24 न्यूज अपडेट, नई दिल्ली। अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 को लेकर लोकसभा में शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई। सांसद डॉ. मन्ना लाल रावत के अतारांकित प्रश्न के लिखित उत्तर में विधि और न्याय मंत्रालय में स्वतंत्र प्रभार राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने इस कानून की प्रमुख धाराओं, संशोधनों और कानूनी दायरे को विस्तार से स्पष्ट किया। उन्होंने बताया कि अधिनियम के अध्याय 2 में विभिन्न अपराधों और उनके लिए निर्धारित दंड का उल्लेख है, जिनमें अधिकांश अपराध ऐसे हैं जिनमें तीन वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है और इसलिए वे गैर-जमानती की श्रेणी में आते हैं। वहीं जिन अपराधों की सजा तीन वर्ष से कम अथवा केवल जुर्माना है, उन्हें जमानती माना जाता है। मंत्री ने यह भी बताया कि वर्ष 2014 के बाद इस अधिनियम में दो महत्वपूर्ण संशोधन किए गए, पहला 2015 में और दूसरा 2018 में। 2015 के संशोधन अधिनियम के तहत अत्याचारों की परिभाषा को विस्तारित किया गया, विशेष न्यायालयों की स्थापना, विशेष लोक अभियोजकों की नियुक्ति और पीड़ितों तथा गवाहों के अधिकारों को लेकर नया अध्याय जोड़ा गया। इसके अतिरिक्त, मामलों की त्वरित सुनवाई की व्यवस्था भी की गई। वर्ष 2018 के संशोधन में कानून को और प्रभावी बनाने की दिशा में कड़े प्रावधान किए गए, जैसे प्राथमिकी दर्ज करने से पूर्व किसी प्राथमिक जांच की आवश्यकता नहीं होगी और गिरफ्तारी के लिए पूर्व अनुमति की बाध्यता नहीं रहेगी। इसके साथ ही, जमानत की अग्रिम याचिका (धारा 438) को इस अधिनियम के अंतर्गत अपराधों के मामलों में लागू नहीं किया गया। एक अन्य महत्वपूर्ण सवाल के जवाब में, डॉ. रावत ने पूछा कि यदि कोई अनुसूचित जाति का व्यक्ति धर्म परिवर्तन कर ईसाई या मुस्लिम बन जाता है और फिर किसी अनुसूचित जाति के सदस्य पर अत्याचार करता है, तो क्या उस पर एससी-एसटी कानून लागू होगा? इसके उत्तर में मंत्री मेघवाल ने कहा कि संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के अनुसार केवल वे व्यक्ति जो हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म को मानते हैं, अनुसूचित जाति के सदस्य माने जाते हैं। अतः कोई भी धर्मांतरित व्यक्ति (ईसाई या मुस्लिम) अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाएगा और यदि वह किसी अनुसूचित जाति के व्यक्ति पर अत्याचार करता है, तो अधिनियम की धारा 3 के तहत उस पर गैर-एससी/एसटी व्यक्ति के रूप में मुकदमा चलाया जा सकता है। हालाँकि, अनुसूचित जनजातियों के संदर्भ में स्थिति थोड़ी अलग है। संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950 में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि धर्मांतरण के बाद कोई व्यक्ति अपनी अनुसूचित जनजाति की स्थिति खो देता है। अनुसूचित जनजातियों की मान्यता क्षेत्र और जनजाति-विशिष्ट होती है, न कि धर्म पर आधारित। इस कारण से, यदि कोई अनुसूचित जनजाति का व्यक्ति धर्म परिवर्तन करता है, तो वह संभवतः अपनी जनजातीय पहचान बनाए रख सकता है, जिससे एक कानूनी विसंगति उत्पन्न होती है। अनुसूचित जाति के लिए धर्म आधारित मान्यता है जबकि अनुसूचित जनजातियों के मामले में ऐसा कोई स्पष्ट प्रतिबंध नहीं है।इस पूरे उत्तर से यह स्पष्ट होता है कि अनुसूचित जातियों और जनजातियों पर अत्याचार रोकने के लिए अधिनियम में कठोर प्रावधान हैं, विशेष रूप से गैर-जमानती अपराधों, बिना प्राथमिक जांच गिरफ्तारी और त्वरित सुनवाई की व्यवस्था। साथ ही, धर्मांतरण के बाद की स्थिति को लेकर जहां अनुसूचित जातियों के मामले में स्पष्टता है, वहीं अनुसूचित जनजातियों के संदर्भ में अभी भी संवैधानिक और कानूनी स्पष्टता की आवश्यकता है। सरकार ने फिलहाल इस विसंगति को दूर करने को लेकर कोई ठोस समाधान नहीं बताया है, लेकिन यह मामला निश्चित ही भविष्य में सामाजिक-राजनीतिक विमर्श का विषय बन सकता है। Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading... Related Discover more from 24 News Update Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Post navigation लाडो प्रोत्साहन योजना के तहत बालिका का केक काटकर मनाया जन्मोत्सव गंगापुर में महिलाओं से गहने लूटने वाले दो बदमाश दबोचे, छह वारदातों का खुलासा