24 News Update उदयपुर, 8 अगस्त। आमजन को मकानों के पट्टे उपलब्ध कराने और सरकारी कार्यालयों के चक्कर से मुक्ति दिलाने के उद्देश्य से राजस्थान सरकार ने शहरी सेवा शिविर अभियान शुरू किया है। नगर निगम उदयपुर में भी एक ही छत के नीचे पट्टा सहित विभिन्न सेवाओं का लाभ देने का दावा किया जा रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि पट्टे की उम्मीद लेकर पहुंच रहे आवेदक दस्तावेजों, आपत्तियों और अतिरिक्त प्रमाणों के ऐसे मकड़जाल में फंस रहे हैं कि आवेदन करने के बाद भी पट्टा मिलना आसान नहीं हो रहा।नगर निगम में पट्टे मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में जारी किए जाने हैं। इनमें कच्ची बस्ती से संबंधित पट्टों पर फिलहाल स्थगन है, जबकि स्टेट ग्रांट एक्ट और धारा 69-ए के तहत आवेदन लिए जा रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब अभियान का घोषित उद्देश्य आमजन को राहत देना है तो इन दोनों श्रेणियों में आवेदन लेने के बाद पट्टे जारी करने की प्रक्रिया इतनी जटिल क्यों होती जा रही है? स्टेट ग्रांट एक्ट में 30 साल पुरानी वोटर लिस्ट सबसे बड़ी बाधास्टेट ग्रांट एक्ट के तहत उन संपत्तियों के मामलों में पट्टा देने का प्रावधान है, जहां पुराने दस्तावेज नष्ट हो चुके हों, उत्तराधिकार से जुड़े दस्तावेजों की पूरी श्रृंखला उपलब्ध नहीं हो या लंबे समय से कब्जा होने का प्रमाण देना हो। ऐसी स्थिति में सामान्य तौर पर आवेदक अथवा उसके पूर्वज का 1990 से पहले की मतदाता सूची में नाम होना महत्वपूर्ण प्रमाण माना जा रहा है। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के मामलों में 1996 से पहले की मतदाता सूची का प्रमाण मांगे जाने की बात सामने आ रही है।इसके साथ पुराने राशन कार्ड तथा 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र के दो पड़ोसियों के शपथ पत्र भी मांगे जा रहे हैं, जिनके माध्यम से यह प्रमाणित कराया जाना है कि आवेदक, उसके पिता या दादा लंबे समय से संबंधित मकान पर काबिज रहे हैं। कागज पर यह व्यवस्था भले ही पुराने कब्जे को प्रमाणित करने का माध्यम दिखाई दे, लेकिन व्यवहार में यही सबसे बड़ी बाधा बन रही है। तीन दशक से अधिक पुरानी मतदाता सूचियां आज हर परिवार के पास सुरक्षित नहीं हैं। निर्वाचन विभाग में पुराने रिकॉर्ड कागजी अवस्था में, बिखरे हुए अथवा कई जगह खराब हालत में होने की स्थिति में आम नागरिक के लिए अपने या पूर्वज के नाम की तलाश करना बेहद कठिन हो जाता है। पुराने वार्ड, परिसीमन और पते भी समय के साथ बदल चुके हैं। ऐसे में केवल नाम तलाशना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि उस समय के वार्ड और पते का वर्तमान रिकॉर्ड से मिलान भी चुनौती बन जाता है। परिणाम यह है कि जिस सरकारी रिकॉर्ड को प्रमाण के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है, उसे हासिल करने के लिए नागरिक को ही सरकारी तंत्र में भटकना पड़ रहा है। 60 साल के दो पड़ोसी तलाशना भी परीक्षास्टेट ग्रांट एक्ट की प्रक्रिया में पुराने कब्जे की पुष्टि के लिए दो पड़ोसियों के शपथ पत्र की मांग भी सामने आ रही है, जिनकी उम्र 60 वर्ष या उससे अधिक हो। यह शर्त उन पुराने शहरी इलाकों में विशेष रूप से मुश्किल बन जाती है, जहां पिछले तीन-चार दशकों में आबादी और पड़ोस का स्वरूप बदल चुका है। कई परिवारों के पुराने पड़ोसी अब वहां रहते ही नहीं। जो बुजुर्ग पुराने कब्जे को जानते भी हैं, उनके लिए कानूनी शपथ पत्र देना सहज नहीं होता। ऐसे में एक सरकारी सुविधा योजना में नागरिक को पहले वोटर लिस्ट तलाशनी पड़ती है और फिर अपने पुराने कब्जे की गवाही देने वाले बुजुर्ग पड़ोसी तलाशने पड़ते हैं। 69-ए में रजिस्टर्ड दस्तावेज के बाद भी दरबारकालीन प्रमाण की मांगदूसरी ओर, धारा 69-ए के तहत उन संपत्तियों के आवेदकों को भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है, जिनके पास 1992 से पहले के पंजीकृत दस्तावेज या तत्कालीन नगर परिषद द्वारा स्वीकृत भवन नक्शे और अनुमति पत्र मौजूद हैं।ऐसे आवेदनों में मेवाड़ रियासत अथवा दरबारकालीन पट्टे या दस्तावेज तथा उनके हिंदी अनुवाद की मांग किए जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं। यहां मूल समस्या दस्तावेज से ज्यादा उसकी उपलब्धता की है। दरबार या रियासत काल के दस्तावेज बहुत सीमित लोगों के पास हैं। जिनके पास हैं, उनमें से कई दस्तावेज अत्यंत पुरानी और खराब स्थिति में हैं तथा मेवाड़ी भाषा में लिखे हुए हैं। अब सवाल यह है कि आम नागरिक ऐसे दस्तावेज कहां से तलाशे? और यदि दस्तावेज मिल भी जाए तो उसका प्रमाणिक हिंदी अनुवाद कौन करेगा? क्या नगर निगम के स्तर पर इसके लिए कोई विशेषज्ञ व्यवस्था उपलब्ध है? यदि नहीं, तो नागरिक से ऐसी शर्त पूरी करने की अपेक्षा क्यों की जा रही है? पुराने मकान कई बार बिके, अब अंतिम खरीदार कहां से लाए पुराना प्रमाण?समस्या उन संपत्तियों में और जटिल हो जाती है जो पिछले कई दशकों में एक से अधिक बार बिक चुकी हैं। वर्तमान मालिक के पास उसकी रजिस्ट्री, विक्रेता से प्राप्त दस्तावेज और अन्य वैध रिकॉर्ड हो सकते हैं, लेकिन पुराने मूल कब्जेदार की 1990 की वोटर लिस्ट या उस समय के दो बुजुर्ग पड़ोसियों के शपथ पत्र उसके लिए उपलब्ध कराना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। ऐसे मामलों में वर्तमान मालिक से उस समय के कब्जे का प्रमाण मांगना, जबकि संपत्ति का स्वामित्व बीच में कई बार हस्तांतरित हो चुका हो, पट्टा प्रक्रिया को अनावश्यक रूप से जटिल बना देता है। निगम के अपने नक्शे और भवन अनुमति भी पर्याप्त नहीं?सबसे गंभीर सवाल उन मामलों में खड़ा होता है जहां संपत्ति से संबंधित नगर परिषद अथवा वर्तमान नगर निगम द्वारा जारी भवन अनुमति, स्वीकृत नक्शे और अन्य सरकारी रिकॉर्ड पहले से मौजूद हैं। आम नागरिक के लिए नगर निगम से भवन नक्शा स्वीकृत करवाना स्वयं एक लंबी प्रशासनिक प्रक्रिया है। जब किसी सरकारी संस्था ने किसी भवन का नक्शा स्वीकृत किया, अनुमति जारी की और उसका रिकॉर्ड अपने पास रखा है, तो बाद में उसी संपत्ति के पट्टे के लिए अतिरिक्त रूप से कई दशक पुराने प्रमाण मांगने पर स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है कि विभाग अपने ही रिकॉर्ड का आपसी सत्यापन क्यों नहीं कर सकता? सरकार के अलग-अलग विभागों के पास मौजूद दस्तावेजों को आपस में मिलाकर सत्यापित करने की जिम्मेदारी भी यदि नागरिक पर ही डाल दी जाए तो ‘एक छत के नीचे सुविधा’ का दावा व्यवहार में कमजोर पड़ जाता है। ऑनलाइन आवेदन के बाद सेल्फ-अटेस्टेड दस्तावेज, फिर हार्ड कॉपी भीपट्टा आवेदन की प्रक्रिया में एक और सवाल ऑनलाइन दस्तावेजों को लेकर उठ रहा है। आवेदकों से ऑनलाइन अपलोड किए जाने वाले दस्तावेजों की सेल्फ-अटेस्टेड स्कैन कॉपी मांगे जाने की बात सामने आ रही है। इसके साथ ही कई मामलों में उन्हीं दस्तावेजों की हार्ड कॉपी भी प्रस्तुत करनी पड़ रही है। पंजीकृत दस्तावेज स्वयं सरकारी पंजीयन प्रक्रिया से प्रमाणित होते हैं। ऐसे दस्तावेज की स्कैन कॉपी पर आवेदक के स्वयं सत्यापन का उद्देश्य क्या है, यह स्पष्ट किया जाना आवश्यक है। यदि ऑनलाइन अपलोड की गई प्रति के बाद भी हार्ड कॉपी अनिवार्य है तो ऑनलाइन व्यवस्था का वास्तविक लाभ क्या रह जाता है? इसी तरह निगम द्वारा निर्धारित प्रारूप में शपथ पत्र, अतिरिक्त दस्तावेज और बार-बार आपत्तियों की पूर्ति की प्रक्रिया नागरिक को डिजिटल आवेदन से वापस उसी पारंपरिक कार्यालयी व्यवस्था में धकेल देती है, जिससे राहत दिलाने के लिए शिविर लगाए गए हैं। आवेदन लेने से राहत नहीं, पट्टा जारी होने से साबित होगी सफलताशहरी सेवा शिविर की सफलता का पैमाना यह नहीं हो सकता कि कितने आवेदन ऑनलाइन लिए गए या कितने लोगों ने शिविर में पहुंचकर दस्तावेज जमा किए। वास्तविक सफलता यह होगी कि कितने पात्र परिवारों को समयबद्ध तरीके से पट्टे जारी हुए और कितने लोगों को अनावश्यक कार्यालयी चक्कर से मुक्ति मिली। यदि आवेदन लेने के बाद नागरिक को निर्वाचन विभाग से 30 साल पुरानी वोटर लिस्ट तलाशनी पड़े, बुजुर्ग पड़ोसी खोजने पड़ें, दरबारकालीन दस्तावेज और उनका अनुवाद करवाना पड़े, ऑनलाइन दस्तावेज की हार्ड कॉपी लेकर फिर कार्यालय जाना पड़े और हर चरण पर नई आपत्ति का सामना करना पड़े, तो यह सुविधा शिविर कम और दस्तावेज जुटाने का अभियान अधिक प्रतीत होता है। समाधान कठिन नहीं, व्यवस्था को नागरिक केंद्रित करना होगाइस पूरी प्रक्रिया का समाधान भी संभव है। सबसे पहले पुरानी मतदाता सूचियों को डिजिटल कर नाम, पुराने वार्ड और पते के आधार पर खोज की सुविधा उपलब्ध करानी होगी। इसके साथ पुराने राजस्व रिकॉर्ड, भवन अनुमति, स्वीकृत नक्शे, रजिस्ट्री, संपत्ति कर, बिजली-पानी के पुराने रिकॉर्ड और अन्य सरकारी दस्तावेजों को वैकल्पिक प्रमाण के रूप में स्वीकार करने की स्पष्ट नीति होनी चाहिए। यदि किसी सरकारी विभाग के पास दस्तावेज उपलब्ध है तो नागरिक से उसकी प्रति लाने के बजाय विभागों के बीच रिकॉर्ड का सत्यापन कराया जाना चाहिए। जहां पुराना मूल दस्तावेज उपलब्ध नहीं है, वहां प्रमाण के वैकल्पिक स्रोतों की स्पष्ट सूची होनी चाहिए। आपत्तियां भी मौखिक या अस्पष्ट नहीं, बल्कि नियम की संबंधित धारा और आवश्यक दस्तावेज का स्पष्ट उल्लेख करते हुए लिखित रूप में दी जानी चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि 69-ए और स्टेट ग्रांट एक्ट की प्रत्येक श्रेणी के लिए एक समान, सार्वजनिक और स्पष्ट दस्तावेज चेकलिस्ट जारी हो, ताकि आवेदक को हर बार नई शर्त का सामना न करना पड़े। जनता को पट्टा देना सरकार की राहत योजना है, दस्तावेज जुटाने की परीक्षा नहीं। यदि सरकारी तंत्र के पास रिकॉर्ड मौजूद हैं तो उनका सत्यापन सरकार करे, नागरिक नहीं। शहरी सेवा शिविर तभी सार्थक होंगे जब ‘एक छत के नीचे सुविधा’ का दावा आवेदन लेने तक नहीं, बल्कि पात्र नागरिक के हाथ में पट्टा पहुंचने तक दिखाई दे। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है—जब पट्टा देना है तो रास्ता इतना कठिन क्यों बनाया जा रहा है? 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