रिपोर्ट—जयवतं भैरविया 24 News Udpate उदयपुर। उदयपुर विकास प्राधिकरण याने के यूडीए के अफसर और कर्मचारी भी अजब—गजब है। आम जनता के अलावा किन किन के हितों का किस—किस तरह से खयाल रखते हैं यह जग जाहिर है। आम आदमी कोई सवाल पूछता है तो इनकी सामान्य बुद्धि भी काम करना बंद कर देती है और अगर यही सवाल नेता, अफसर या जमीन माफिया पूछते हैं तो ये सुपर कंप्यूटर और ए—आई को भी मात दे देते हैं। जो जानकारी इनको है वो किसी को नहीं। शहर के जमीन माफियाओ की विकास यात्रा और शहर की विनाश यात्रा के ये अफसर और कर्मचारी साक्षी ही नहीं, उसके हमजोली भी रहे हैं। इन्हीं की बदौलत तो पहाड़ ना जाने कब मैदानों में तब्दील हो गए और वहां पर फिर से रिसोर्ट और होटल वाले पहाड़ बन गए पता ही नहीं चला। इनकी किरपा बस बरसती रहनी चाहिए और बदले में कहां—कौनसे कृत्रिम मालामाल कर देने वाली बारिश होनी चाहिए यह तो आप समझ ही गए होंगे।ये जमीन माफियाओं के लिए विकीपीडिया या कहें कि विकी—पीढ़ियां हैं। बरसों बरस पीढ़ी दर पीढ़ी सेवाएं देना और बदले में मेवा पाने का दस्तूर इनका बहुत ही खास और जाना पहचाना है। जो लोग यह खबर पढ़ रहे हैं उनमें से कइयों का आजमाया हुआ भी होगा। ये जमीन माफियाओं को अर्ली बर्ड भी बनाते हैं। याने कि चिड़िया के खेत चुगने से पहले ही पहाड़ की चुगली कर देते हैं। फलां पहाड़ पर फिल्डिंग जमा लो, परमिशन आती ही होगी वाला सीन होता ही रहता है।अब आते है मूल बात पर कि आज यूडीए वालों की इतनी रेल—पेलाई क्यों हो रही है। तो बात ये है कि UDA की ओर से आये दिन किसी न किसी होटल या रिसोर्ट को बिना परमिशन या नो कंस्ट्रक्शन जोन में बना होना बताकर सीज करना अब दस्तूर हो चला है। लोग इसे ढकोसला भी कहने लगे हैंं। सेटिंग से बिल्डिंगें खड़ी हो जाती हैं और उसका इकबाल भी बरसों बरस तक बुलंद रहता है। फिर अचानक कोई पॉलिटिकल लोचा पड़ जाता है या फिर कहीं कोई जन प्रतिनिधि हड़का कर सीज करने को कह देता है तब नियमों की किताब खोल कर बनाने वाले का भट्टा बिठा दिया जातता है। खबरें और वीडियो जारी करके वाहवाही लूटी जाती है कि देखो, हम कितने शूरवीर हैं कि अतिक्रमण ध्वस्त कर रहे है। जनता बिचारी पीछे से पूछती है कि हुजूर ये तो बताइये कि आपकी टेरीटरी में ये बन कैसे गई?? इसका जवाब किसी भी राहु—केतू के पास नहीं होता है। आप गलत मत समझियेगा कि ये राहु कौन है व आजकल कहां—कहां शहर का बंटाढार कर रहा है। समझ गए हों तो एकदम सही समझे हैं कि ये वही राहु है जो आजकल सरकारी क्षितिज में लल्लन टॉप तरीके से चमक रहा है, जमीन माफियाओं की आंखों का तारा है, भ्रष्ट नेताओं का राज दुलारा है। बहरहाल, होटल या रिसॉर्ट रातों रात तो बन नहीं जाती। इसके लिए धनबल—भुजबल भी तो लगता है। कोई चमत्कार हुआ और धरती फाड़कर निकल आने टाइप बात तो होती नहीं है। होटल बनाने का कोई बीज बाजार में तो मिलता नहीं कि जमीन में डाला कर गप्प से होटल उग आती है और यूडीए के अफसर रातों रात चौंक जाते हैं—अरे ससुरा ये क्या गजब हो गया।डेटा ही नहीं यूडीए के पासUDA वालों के पास कोई तो डेटा होता होगा जिसके आधार पर तय किया जाता होगा कि किसका वैध है किसकाअवैध। होटल या रिसोर्ट बना तो है मगर उसका क्या ज्योग्राफिया और कागजों में बताया हुआ हुलिया है। परमिशन है या नहीं नियमानुसार। आखिर कैसे तय किया जाता है यूडीए में कि वैध अवैध है या नहीं। मगर यहां पर हो गजब रहा है। जब हमने यही सब जानने के लिये RTI लगाई और UDA की ओर से द्वारा 1 जनवरी 2024 से लेकर 1 दिसम्बर 2025 के बीच के कालखंड का गजब का जवाब दिया। UDA की ओर से जारी रिसॉर्ट परमिशन की सूची और बड़ी स्थित होटल मैरियट और बड़ी में ही शिल्पग्राम के पास मौजूद होटल शोर्यगढ़ जो कि अब व्यंधम ग्रांड होटल के नाम से चल रहे हैं। उनके स्वीकृत मानचित्र की सूचना मांगी। तो जवाब चौंकाने वाला आया। UDA के ATP सर्वेश्वर व्यास ने प्रथम अपील के बाद जवाब दिया कि उन्होंने रिसोर्ट परमिशन की सूची बहुआयामी और बहु उद्देश्य वाली सूचना है, हम बता ही नहीं सकते। मना कर दिया औरहोटल मैरियट और होटल शोर्यगढ़ के नामों से पत्रावली होने से ही इनकार कर दिया।किसने दी परमिशन, दी भी या नहीं???हैरानी की बात तो ये है कि उदयपुर से बाहर रहने वाले को भी पता होगा कि उदयपुर में होटल शोर्यगढ़ या फिर होटल मैरियट कहाँ पर हैं। पर जनाब सर्वेश्वर व्यास को ही पता नही है कि ये होटल कहाँ पर है। क्या इन होटेलों को परमिशन नहीं दी गई या फिर मौके पर जाकर किसी अधिकारी ने देखा ही नहीं कि ये होटल / रिसोर्ट नियम से बन रही है या नही?, कोई पहाड़ी काटी जा रही है या नही?, क्योंकि मौके पर जाने वाले को होटल का नाम पता न हो ऐसा सम्भव नहीं।चलिए कुछ देर के लिये मान लेते है कि परमिशन लेते समय होटल या रिसॉर्ट का नाम कुछ और रखा गया होगा लेकिन ये तो सामान्य सी बात है कि जो परमिशन दी जा रही है या जिस स्थान पर परमिशन दी जा रही है वो जगह भी अधिकारियों को पता न हो ?अब आ जाते है रिसोर्ट और होटल की सूची पर, अब जब पता ही नही है किस को परमिशन दी औऱ किसको नही तो मौके पर कार्यवाही करने जाने वाले अधिकारियों को क्या दिन में अपने दफतर में खर्राटे के दौरान सपना आता है कि इसके पास परमिशन है और इसके पास नही, कैसे चेक करते है कि स्वीकृति क्या है और बना क्या है ? या फिर शहर में चारो और बन रही होटल और रिसोर्ट मनमर्जी से बन रही है और मर्जी से ही अरावली की पहाड़ियों को शहीद किया जा रहा है जब UDA अधिकारी किसी होटल या रिसोर्ट पर कार्यवाही करने जाते है तो कार्यवाही का कुछ तो आधार होगा ? दबी जुबान में कही बात कहीं सच तो नहींकई लोग तो दबी जुबान में ये भी कहते है कि कई अवैध होटलों और रिसोर्ट में UDA के कुछ अधिकारी भी पार्टनर है इसलिए उनकी जानकारी छिपाई जाती है। इस तरह की सूचनाओ के सम्बंध में राज्य सूचना आयोग के ये दो निर्णय महत्वपूर्ण है (1) यह कि “सूचना ऐसे रूप में दी जाए जिस रूप में चाही जाती है।” (श्रीमती अन्नपूर्णा मिश्रा बनाम रजिस्ट्रार / वाइस चांसलर जय नारायण विश्वविद्यालय अपील नं. 179/06. निर्णय दिनांक-28.12.2006. राजस्थान सूचना आयोग, (2) माननीय केन्द्रीय सूचना आयोग ने “श्री एस.पी. गोयल बनाम डायरेक्टर ऑफ इनकम टैक्स एण्ड सीपीआईओ लुधियाना अपील नम्बर सीआईसी / एटी/ए/2007/00344. निर्णय दिनांक 13.06.2007 के मामले में निर्धारित किया है कि है कि फाइल दिखाने के लिये उसका नाम / नम्बर अपीलार्थी से पूछना सही नहीं है। विषय बताने पर फाईल का पता लगाने का कार्य लोक सूचना अधिकारी का है। सर्वेश्वर व्यास जी को शायद इन निर्णयो की जानकारी हो या न हो लेकिन कम से कम प्रशासनिक सुधार विभाग के आदेशों की जानकारी तो होगी कि उन्हें हस्ताक्षर के साथ अपना नाम भी लिखना है या फिर वे आवेदक को सूचना देने की जगह जो मजाक करते है इसलिए वे जवाब में अपना नाम नही लिखते, क्योंकि आवेदक यदि समझदार निकला तो आगे जाकर विधिक कार्यवाही भी कर सकता है। Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading... 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