– जो पाना है उसे खोने में लगे हैं, जो खोना है उसे पाने में लगे हैं : मुनि अरहसागर महाराज
– अशोक नगर में चातुर्मासिक धर्मसभा में उमड़ रहा है सकल दिगम्बर जैन समाज
– मुनिश्री का पाद प्रक्षालन व शास्त्र भेंट सहित हुए विविध धार्मिक अनुष्ठान



24 News Updaet उदयपुर, 26 अगस्त।
श्री दिगंबर जैन धर्म प्रभावना समिति एवं वर्षायोग समिति के तत्वावधान में श्री पाŸवनाथ दिगंबर जैन मंदिर, उदासीन आश्रम, अशोक नगर में मुनि अरहसागर महाराज एवं मुनि सुहित सागर महाराज के सान्निध्य में चातुर्मास के तहत विभिन्न धार्मिक आयोजन श्रद्धा एवं भक्ति के साथ जारी हैं। चातुर्मासिक धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने धर्मलाभ लिया।
चातुर्मास समिति अध्यक्ष महेंद्र टाया ने बताया कि रोड नंबर 10 मंदिर, मनवाखेड़ा सहित विभिन्न क्षेत्रों से भक्त मंदिर पहुंचे और मुनिश्री को श्रीफल अर्पित कर आशीर्वाद प्राप्त किया। 28 अगस्त को मुनि संघ के सान्निध्य में अभिषेक एवं शांतिधारा के बाद श्रेयांसनाथ भगवान का मोक्ष कल्याणक महामहोत्सव मनाया जाएगा। इस अवसर पर विष्णुकुमार मुनिराज, अकंपाचार्य सहित 700 मुनियों की पूजा-अर्चना कर 700 अघ्र्य चढ़ाए जाएंगे। इसके बाद रक्षाबंधन पर्व के उपलक्ष्य में मुनिश्री के विशेष प्रवचन होंगे।
पंडित भुवनेश शास्त्री ने बताया कि कार्यक्रम का शुभारंभ अभिषेक एवं शांतिधारा से हुआ। इसके बाद आचार्य श्री के चित्र का अनावरण एवं दीप प्रज्ज्वलन किया गया। श्रद्धालुओं ने मुनिश्री का पाद-प्रक्षालन कर श्रीफल एवं शास्त्र भेंट किए। आहारचर्या भी सानंद संपन्न हुई। चातुर्मास के दौरान नित्य नियम पूजन, जलाभिषेक सहित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान नियमित रूप से आयोजित किए जा रहे हैं।
धर्म प्रभावना समिति अध्यक्ष कुंथु कुमार जैन एवं मीडिया प्रभारी रमेश वैद ने बताया कि धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि अरहसागर महाराज ने कहा कि “जो पाना है, उसे खोने में लगे हैं और जो खोना है, उसे पाने में लगे हैं।” उन्होंने कहा कि धर्म केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि आत्मपरिवर्तन की साधना है। कर्म भाग्य नहीं, बल्कि हमारे भावों और पुरुषार्थ का परिणाम है। जैन दर्शन के अनुसार जीव अपने कर्मों का स्वयं कर्ता और फल का भोक्ता है। मुनिश्री ने कहा कि मन में जैसे भाव उत्पन्न होते हैं, उसी के अनुरूप कर्मों का बंध होता है। पूजा, अभिषेक, जिनवाणी श्रवण और मंदिर जाना धर्म के साधन हैं, लेकिन इनका वास्तविक फल तभी मिलता है, जब जीवन में क्रोध कम हो, मान झुके, माया छूटे और लोभ कम हो। सच्चा धर्म वही है जो मनुष्य को भीतर से बदल दे। सुख-दु:ख के लिए संसार को दोष देने के बजाय व्यक्ति को अपने भावों का निरीक्षण करना चाहिए। क्रोध आए तो क्षमा, मान आए तो विनय, माया आए तो सरलता और लोभ आए तो त्याग को अपनाना चाहिए। यही आत्मशुद्धि और कर्मों से मुक्ति का मार्ग है। इसके लिए सम्यक्दर्शन, सम्यक्ज्ञान और सम्यक्चारित्र को जीवन में अपनाना आवश्यक है।
शाम 6.30 बजे गुरु भक्ति का आयोजन हुआ। इसके बाद छहढाला जी का प्रवचन एवं आरती संपन्न हुई। कार्यक्रम में धर्म प्रभावना समिति अध्यक्ष कुंथु कुमार गणपतोत, चातुर्मास समिति अध्यक्ष महेंद्र टाया, प्रकाश अखावत, राजेंद्र अखावत, रमेश वैद, शशिकांत शाह, कैलाश गंगवाल, नरेंद्र टाया, जगदीश जैन, मनोज कमावत, पारस शाह, हेमंत बोहरा, मनीष गोदावत, अशोक डवारा, दिनेश सोनी, अर्चना पटवारी, सर्वेश जैन, प्रभा टाया, इंदिरा डवारा, कल्पना गागांवत, निर्मला वेद, मंजू शाह, सरोज बोहरा, संगीता डवारा सहित बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।


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