24 News Update उदयपुर, 04 मई। राजस्थान विद्यापीठ के संघटक माणिक्यलाल वर्मा श्रमजीवी महाविद्यालय के इतिहास एवं संस्कृति विभाग की ओर से प्रख्यात इतिहासविद् प्रो. के. एस. गुप्ता की स्मृति में संत परम्परा एवं पर्यावरण विषय पर तृतीय विस्तार व्याख्यान का आयोजन महाविद्यालय सभागार में किया गया। व्याख्यान में भारतीय संत परम्परा के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण, मानवीय संवेदना और सांस्कृतिक मूल्यों के संबंधों पर गंभीर चर्चा हुई। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि राजस्थान विद्यापीठ के कुलपति प्रो. एस. एस. सारंगदेवोत थे, जबकि मुख्य वक्ता मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के इतिहास विभागाध्यक्ष प्रो. दिग्विजय भटनागर रहे। अध्यक्षता अधिष्ठाता प्रो. मलय पानेरी ने की। प्रारंभ में विभागाध्यक्ष प्रो. हेमेंद्र चौधरी ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा में पर्यावरण संरक्षण का विचार अत्यंत प्राचीन और वैज्ञानिक रहा है। वैदिक साहित्य, उपनिषद, पुराण और स्मृतियों में प्रकृति को जीवन का आधार मानते हुए उसके संरक्षण का स्पष्ट संदेश दिया गया है। उन्होंने कहा कि भारतीय संतों ने इन मूल्यों को लोकभाषा और लोकचेतना से जोड़कर जनमानस तक पहुंचाया। मुख्य अतिथि कुलपति प्रो. एस. एस. सारंगदेवोत ने कहा कि भारतीय संत परम्परा का मूल आधार केवल भक्ति नहीं, बल्कि लोकमंगल, प्रकृति संरक्षण और सामाजिक संतुलन रहा है। उन्होंने कहा कि भारत की सांस्कृतिक संरचना में संतों की भूमिका केवल धार्मिक नेतृत्व तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने समाज को जीवन-मूल्यों, सहअस्तित्व और प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व का बोध कराया। प्रो. सारंगदेवोत ने कहा कि वैदिक वाङ्मय में ‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः’ जैसे मंत्र पृथ्वी को माता और मानव को उसका पुत्र मानते हैं, जो भारतीय पर्यावरण चिंतन का मूल सूत्र है। अथर्ववेद, ऋग्वेद और उपनिषदों में जल, वायु, अग्नि, वनस्पति और पृथ्वी के संरक्षण को धार्मिक और नैतिक कर्तव्य माना गया है। भारतीय संतों ने इन्हीं सिद्धांतों को लोकभाषा में सरल बनाकर समाज तक पहुंचाया। उन्होंने कहा कि मध्यकालीन संतों, कबीर, गुरु नानक, रैदास, मीरा और तुलसीदास ने अपने काव्य और वाणी में प्रकृति को जीवन, भक्ति और नैतिकता का अभिन्न तत्व माना। कबीर ने वृक्ष, जल और माटी के माध्यम से जीवन की सादगी और संतुलन का संदेश दिया, गुरु नानक ने पवन गुरु, पानी पिता, माता धरत महत कहकर प्रकृति को आध्यात्मिक गरिमा प्रदान की, वहीं मीरा और तुलसी ने प्रकृति को संवेदना और भक्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया। प्रो. सारंगदेवोत ने कहा कि संत परम्परा ने प्रकृति को उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि सहअस्तित्व का आधार माना। संतों की वाणी ने मनुष्य को संयम, करुणा, सहजीवन और संरक्षण का संदेश दिया। आज जब विश्व जलवायु परिवर्तन, जल संकट और पर्यावरण असंतुलन जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है, तब भारतीय संत परम्परा का यह दृष्टिकोण वैश्विक स्तर पर भी प्रासंगिक बन जाता है। मुख्य वक्ता प्रो. दिग्विजय भटनागर ने कहा कि भारतीय संत परम्परा ने समाज को केवल आध्यात्मिक चेतना ही नहीं दी, बल्कि प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने का व्यावहारिक दर्शन भी दिया। संतों ने प्रकृति को ईश्वर का साक्षात रूप मानते हुए जल, वन, भूमि और जीव-जगत के संरक्षण को मानवीय धर्म से जोड़ा। अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. मलय पानेरी ने कहा कि आधुनिक तकनीकी युग में पर्यावरणीय संकट का समाधान केवल विज्ञान से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना और नैतिक अनुशासन से भी संभव है। संत साहित्य इस दिशा में आज भी प्रेरक स्रोत है। कार्यक्रम का संचालन डॉ. ममता पुर्बिया एवं डॉ. बिंदिया पंवार ने किया, जबकि आभार डॉ. धमेन्द्र राजौरा ने व्यक्त किया। इस अवसर पर प्रो. मीना गौड़, प्रो. नीलम कौशिक, प्रो. जीवन खरकवाल, राजेन्द्र नाथ पुरोहित, प्रो. पारस जैन, जयकिशन चौबे, इन्द्र सिंह राणावत, दीपक बोर्दिया, गिरीश शर्मा सहित शहर के साहित्यकार, इतिहासकार, शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित थे। Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading… Related Discover more from 24 News Update Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Post navigation 13 लाख की ठगी का मामला दर्ज, गुजरात की फर्म के दो डायरेक्टर नामजद विदेश में नौकरी दिलाने के नाम पर 5.50 लाख की ठगी, दंपती के खिलाफ मामला दर्ज