रूण्डेडा। मेवाड़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और वीर परंपराओं के प्रतीक गांव रुण्डेड़ा में रविवार को सदियों पुरानी रंग तेरस का उत्सव पूरे जोश और आस्था के साथ मनाया गया। Vallabhnagar उपखंड क्षेत्र के इस ऐतिहासिक गांव में पिछले 459 वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आज भी उसी उत्साह और भव्यता के साथ जीवंत दिखाई देती है।
इस अनूठे लोक उत्सव को देखने के लिए आसपास के गांवों सहित दूर-दराज क्षेत्रों से हजारों लोग रुण्डेड़ा पहुंचे। दिनभर गांव की गलियां ढोल-मादल की थाप, उड़ते गुलाल और जयकारों से गूंजती रहीं। पूरा गांव रंग, रोशनी और उल्लास में डूबा नजर आया।
दूर-दराज से पहुंचे लोग, विदेशों से भी लौटे युवा
रंग तेरस के अवसर पर मेनार, ईंटाली, रोहिड़ा, नवानिया, गवारड़ी, खरसान, बाठरड़ा खुर्द, विजयपुरा, भटेवर, खेरोदा, बांसड़ा और बामनिया सहित कई गांवों के लोग बड़ी संख्या में यहां पहुंचे। इसके अलावा Udaipur, Rajsamand और Chittorgarh जिलों के साथ मध्यप्रदेश के Malwa क्षेत्र से भी श्रद्धालु और दर्शक उत्सव में शामिल हुए।
विशेष बात यह रही कि विदेशों में रोजगार कर रहे गांव के युवा भी इस पर्व में शामिल होने के लिए विशेष रूप से अपने गांव लौटे। दुबई, मस्कट, अफ्रीका, अमेरिका और ब्रिटेन में कार्यरत युवाओं की मौजूदगी ने इस आयोजन को और भी भावनात्मक बना दिया।
महात्मा जत्तीजी की धूणी से हुई शुरुआत
रंग तेरस महोत्सव की शुरुआत रविवार दोपहर करीब 12:30 बजे गांव की उत्तर दिशा में स्थित महात्मा जत्तीजी की धूणी से हुई। गांव के पंच ढोल-थाली और मादल के साथ धूणी पर पहुंचे, जहां विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर महात्मा जत्तीजी का स्मरण किया गया।
इसके बाद ग्रामीण ढोल-नगाड़ों की गूंज के साथ जुलूस के रूप में आगे बढ़े और रास्ते में सीनियर सेकेंडरी स्कूल के पास स्थित डेमण्ड बावजी को आमंत्रित किया। वहां से आशीर्वाद लेने के बाद रंग-गुलाल उड़ाते और जयकारे लगाते हुए श्रद्धालु बड़े (ठाकुरजी) मंदिर पहुंचे।
गैर नृत्य के साथ निकला पारंपरिक जुलूस
मंदिर परिसर में पारंपरिक भांग लेने की रस्म के बाद ग्रामीणों ने जत्तीजी की अमानत माला, चिमटा और घोड़ी के साथ पारंपरिक गैर नृत्य किया। इसके बाद जुलूस तलहटी मंदिर, निमड़िया बावजी, जुना मंदिर, लक्ष्मीनारायण मंदिर, महादेव मंदिर और जणवा समाज के मंदिर से होता हुआ पुनः बड़े मंदिर पहुंचा, जहां दोपहर का कार्यक्रम संपन्न हुआ।
पारंपरिक मेहमाननवाजी की मिसाल
रंग तेरस के मौके पर गांव में मेहमाननवाजी की पुरानी परंपरा भी निभाई गई। गांव के हर घर में आए मेहमानों के स्वागत के लिए मक्के की पपड़ी, मीठी भुजिया, पकौड़े और अन्य पारंपरिक व्यंजन तैयार किए गए। ग्रामीणों ने पूरे अपनत्व के साथ अतिथियों का स्वागत किया।
रात में गैर-घूमर से गूंजा गांव
रात होते ही उत्सव का रंग और गहरा हो गया। पुरुष पारंपरिक धोती-कुर्ता और मेवाड़ी लाल पगड़ी पहनकर कार्यक्रम में शामिल हुए, जबकि महिलाएं लाल चुनरी ओढ़े पारंपरिक वेशभूषा में सजी नजर आईं।
ब्राह्मण समाज के लोग श्री लक्ष्मीनारायण मंदिर, जणवा समाज के लोग जणवा मंदिर और जाट समाज के ग्रामीण जाटों की बावड़ी पर एकत्रित हुए। रात करीब 9 बजे ढोल-मादल की थाप पर गैर नृत्य शुरू हुआ, जिसमें पुरुषों ने वृत्ताकार पंक्तियों में पारंपरिक गैर प्रस्तुत की, वहीं महिलाओं ने सिर पर कलश रखकर मनमोहक घूमर नृत्य किया।
इस दौरान युवाओं की आतिशबाजी से आसमान रंगीन रोशनी से जगमगा उठा और पूरा गांव मानो दिवाली की तरह चमक उठा।
तलवारबाजी और नेजा परंपरा बनी आकर्षण
गैर नृत्य के बाद युवाओं ने तलवारबाजी और आग के गोलों के करतब दिखाए, जिसे देखकर दर्शक रोमांचित हो उठे। वहीं पारंपरिक नेजा परंपरा भी आयोजन का विशेष आकर्षण रही।
इस रस्म में महिलाएं आक की हरी टहनियां लेकर कतार में खड़ी होती हैं और पुरुष उनके बीच से गुजरते हैं। लोक मान्यता है कि इस परंपरा से गुजरने वाले पुरुष पूरे वर्ष रोगमुक्त रहते हैं।
मेवाड़ की जीवंत सांस्कृतिक पहचान
करीब चार सदियों से अधिक समय से चली आ रही रुण्डेड़ा की रंग तेरस आज भी मेवाड़ की लोक संस्कृति, सामाजिक एकता और पारंपरिक आस्था का जीवंत प्रतीक बनी हुई है। बदलते समय के बावजूद इस परंपरा की चमक बरकरार है और हर साल यह उत्सव मेवाड़ की सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम बन रहा है।

