। रस्साकशी में एक तरफ निर्दलीय महिला प्रत्याशी जिनको कांग्रेस का समर्थन था, उनका खेमा था तो दूसरी तरफ दल—बल के साथ ही मसल पावर और पुलिस प्रशासन का रौब साथ लिए भाजपा का खेमा। निर्दलीय प्रत्याशी ममता चपलोत ने फिर भी बाजी मार ली। सुबह से लेकर नतीजे तक सत्ता, संगठन, बगावत और प्रशासनिक कार्रवाई के बीच ऐसी राजनीतिक पटकथा में पल पल में बदलाव आते रहे। अंततः भाजपा मौजूद चेयरमैन की कुर्सी नहीं बचा सकी। 25 सदस्यीय नगर पालिका में भाजपा के 13 और कांग्रेस के 12 पार्षद चुने गए थे। यानी वार्ड चुनाव के बाद भाजपा के पास बोर्ड बनाने के लिए जरूरी बहुमत मौजूद था, लेकिन चेयरमैन पद की गोपनीय वोटिंग में समीकरण पूरी तरह बदल गए। निर्दलीय प्रत्याशी ममता चपलोत को 14 वोट मिले, जबकि भाजपा प्रत्याशी को 11 वोट ही मिल सके। इस तरह ममता चपलोत ने तीन वोट के अंतर से चेयरमैन पद अपने नाम कर लिया और कांग्रेस के समर्थन से निर्दलीय बोर्ड बनने का रास्ता साफ हो गया। फतहनगर की इस कहानी को समझने के लिए पांच साल पीछे जाना जरूरी है। पिछले निकाय चुनाव में भाजपा ने यहां 14 वार्ड जीते थे, जबकि कांग्रेस के खाते में 11 सीटें आई थीं। यानी उस समय 14-11 का आंकड़ा भाजपा की सत्ता का आधार बना था। इस बार चुनाव में तस्वीर बदली और भाजपा 13 सीटों पर तथा कांग्रेस 12 सीटों पर पहुंची। अंतर महज एक सीट का रह गया था।राजनीतिक उलटफेर वार्ड चुनाव के बाद चेयरमैन की वोटिंग में हुआ। भाजपा के 13 पार्षदों के बावजूद पार्टी प्रत्याशी को केवल 11 वोट मिले, जबकि कांग्रेस के 12 पार्षदों के समर्थन से मैदान में उतरी निर्दलीय ममता चपलोत को 14 वोट मिल गए। भाजपा खेमे के दो वोट ममता के पक्ष में गए जिसमें से एक उनके पति राजेश चपलोत का था। इन दो वोटों ने भाजपा को सत्ता से दूर कर दियां चेयरमैन की जनरल की सीट ओबीसी को देने पर हुआ विवादराजनीतिक उलटफेर के केंद्र में भाजपा के पूर्व चेयरमैन और पार्षद राजेश चपलोत रहे। उन्होंने पत्नी ममता चपलोत को निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर मैदान में उतारा। इसके साथ ही चुनाव भाजपा बनाम कांग्रेस की सीधी लड़ाई न रहकर भाजपा के भीतर की राजनीतिक बगावत का मुकाबला बन गया। कांग्रेस विधायक पुष्कर लाल डांगी ने ममता चपलोत के समर्थन का खुला ऐलान किया और चुनाव से पहले दावा किया कि उनके साथ 14 पार्षद हैं। कांग्रेस के 12 पार्षदों के साथ भाजपा खेमे से टूटकर आए दो पार्षदों ने अंततः इस दावे को मतदान के आंकड़ों में बदल दिया। वोटिंग शुरू होते ही आ धमकी पुलिस, सुबह से रहा तनावपूर्ण माहौललेकिन इस राजनीतिक लड़ाई की असली गर्मी आज वोटिंग के दिन ही दिखाई दी। सुबह से फतहनगर में पालिका परिसर के बाहर माहौल तनावपूर्ण था। मतदान की प्रक्रिया शुरू होने के दौरान पुलिस ने भाजपा के पूर्व चेयरमैन और बागी पार्षद राजेश चपलोत तथा पार्षद बाबूलाल चोपड़ा को हिरासत में ले लिया। बाबूलाल चोपड़ा को बाद में मुक्त कर दिया गया, जबकि राजेश चपलोत के खिलाफ कार्रवाई मतदान के दौरान जारी रही। घटनाक्रम के दौरान व बाद में मावली विधायक पुष्कर लाल डांगी, कांग्रेस ब्लॉक अध्यक्ष महेंद्र सिंह और कांग्रेस समर्थक पार्षदों ने भारी विरोध शुरू कर दिया। पालिका के बाहर करीब 1 घंटे तक नारेबाजी हुई और पुलिस प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठाए गए। कांग्रेस समर्थकों का आरोप था कि चुनावी माहौल के बीच प्रशासनिक तंत्र का इस्तेमाल राजनीतिक दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है। यूडीए के अफसर हो गए एक्सपोज, किसके कहने पर हुई कार्रवाईराजेश चपलोत के खिलाफ कार्रवाई को लेकर राजनीतिक विवाद मतदान के दिन अचानक नहीं उठा था। पिछले कुछ दिनों से ही चपलोत परिवार लगातार प्रशासनिक और पुलिस कार्रवाई के घेरे में था। ममता चपलोत के निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतरने के बाद उदयपुर में राजेश चपलोत के मकान को लेकर UDA की ओर से नोटिस जारी किया गया। फतहनगर स्थित उनकी होटल को लेकर भी निर्माण संबंधी नोटिस की कार्रवाई सामने आई। चपलोत परिवार ने कार्रवाइयों को राजनीतिक दबाव से जोड़ते हुए आपत्ति जताई थी। मकान से जुड़े मामले में बाद में न्यायिक राहत मिल गई जिसके बाद यह विवाद और गहरा गया कि चुनावी संघर्ष के बीच प्रशासनिक कार्रवाई का सिलसिला क्यों जारी रहा। जमीन के कब्जे का आरोप, पालिका के अफसरों पर लगे गंभीर आरोपइसी बीच चेयरमैन चुनाव से ठीक पहले राजेश चपलोत के खिलाफ जमीन पर कब्जे का मामला दर्ज होने की जानकारी सामने आई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि जमीन को लेकर न्यायिक आदेश के बावजूद सड़क बना दी गई, प्लॉट काटे जा रहे हैं और आने-जाने का रास्ता बंद किया गया। पुलिस ने शिकायत के आधार पर मामला दर्ज कर जांच शुरू की। आरोपों का अंतिम निर्धारण जांच और न्यायिक प्रक्रिया से होना है, लेकिन राजनीतिक रूप से नेताओं के इशारे पर टाइमिंग ने सवाल जरूर खड़े किए। क्योंकि मामला उसी समय सामने आया जब चपलोत की पत्नी नगर पालिका चेयरमैन पद के लिए निर्दलीय प्रत्याशी थीं और कांग्रेस ने खुले तौर पर उनके समर्थन का ऐलान कर रखा था। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या अफसर केवल एक खास मामले में कार्रवाई करके पक्षपात कर रहे हैं, यदि हां तो आने वाले समय में उन पर भी कई गंभीर सवाल उठाए जाने की चर्चा अभी से होने लगी है। भाजपाइयों को सबक, साथ रहे तो सब ठीक, हाथ छिटका तो पुलिस—प्रशासन का डंडा तैयार राजनीतिक तौर पर देखें तो फतहनगर का यह परिणाम कांग्रेस की सीटों की जीत से ज्यादा भाजपा के भीतर की बगावत की कहानी है। कांग्रेस 12 सीटों के साथ चुनाव में भाजपा से पीछे थी। उसके पास अपने दम पर चेयरमैन बनाने के लिए जरूरी 13 का आंकड़ा भी नहीं था। लेकिन उसने भाजपा के बागी खेमे के साथ राजनीतिक समीकरण बनाया। राजेश चपलोत की पत्नी ममता चपलोत को निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में समर्थन दिया और मतदान के बाद यही गठजोड़ सत्ता में बदल गया। घटनाक्रम की सबसे बड़ी राजनीतिक तस्वीर यही रही कि जिस राजेश चपलोत को मतदान के दौरान पुलिस हिरासत में लिया गया, उनकी पत्नी ममता चपलोत कुछ ही देर बाद 14 वोट लेकर नगर पालिका की चेयरमैन बन गईं। पालिका के बाहर पुलिस कार्रवाई के खिलाफ नारे लग रहे थे और अंदर पार्षद अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर रहे थे। यह बहुत ही चिंताजनकर तस्वीर है लोकतंत्र की। अब भाजपा में ही अंदरखाने और फतहनगर की जनता और स्थानीय राजनीतिक हलकों में चुनाव को सिर्फ चेयरमैन के चयन के रूप में नहीं देखा जा रहा। चुनाव से पहले प्रशासनिक कार्रवाइयों, UDA के नोटिस, जमीन विवाद की एफआईआर और मतदान के दिन हुई पुलिस कार्रवाई ने सत्ता और प्रशासनिक तंत्र के इस्तेमाल के गठजोड़ का पर्दाफाश कर दिया। बड़ा राजनीतिक सवाल खड़ा कर दिया कि क्या आने वाले समय में सत्ता के दबाव की राजनीति किस हद तक गिरेगी??? कई चेहरे हो गए एक्सपोजइस चुनाव ने कई चेहरों को भी एक्सपोज कर दिया। नोटिस—नोटिस का खेल खेलने के बीच पब्लिक में यह संदेश चला किया गया जो खेल खेल रहे हैं वो दूध के धुले हुए नहीं हैं। उनके अतिक्रमणों की लंबी फेहरिस्त है, कारनामें की बहुत लंबी लिस्ट। नौकरशाही भी कटघरे में आ गई व अब मुंह छिपाने जैसी नौबत आ रही है पालिका और यूडीए की। नेताओं के दबाव में काम करने वाले आखिर यह क्यों भूल गए कि वे तनख्वाह तो जनता के पैसों से ही पाते हैं। अगर नेताओं से पाते हैं तो यह चिंता का विषय है, यह चर्चा आज विरोध प्रदर्शन के दौरान खुलकर हुई। खुलकर कई नाम भी लिए गए व भ्रष्टाचार व मिलीभगत के आरोप लगाए गए। Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading… Related Discover more from 24 News Update Subscribe to get the latest posts sent to your email. 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