24 News Update उदयपुर। तीन दिवसीय क्षेत्रीय कृषि मेले के दूसरे दिन का दृश्य केवल स्टॉल, भाषण और तालियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह दिन खेती के भविष्य पर एक सामूहिक आत्ममंथन बन गया। मंच पर मंत्री थे, सामने किसान, और बीच में खड़ी थी—जलवायु की अनिश्चितता, मिट्टी की थकान और बाजार की बेरुखी।
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री श्री भागीरथ चौधरी ने सीधे शब्दों में स्वीकार किया कि आज किसान की चिंता बीज बोने से पहले ही शुरू हो जाती है और कटाई के बाद सुरक्षित भंडारण तक पीछा नहीं छोड़ती। उन्नत बीज, आधुनिक तकनीक और विपणन की बातें उन्होंने कही, पर साथ ही यह भी रेखांकित किया कि रासायनिक कीटनाशकों की अंधी दौड़ खेती को लाभ नहीं, बल्कि दीर्घकालीन नुकसान पहुँचा रही है। जैविक और प्राकृतिक खेती को उन्होंने पर्यावरण संतुलन की नहीं, बल्कि किसान की मजबूरी बताया। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि, मृदा स्वास्थ्य कार्ड, प्राकृतिक खेती और फसल बीमा योजनाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने वैज्ञानिक सलाह के अनुसार खेती करने की अपील की—एक तरह से यह स्वीकारोक्ति भी थी कि नीति और खेत के बीच अभी भी संवाद अधूरा है।
खेती को आत्मनिर्भर भारत की धुरी बताते हुए आईसीएआर–केन्द्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान, अविकानगर के निदेशक डॉ. अरुण कुमार तोमर ने परंपरागत ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के गठजोड़ पर जोर दिया। उनका कहना था कि केवल पैदावार नहीं, आय बढ़ाने की सोच ही किसान को मजबूत बनाएगी—चाहे वह कृषि हो या पशुपालन।
मेले का व्यावहारिक पक्ष तब सामने आया जब कुलगुरु डॉ. प्रताप सिंह ने मुख्य अतिथि को विश्वविद्यालय द्वारा विकसित उन्नत किस्मों—प्रताप संकर मक्का-6, प्रताप ज्वार-2510, चेतक अफीम, प्रताप असालिया-1, प्रताप इसबगोल-1, प्रताप अश्वगंधा-1 और प्रताप मूंगफली-4—की जानकारी दी। खासतौर पर मेवाड़ की मक्का आधारित अर्थव्यवस्था को ध्यान में रखते हुए “प्रताप संकर मक्का-6” के पैतृक बीज उत्पादन कार्यक्रम और भविष्य में इसे राजस्थान राज्य बीज निगम के माध्यम से किसानों तक पहुँचाने की योजना, खेत और नीति के बीच सेतु बनने की कोशिश लगी। राजनीति और प्रशासन की मौजूदगी भी दर्ज हुई। श्री फूल सिंह मीणा, विधायक उदयपुर ग्रामीण, श्री बी.आर. चौधरी, पूर्व विधायक, डॉ. एस.के. शर्मा, सहायक महानिदेशक (आईसीएआर), श्री कृष्ण मुरारी भारती (अखिल भारतीय किसान संघ), डॉ. निरंजन सिंह राठौड़, डॉ. सुधीर वर्मा सहित कई गणमान्य अतिथि मंच और प्रांगण में मौजूद रहे—मानो यह संदेश देने कि खेती अब केवल किसान का विषय नहीं रही। कार्यक्रम की रूपरेखा मुख्य आयोजन सचिव डॉ. आर.एल. सोनी ने रखी, धन्यवाद डॉ. योगेश कनोजिया ने दिया, जबकि संचालन की जिम्मेदारी डॉ. विशाखा बंसल और श्रीमती जय माला दवे ने निभाई। तकनीकी पुस्तिका “सफल कृषि उद्यमी” (लेखक डॉ. आर.एल. सोलंकी) का विमोचन इस बात का संकेत था कि खेती अब केवल उत्पादन नहीं, उद्यम भी है। हलधर टाइम्स के संपादक श्री पीयूष शर्मा को कृषि नवाचारों को किसानों तक पहुँचाने के लिए सम्मानित किया गया, वहीं महाराष्ट्र की सफल उद्यमी श्रीमती शोभा को जैविक हल्दी पाउडर के लिए सम्मान मिला—एक संदेश कि मूल्यवर्धन ही अगला रास्ता है।
मेले में हुए व्याख्यानों ने खेती को बहुआयामी दृष्टि दी—डॉ. मंजीत सिंह ने मृदा व जल संरक्षण, डॉ. विक्रमादित्य दवे ने स्मार्ट खेती में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डॉ. सी.एम. यादव ने बकरी पालन, डॉ. सिद्धार्थ मिश्रा ने पिछवाड़े मुर्गीपालन, डॉ. एच.एल. बुगालिया ने पशु टीकाकरण, डॉ. एन.एल. पंवार ने नवीकरणीय ऊर्जा और डॉ. एच.पी. मेघवाल ने मधुमक्खी पालन को अतिरिक्त आय का साधन बताया।
ड्रोन तकनीक, सौर ऊर्जा, हाईटेक बागवानी, उन्नत फसल किस्मों और महिला कृषकों के उत्पादों ने यह साफ कर दिया कि खेती अब केवल हल और बैल की कहानी नहीं रही। सांस्कृतिक प्रस्तुतियों में लोकगीत और नृत्य के जरिए किसानों ने प्रकृति और परिश्रम का रिश्ता याद दिलाया—जो शायद नीति पत्रों में अक्सर छूट जाता है।
कृषक–वैज्ञानिक संवाद में डॉ. एम. रमेश बाबू, डॉ. वीरेन्द्र सिंह, डॉ. एन.एल. मीणा, डॉ. एच.के. शर्मा, डॉ. सी.एम. यादव, डॉ. योगेश कनोजिया और डॉ. हेमन्त स्वामी ने किसानों के सवालों के सीधे, व्यावहारिक जवाब दिए। वहीं फसल, फल, फूल और सब्जी प्रदर्शन प्रतियोगिता में 84 किसानों का सम्मान इस बात का प्रतीक बना कि खेत की मेहनत अब भी पहचानी जा सकती है—यदि देखने की दृष्टि हो।

