उदयपुर। आधी रात का सन्नाटा अचानक धमाकों से टूटता है। ढोल-नगाड़ों की थाप के बीच लाल पगड़ियां बांधे युवक तलवारें लहराते हुए चौक की ओर बढ़ते हैं। देखते ही देखते तोपें गरजने लगती हैं, बंदूकों की तड़तड़ाहट आसमान चीर देती है और बारूद की गंध से पूरा गांव भर उठता है। यह किसी युद्ध का दृश्य नहीं, बल्कि मेवाड़ की शौर्य परंपरा का जश्न है, जो हर साल होली के बाद मेनार गांव में दोहराया जाता है।
Menar village में बुधवार रात आयोजित इस ऐतिहासिक आयोजन में मेनारिया ब्राह्मण समाज ने फिर से ‘बारूद की होली’ खेलकर 451 साल पहले मुगल चौकी पर मिली जीत को याद किया।
युद्ध की स्मृति को उत्सव में बदला
लोक परंपरा के अनुसार मेवाड़ में Maharana Amar Singh I के समय आसपास के क्षेत्रों में मुगल सेनाओं की कई चौकियां थीं। मेनार गांव के पूर्वी छोर पर भी ऐसी ही एक मुगल छावनी स्थापित थी, जिससे स्थानीय लोग परेशान थे।
बताया जाता है कि जब वल्लभनगर क्षेत्र में मुगल चौकी पर विजय का समाचार मेनार पहुंचा तो गांव के लोगों ने ओंकारेश्वर चबूतरे पर सभा की और उसी जोश में मुगल चौकी पर धावा बोल दिया। संघर्ष के बाद चौकी ध्वस्त कर दी गई। उसी जीत की याद में यह परंपरा पीढ़ियों से निभाई जा रही है।
जब गांव बन गया रणभूमि
रात करीब दस बजे से गांव का माहौल बदलने लगा। पारंपरिक धोती-कुर्ता और कसुमल साफा पहने लोग घरों से निकले। हाथों में तलवारें और बंदूकें थीं। टुकड़ियां अलग-अलग रास्तों से ललकारते हुए ओंकारेश्वर चौक की ओर बढ़ीं।
ढोल-दुंदुभियों की गूंज के बीच गांव के पांच प्रमुख रास्तों की प्रतीकात्मक मोर्चाबंदी की गई। मशालें लेकर पांच दल गांव में निकले और जब वे एक साथ चौक में लौटे तो वातावरण रोमांच से भर उठा। इसके बाद बारूद की होली की शुरुआत हुई।
तोपों में बारूद भरकर धमाके किए गए, बंदूकों से हवाई फायर हुए और तलवारों के साथ प्रसिद्ध गैर नृत्य प्रस्तुत किया गया। हर धमाके के साथ भीड़ ‘जय मेवाड़’ के जयकारे लगाती रही।
महिलाओं की भी खास भूमिका
इस आयोजन में महिलाओं की भूमिका भी अहम रही। सिर पर मंगल कलश रखकर वे बोचरी माता की घाटी तक शोभायात्रा में शामिल हुईं। यहां ऐतिहासिक विजय की शौर्य गाथा पढ़ी गई और मुख्य होली को ठंडा करने की परंपरागत रस्म निभाई गई।
इसके बाद महिलाएं वीर रस के गीत गाती हुई जुलूस के साथ ओंकारेश्वर चौक पहुंचीं, जहां रात का सबसे रोमांचक चरण—बारूद की होली—शुरू हुआ।
देश-विदेश से पहुंचे दर्शक
इस अनोखी परंपरा को देखने के लिए दूर-दराज से लोग मेनार पहुंचे। राजस्थान के कई शहरों के अलावा मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र से भी बड़ी संख्या में लोग आए। कई प्रवासी ग्रामीण भी विदेशों से गांव लौटे।
उदयपुर-चित्तौड़गढ़ हाईवे पर देर रात तक वाहनों की कतारें लगी रहीं। कई दर्शकों को आयोजन स्थल तक पहुंचने के लिए करीब एक किलोमीटर पैदल चलना पड़ा।
पीढ़ियों से निभाई जा रही परंपरा
गांव के बुजुर्गों का कहना है कि यह सिर्फ होली का उत्सव नहीं बल्कि मेवाड़ की शौर्य परंपरा का स्मरण है। समय के साथ इसमें युवाओं के साथ महिलाएं और बच्चे भी शामिल होने लगे हैं।
सोशल मीडिया और इंटरनेट के कारण अब मेनार की यह बारूद वाली होली दुनिया भर में चर्चित हो रही है। लेकिन गांव वालों के लिए इसका अर्थ आज भी वही है—पूर्वजों की वीरता को याद करना और नई पीढ़ी को उस इतिहास से जोड़ना।

