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यूडी टैक्स की मनमानी वसूली का आया मौसम, 4 जगह ”पिक एंड चूज”कार्रवाई, पारदर्शिता के उठे सवाल

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24 News Update उदयपुर। नया साल शुरू होते ही नगर निगम ने एक बार फिर यूडी टैक्स (नगरीय विकास कर) वसूली का डंडा उठा लिया है। ऐसे में लोग सावधान हो जाएं। यह डंडा किसी को भी आर्थिक चोट पहुंचा सकता है। मार्च क्लोजिंग से पहले राजस्व लक्ष्य पूरा करने की हड़बड़ी में नगर निगम ने सोमवार को 4 चार व्यावसायिक संपत्तियों को सीज कर यह जताने की कोशिश की कि अब बकाया कर को लेकर कोई रियायत नहीं मिलेगी। लेकिन इस सख्ती के साथ नगर निगम की कार्यप्रणाली, मंशा और चयन प्रक्रिया पर गंभीर सवाल भी खड़े हो गए हैं, जिन्हें नजरअंदाज करना आसान नहीं है।
नगर निगम आयुक्त अभिषेक खन्ना के निर्देश हुई कार्रवाई में चरक मार्ग, अंबामाता स्कीम स्थित टखमन-28 आर्ट सेंटर को सीज किया गया, जिस पर ₹24,44,282 का यूडी टैक्स बकाया बताया गया है। इसी तरह नीमचखेड़ा ट्रेजर टाउन स्थित एलटीवी-007 पर ₹57,08,866 रुपये बकाया होने के चलते ताले लगाए गए। राड़ाजी चौराहा, अंबामाता स्थित वैदेही फूड प्लाजा पर ₹4,31,999 रुपये और बीएन कॉलेज के सामने, सेवाश्रम क्षेत्र में स्थित चंद्रा मोटर्स पर ₹3,44,099 रुपये का बकाया बताते हुए निगम ने इन संपत्तियों की व्यावसायिक गतिविधियां बंद कर दीं। इन चारों मामलों में कुल मिलाकर लगभग 89 लाख रुपये से अधिक का यूडी टैक्स बकाया बताया जा रहा है।

किस आधार पर किया इन्हीं 4 प्रतिष्ठानों का चयन
निगम का तर्क है कि संबंधित फर्मों को पूर्व में नोटिस जारी किए जा चुके थे और संतोषजनक जवाब या भुगतान नहीं मिलने के कारण राजस्थान नगरपालिका अधिनियम-2009 के प्रावधानों के तहत यह कार्रवाई की गई। कागजों में यह प्रक्रिया भले ही सही दिखे, लेकिन यहीं से असली बहस शुरू होती है। सवाल यह नहीं है कि ताले लगाए गए या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि कार्रवाई के लिए सिर्फ इन्हीं चार प्रतिष्ठानों का चयन क्यों किया गया। शहर में ऐसे अनेक बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठान और संस्थान हैं, जिन पर वर्षों से यूडी टैक्स के रूप में लाखों का बकाया हैं, लेकिन उन पर न ताले लगते हैं और न ही सार्वजनिक रूप से कोई कार्रवाई नजर आती है। ऐसे में यह शंका स्वाभाविक है कि कहीं निगम कुछ चुनिंदा नामों पर कार्रवाई कर “सख्ती का माहौल” बनाने की कोशिश तो नहीं कर रहा, ताकि बाकी बड़े डिफाल्टर परदे के पीछे सुरक्षित बने रहने जैसी कोई बात हो।

दबाव बनाने का हथियार तो नहीं
इस संदेह को और बल तब मिलता है जब कार्रवाई के दौरान यह सामने आता है कि कुछ प्रतिष्ठानों ने मौके पर ही अपना यूडी टैक्स जमा करवा दिया और उन्हें सीजिंग से राहत मिल गई। इससे यह संदेश जाता है कि ताले स्थायी समाधान नहीं, बल्कि एक दबाव बनाने का हथियार हैं। यदि नियम सबके लिए समान हैं, तो फिर हर डिफाल्टर के लिए एक जैसी, स्वचालित और पारदर्शी कार्रवाई क्यों नहीं होती। पूरे साल जमा नहीं करवाया इसके लिए कोई सजा नहीं मिली। ऐसे तो हर व्यक्ति यही सोचेगा कि निगम का दस्ता आएगा, तब हाथों हाथ जमा करवा देंगे। तब तक छूट का व मार्च एंडिंग की ओफर का मजा लेंगें।

वेबसाइट पर क्यों नहीं डालते सूची, क्या पोल खुलने का है डर
सबसे बड़ा सवाल अब भी पारदर्शिता का ही है। यदि नगर निगम वास्तव में निष्पक्ष है, तो उसे अपनी वेबसाइट पर यूडी टैक्स डिफाल्टरों की पूरी, अपडेटेड और सार्वजनिक सूची जारी करने से परहेज क्यों है। उस सूची में यह साफ-साफ दर्ज होना चाहिए कि किस प्रतिष्ठान पर कितना बकाया है, कितने समय से बकाया है, कितनी बार नोटिस दिए गए और किस क्रम में कार्रवाई होनी है। ऐसा करने से खुद-ब-खुद यह स्पष्ट हो जाएगा कि किसका नंबर पहले बनता है और किसका बाद में। ऐसे में झंंझट ही खत्म हो जाएगी कि किस पर कार्रवाई कब करनी है। और बेवजह ठेका कंपिनयों को भी मोटा कमिशन देने से बच जाएंगे जो वास्तव में जनता का ही टेक्स का पैसा है। टाइम लाइन और अपर लिमिट तय होने के बाद यह काम निगम के कर्मचारियों से भी करवाया जा सकता है।

अपर कैप लगाने में क्या दिक्कत है???
जानकारों का मानना है कि निगम को यूडी टैक्स बकाया को लेकर एक स्पष्ट अपर कैप तय करनी चाहिए। तय सीमा पार होते ही बिना किसी विवेकाधिकार, बिना किसी सिफारिश और बिना किसी देरी के सीजिंग की कार्रवाई स्वतः शुरू होनी चाहिए। इससे न केवल अधिकारियों पर लगने वाले पक्षपात के आरोप खत्म होंगे, बल्कि व्यवस्था भी भरोसेमंद बनेगी। जब तक पूरी वसूली प्रक्रिया पारदर्शी, डिजिटल और सार्वजनिक नहीं होगी, तब तक हर साल जनवरी-फरवरी में शुरू होने वाली यह मुहिम लोगों को एक रस्मी और टारगेट-आधारित कार्रवाई ही लगती रहेगी। यदि नगर निगम सच में शहर के विकास के लिए कर वसूली करना चाहता है, तो उसे यह साफ बताना होगा कि किसका नंबर पहले है और किसका बाद में। अन्यथा यूडी टैक्स वसूली की यह सख्ती जनता की नजर में सख्ती कम और “पिक एंड चूज” की नीति ज्यादा कहलाती रहेगी।

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