24 News Update Udaipur. मौसम विभाग कई दिनों से चेतावनी दे रहा है कि इन दिनों गर्मी पिघला देने वाली है। एक्सट्रीम हीट डोम कंडीशन बन रही है, जरूरी काम होने पर ही घर से बाहर निकलें। बाहर निकलना पड़े तो भी ज्यादा देर धूप में रहने से परहेज करें, बार-बार शीतल पेय पदार्थ का सेवन करें। पुरुषों के साथ महिलाओं को खास हिदायतें दी जा रही हैं कि वे अपना ज्यादा ध्यान रखें। बच्चों का ख्याल करें, उन्हें तेज धूप में बाहर नहीं जाने दें। बुजुर्गों को सबसे ज्यादा खतरा है। देशभर में जहां-जहां हीट डोम यानी कि तगड़ी गर्मी का असर है, वहां-वहां कई जिलों में स्कूलों का समय बदल गया है ताकि बच्चे तेज धूप से पहले ही घर वापस पहुंच जाएं। मगर इन सबके बीच हमारे नेता, हमारे खेवनहार अफसर लगता है किसी दूसरी ही दुनिया में जी रहे हैं। उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि तापमान किस जानलेवा सीमा रेखा को पार करता जा रहा है। उन्हें तो बस अपना उल्लू सीधा करने से मतलब दिखाई देता है। अपने हितों के लिए वे किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। साथी, समर्थकों, समाजजनों, शुभचिंतकों आदि को आग की भट्टी में झोंकने को तैयार हैं। एक तरफ मौसमी चेतावनियां दी जा रही हैं, तो दूसरी तरफ भरी दुपहरी में बड़ी-बड़ी रैलियां निकल रही हैं, प्रदर्शन किए जा रहे हैं, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाओं की भी भागीदारी दिखाई दे रही है। इनकी परमिशन वही प्रशासन दे रहा है, जो लोगों को हीट वेव के बारे में सावधान करते हुए यह कह रहा है कि जरूरी काम होने पर ही घर से बाहर कदम रखें। अफसर एसी कमरों में बैठे हीट वेव पर चिंतन कर रहे हैं और कागजी आदेश जारी कर रहे हैं। दूसरी तरफ नेताओं व कुछ धार्मिक-सामाजिक संगठनों को लगता है कि इस दुनिया में उनके अलावा और किसी के पास न बुद्धि है, न सोचने-समझने की ताकत और संवेदनशीलता। जनता के एक वर्ग को उन्होंने लगभग अपना गुलाम बनाकर रख दिया है, जिसका उपयोग वे जब चाहें तब कर सकते हैं। रैलियां, विरोध प्रदर्शन, धरने, पुतला दहन आदि लोकतंत्र में विरोध के आजमाए हुए सर्वस्वीकार्य तरीके हैं। लेकिन इतनी गर्मी में ऐसे प्रदर्शन करना, ऐसी रैलियां और ऐसा शक्ति प्रदर्शन कौन-सी बुद्धिमानी है? बुद्धिमानी है या फिर महा मूर्खता की निशानी? हमारे आस-पास ही दिखाई दे रहा है कि गांव-देहातों से वाहनों में लोगों को भर-भर कर लाया जा रहा है और संख्या बल दिखाते हुए भरी दुपहरी में प्रदर्शन हो रहे हैं। लंबी पैदल रैलियां निकल रही हैं, जिनमें प्रदर्शन करने वाले लोग पसीना-पसीना हो रहे हैं। समझ नहीं आता कि इतनी गर्मी में यह सब करके नेता और अन्य संगठन आखिर हासिल क्या कर लेंगे? विरोध करने या अपने किसी मुद्दे को सड़क के माध्यम से कहने के तरीकों को अब बदलने का वक्त आ गया है। विरोध भी मौसम व समय के अनुकूल होना चाहिए। जिन जिलों में भरी दुपहरी में रैलियां, प्रदर्शन हो रहे हैं, जुलूस निकल रहे हैं, वहां का जिला प्रशासन आखिर क्या कर रहा है? वह ऐसे आयोजनों की परमिशन ही क्यों दे रहा है, जिसमें लू लगने से किसी की जान जाने का जोखिम है? क्या प्रशासनिक अधिकारियों में इतना भी रीढ़ की हड्डी सीधी रखने का साहस नहीं बचा है कि लालची, अवसरवादी और लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने पर आमादा नेताओं व संगठनों से दो टूक कह सकें कि यह सब नहीं चलेगा? अगर कोई मर गया तो कौन जिम्मेदार होगा? इन सबके बीच जो लोग ऐसे संगठनों के बहकावे में आकर जानलेवा धूप के दौरान किसी रैली, प्रदर्शन, धरने का हिस्सा बन रहे हैं, वे खुद भी यह अवश्य सोच लें कि इतिहास गवाह है—अगर आपके स्वास्थ्य को कुछ हो गया, तो कोई भी संगठन जीवन भर आपकी सेवा करने नहीं आएगा। नेताओं, संगठनों का हित सधते ही वे कैसे मुंह मोड़कर किनारा करते हैं, इसके उदाहरण इतिहास में भरे पड़े हैं। इसलिए भलाई इसी में है कि ऐसे आयोजनों को करने वालों को दूर से ही नमस्कार कर उनकी असलियत समझ ली जाए। डॉक्टर कहते हैं कि ऐसी कड़ी धूप में 10–15 मिनट से ज्यादा रहना खतरनाक हो सकता है, मगर यहां तो घंटों लंबी रैलियां, जुलूस, प्रदर्शन, मानव श्रृंखलाएं… मानो सूरज से सीधा कोई नूरा-कुश्ती वाला मुकाबला चल रहा हो कि कौन ज्यादा तपेगा। और इस मुकाबले में जनता का एक वर्ग आखिर मोहरा क्यों बने? यह अधिकारों की लड़ाई, हक की लड़ाई और पॉलिटिकल आइडियोलॉजी की लड़ाई नहीं, बल्कि भोल-भाले लोगों को बहकाने की लड़ाई है—भाड़ में झोंकने की लड़ाई, जिसके हम सब मूक दर्शक बन बैठे हैं। विडंबना देखिए—असली आग आसमान से बरस रही है, लेकिन गुस्सा पुतलों पर उतारा जा रहा है। विडंबना देखिए, देश पेट्रोल-डीजल की किल्लत सह रहा है, मगर यहां गर्मी में वाहन रैलियां निकाली जा रही हैं—केवल झूठी शान दिखाने के मकसद से शक्ति प्रदर्शन हो रहे हैं। यह कहीं न कहीं सीधे-सीधे राष्ट्रीय चेतना पर भी आघात करने जैसा है। इन सबके बीच सवाल सीधा और असहज करने वाला है—45 डिग्री के तापमान में जो आवाज उठाई जा रही है, वह हक की है या फरेब में लिपटे हठ की? क्योंकि सूरज को न विपक्ष से फर्क पड़ता है, न पक्ष से—वह तो बस तपता है। फर्क पड़ता है तो उस आम इंसान को, जो नारा भी लगाता है और चक्कर भी खाता है। और बाद में घनचक्कर होकर इन्हीं नेताओं और संगठनों के चारों तरफ अपना छोटा-मोटा काम करवाने के लिए गुलामी वाली परिक्रमा करता है। इसलिए विचार कीजिए और ऐसा करने वालों पर लानत भेजिए। Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading... 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