24 News update सागवाड़ा, 27 अगस्त (जयदीप जोशी)। नगर के आसपुर मार्ग लोहारिया तालाब के सामने स्थित कान्हड़दासधाम रामद्वारा में चातुर्मास में शाहपुरा धाम रामस्नेही संत कीर्तिराम महाराज ने सत्संग में बताया कि प्रभु की कथा बड़े ही दुर्लभता से मिलती है। कथा को एकाग्रता के साथ श्रवण करना चाहिए।संत ने कहा मानव के अंदर एक ही मन है, जिसे अच्छे कार्यों और भक्ति में लगाएं। सत्संग में वही व्यक्ति पहुंच पाता है, जिसके भीतर सच्ची भक्ति होती है। भगवान ने जीवन में सुख के साथ दुख भी दिया है, ताकि मनुष्य अभिमान न करे। जो व्यक्ति भक्ति करता है, उसका मन शांत रहता है। कल और काल में ज्यादा अंतर नहीं है। संत ने कहा मन और बुद्धि के बारे में बताया कि ज्ञानीजन अपने मन और बुद्धि को संयमित करते हैं, उन्हें किसी लौकिक विषय में नहीं, अपितु उस सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, महान् चेतन तत्त्व में प्रतिष्ठित करते हैं। जो देश, काल, वस्तु और समस्त उपाधियों से अतीत, अनंत, अखंड और सर्वव्यापक है। जो स्वयं प्रकाशस्वरूप चैतन्य है, जो सबको जानता है; किंतु जिसे कोई अन्य ज्ञाता प्रकाशित नहीं कर सकता।मन और बुद्धि स्वभावतः बहिर्मुख हैं। मन विषयों की ओर भागता है, बुद्धि नाम-रूप के भेदों में उलझती है। परिणामस्वरूप जीव संसार के अनंत विक्षेपों में भटकता रहता है। किंतु जब साधक विवेक और वैराग्य से संपन्न होकर गुरु-उपदेश तथा श्रुति-वाक्यों के प्रभाव से अंतर्मुख होता है, तब वही मन और बुद्धि आत्मसाक्षात्कार के साधन बन जाते हैं। अशुद्ध, चंचल और विषयासक्त अंतःकरण ब्रह्मविद्या का अधिकारी नहीं हो सकता। अतः साधना का प्रथम चरण है-चित्तशुद्धि, अंतःकरण-नैर्मल्य और एकाग्रता।संत ने कहा कि समस्त कर्मों, गतियों, रहस्यों एवं सृष्टि-विन्यास को जानने वाला परमेश्वर है। संपूर्ण जगत उसी ब्रह्म की मायाशक्ति का अभिव्यक्त रूप है। समस्त क्रियाएं, यज्ञ, ज्ञान, प्रेरणाएं और चेतन-गतियां उसी परम चेतना में अधिष्ठित हैं। जीव स्वयं को कर्ता मानता है, परंतु वास्तविक सत्ता केवल आत्मा की है; कर्तृत्व, भोक्तृत्व और जगत की समस्त विविधता अविद्याजन्य उपाधियों का अध्यास है। यह उस परम चेतना का प्रतीक है, जो संपूर्ण जगत को प्रेरित करती है। जैसे सूर्य संपूर्ण विश्व को प्रकाश देता है, किंतु किसी कर्म में लिप्त नहीं होता, वैसे ही आत्मा समस्त अनुभवों का साक्षी होकर भी अकर्ता और अभोक्ता रहती है। उपनिषद का यह मंत्रमय संकेत साधक को बाह्य सूर्य से अंतःस्थित चैतन्य-सूर्य की ओर ले जाता है। आत्मा स्वयंप्रकाश है; मन और बुद्धि उसी आत्मा के प्रकाश से प्रकाशित होते हैं। जब साधक मन को संयमित कर बुद्धि को शुद्ध करता है, तब अंततः उसे ज्ञात होता है कि जिस ब्रह्म को वह बाहर खोज रहा था, वही उसके अंतःकरण में साक्षी रूप से सदा विद्यमान है। Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading… Related Discover more from 24 News Update Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Post navigation विद्या निकेतन विद्यालय में रक्षाबंधन उत्सव की धूम, भाई-बहन के स्नेह और संस्कारों का दिया संदेश महिला महाविद्यालय की छात्राओं ने पुलिसकर्मियों को बांधा रक्षा सूत्र