24 News Update उदयपुर। क्या हमारे नेता गुजरात के नाम से डरते हैं। क्या जन प्रतिनिधि डरते हैं?? क्या आईएएस अफसर गुजरात का नाम आते ही ठंडे पड़ जाते हैं। उनका दिमाग काम करना बंद कर देता है?? क्या हमारी जांच एजेसियां गुजरात का नाम आते ही पंगु हो जाती हैं?? यह सवाल अब प्लास्टिक के मामले में गूंज रहा है। शूरवाीरों की धरती को प्रतिबंधित प्लास्टिक खाए जा रहा है, जीवन में जहर घोल रहा है। मगर किसी की हिम्मत नहीं हो रही है कि गुजरात में चल रही फेक्ट्रियां बंद करवा दें। लॉबी इतनी तगडी है कि उनके आगे हमारे नेता से लेकर अफसर तक पानी भरते नजर आ रहे हैं। इसका नतीजा ये है कि माल गुजरात से डंकी की चोट पर आ रहा है और यहां ये डंडे की चोट पर उसको जब्त करके वाहवाही लूट रहे हैं। अजीब खेल चल रहा है, अगर जनता सोई नहीं होती तो अब तक तो बवाल मच जाता। यह कोई मजाक नहीं गंभीर जन चिंतन का विषय है।उदयपुर में एक बार फिर नगर निगम ने प्रतिबंधित सिंगल यूज़ प्लास्टिक के खिलाफ कथित “बड़ी कार्रवाई” की है। 15 क्विंटल 80 किलो प्लास्टिक जब्त हुआ, ट्रैक्टर-ट्रॉली में भरकर जब्त माल को ले जाया गया, तस्वीरें जारी हुईं और यह जताने की कोशिश की गई कि प्रशासन सतर्क है, सजग है और सख्त है। लेकिन असली सवाल यह नहीं है कि कितना प्लास्टिक पकड़ा गया।असली सवाल यह है कि कितना प्लास्टिक आज भी बेखौफ बच निकला।यह शहर कोई पहली बार ऐसी तस्वीरें नहीं देख रहा। हर कुछ महीनों में एक गोदाम, एक ट्रॉली, एक प्रेस नोट और फिर वही आत्मतुष्टि। मानो 15 क्विंटल प्लास्टिक पकड़ा जाना कोई ऐतिहासिक विजय हो। जबकि सच्चाई यह है कि यह कार्रवाई नहीं, केवल दृश्य-प्रबंधन है। अपने पॉलिटिक और एडमिनिस्ट्रेटिव सुपरबॉस को खुश करने की आईएएस लॉबी की कवायाद है।गुजरात से आता है जहरराजस्थान में सिंगल यूज़ प्लास्टिक पर वर्षों से प्रतिबंध है। इसके बावजूद उदयपुर जैसे शहर में यदि इतनी बड़ी खेप नियमित रूप से मिल रही है, तो यह मानना पड़ेगा कि यह प्लास्टिक यहां पैदा नहीं हो रहा, यहां भेजा जा रहा है। और यह तथ्य अब किसी फाइल में बंद रहस्य नहीं, बल्कि खुले बाज़ार की चर्चा है कि यह ज़हर गुजरात की फैक्ट्रियों से निकलकर राजस्थान की थैलियों में उतर रहा है। प्रश्न सीधा है कि यदि स्रोत सबको पता है, तो कार्रवाई केवल गोदाम पर ही क्यों? फैक्ट्री तक पहुंचने में प्रशासन के हाथ क्यों कांपते हैं?खुफिया एजेसियां क्या कर रही हैं, कहीं मिलीभगत तो नहींयह मानना कठिन है कि राज्य की पुलिस, खुफिया तंत्र और कर एजेंसियां इस सप्लाई चेन से अनजान हों। ट्रक हवा में उड़कर नहीं आते। बिल अपने आप नहीं बन जाते। रास्ते में चेक पोस्ट हैं, सिस्टम है, निगरानी है। फिर भी हर बार प्लास्टिक पकड़ा नहीं जाता, बल्कि पकड़ा हुआ दिखाया जाता है।नगर निगम की यह कार्रवाई एक और सच्चाई उजागर करती है कि छोटे गोदामों पर डंडा चलाना आसान है, बड़े अपराध तंत्र को छूना जोखिम भरा।यही वजह है कि वैध और प्रमाणित प्लास्टिक का व्यापार करने वाले कारोबारी आज खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं। वे खुलकर कहते हैं कि प्रतिबंधित प्लास्टिक की एक ऐसी लॉबी है, जिसके सामने न नेता खड़े होते हैं, न अफसर। उनकी वजह से वे अपने वैध प्लास्टिक का भी कारोबार सही से नहीं कर पा रहे हैं। मगर यह लॉबी अदृश्य नहीं है, अछूती है। और यही अछूतपन व्यवस्था पर सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न है।जहरीले दुश्मनों पर सर्जिकल स्ट्राइक की जरूतयदि वास्तव में प्लास्टिक मुक्त उदयपुर का सपना गंभीर है, तो फिर केवल जब्ती से काम नहीं चलेगा। जब तक अंतरराज्यीय स्तर पर उत्पादन बंद नहीं होगा, जब तक सप्लायर के नाम सार्वजनिक नहीं होंगे, जब तक राजनीतिक संरक्षण की परतें नहीं उघाड़ी जाएंगी— तब तक हर ट्रॉली सिर्फ़ एक नाटक होगी। 15 क्विंटल प्लास्टिक पकड़ा जाना कोई उपलब्धि नहीं। यह इस बात का संकेत है कि हज़ारों क्विंटल अब भी सुरक्षित हैं। पर्यावरण केवल अभियानों से नहीं बचता। वह बचता है साहस से। और साहस का पहला कदम होता है—सच को नाम देकर पुकारना। जब तक ऐसा नहीं होगा, उदयपुर की सड़कों पर प्लास्टिक नहीं, व्यवस्था की पोलिथीन उड़ती रहेगी। Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading… Related Discover more from 24 News Update Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Post navigation श्री संस्कार भवन ट्रस्ट की कार्यकारिणी गठित, भवन विस्तार को मिलेगी योजनाबद्ध रफ्तार उदयपुर–असारवा वंदे भारत पहले ही दिन फुस्स, 476 में सिर्फ 96 यात्री, लोग बोले—नेतागिरी कर रही बंटाढ़ार!!!